ईमान..

छीनी जा रहीं हैं मुझसे मेरी कविता,
काग़ज़ और लेखनी भी!
जी बिल्कुल, उनकी ही तरह!
उन्हें बचानी हैं नौकरी,
या कुछ कमाना भी होगा!
मेरा क्या कवि हूँ,
ईमान बस बचाया रहता हूँ..
कुंभन को क्या सिकरी सो काम?
कहने वाले कवियों की धूल हूँ।
बस इसीलिए,
मुझे भी मिलती है धमकियाँ,
या कहा जाता हैं ग़द्दार! नक्सली,
हक माँगने पर आंदोलन जीवी भी!
मेरे पास क्या हैं ‘मैं’ के सिवा?
मैं तो लिखता रहूँगा सच्चाई कविता से,
मीडिया थोड़ी हूँ ?
छत्रपती शिवराय की संतान हूँ,
भले ही ना हिले मुझसे तख़्त!
रक्त में हलचल तो मचा ही सकता हूँ

सहचर हिंदी संगठन हमारा

बन गया जो जान से भी प्यारा,
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।
मन में था हिंदी को बढ़ाना!
दीपक सा बन आलोक फैलाना,
आज बना जो एक अटूट परिवारा ,
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।

कोयल सी कुक देकर रोज जगाता,
लिखने – पढ़ने को मजबूर कराता।
सभी भाषाओं की आरती उतारें जग में सारा।
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।

लिखने- पढ़ने की गरिमा बढ़ाई,
भिन्न-भिन्न प्रतियोगिता कराकर,
जिसने विश्व में आदर पाया अपारा!
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।

हिंदी के नाम से मंच सजाया,
पूरे भारत को एक कराया ।
साहित्य आकाश का बना जो तारा।
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।

विद्यार्थियों के लिए बनेगा रास्ता,
हिंदी संग मातृ भाषा से इसका वास्ता।
कराये हिन्दुस्तान का जो चहुँ और जयकारा।
यह सहचर हिंदी संगठन हमारा।

 

 

प्रो. पंढरीनाथ पाटील “शिवांश”