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दृष्टिकोण (कहानी) – डॉ० उपासना पाण्डेय

दृष्टिकोण (कहानी)

सुनैना असहनीय पेट दर्द के कारण जब अस्पताल पहुँची तो उसे पता चला कि उसकी किडनी २० प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त हो चुकी है। अतएव उसे स्वरूपरानी चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया। वस्तुतः मध्यमवर्गीय परिवार के लिये बड़ी बीमारी का इलाज सरकारी चिकित्सालय में ही सम्भव हो पाता है। जहाँ कम पैसों में योग्य व अनुभवी डॉक्टर उपलब्ध होते हैं। यद्यपि सुनैना ने सुन रखा था कि सरकारी चिकित्सालयों में स्वच्छता प्राइवेट चिकित्सालयों से अल्प होती है। जिसके कारण उसके हृदय की धड़‌कन बढ़ चली थी लेकिन यथार्थ तो कुछ और ही था। मुख्यमंत्री योगीजी के कार्यकाल में सरकारी चिकित्सालय में समस्त सुविधाएँ उपलब्ध थीं। यह देख उसके साँस में साँस आई।
उसकी चिकित्सा प्रारम्भ हुई। वह बहुत ही भावुक और संवेदनशील महिला थी। सम्भवतः यही कारण था कि वह विपरीत परिस्थितियों में मुस्कुराती हुई मिलती है। जहाँ वह भर्ती हुई थी वह तीस बेड का वार्ड था। गम्भीर रोगों से ग्रस्त रोगियों का आना-जाना लगा रहता था। अगल-बगल के लोगो के साथ उसकी मित्रता भी हो गई। सासूमाँ और देवरानी क्रमशः सुबह-शाम भोजन लेकर आती थीं। सभी के दुःखों को देख सुनैना को अपना दुःख कम लगने लगा था। उसकी देवरानी नेहा नाम के अनुरूप सरल और स्नेह से युक्त थी। अतएव सुनैना बच्चों को लेकर निश्चिन्त थी।
एक दिन जन डॉक्टर साहब रोगियों के स्वास्थ्य व स्थिति के विषय में पूछताछ कर रहे तभी एक वृद्ध व्यक्ति दुबली-पतली महिला को गोद में लिये रोते हुए उनके समीप आए और गिड़गिड़ाने लगे – ” डॉक्टर साहब इसे बचा लीजिए। बड़ी उम्मीद से आपके पास आया हूँ।” डॉक्टर साहब ने उस मरणासन्न मूर्छित महिला को पास के बेड पर लिटवाया और उन्हें सान्त्वना देते हुए आवश्यक चिकित्सा प्रारम्भ की। प्रारम्भिक चिकित्सा के पश्चात् डॉक्टर ने उन्हें बताया कि इनकी स्थिति बहुत शोचनीय है। डायलिसिस करवाना पड़ेगा। आपके साथ कोई और भी है क्या? क्योंकि आज रविवार होने से स्टॉफ छुट्टी पर है। वृद्ध ने बताया वह जौनपुर के कोसी गाँव से आया है। अभी मरीज के साथ वह अकेला है। तीन-चार घण्टे में आवश्यक व्यवस्था हो जाएगी। डॉक्टर साहब ने उदारता दिखाते हुये उन्हें बेड नंबर चौदह पर ले जाने को कहा। साथ ही उस महिला के स्वस्थ हो जाने का आश्वासन भी दिया। डॉक्टर के विनम्र स्वभाव व सहयोग के कारण वह वृद्ध आश्वस्त हो शान्त हो गया। इस तरह वहाँ उपस्थित सभी लोग थोड़े समय के लिये असहज होकर मूकदर्शक बने रहे। साथ ही भावुक हो उस वृद्ध और महिला के लिये प्रभु से प्रार्थना भी कर रहे थे।
     इधर सुनैना को ड्रिप चढ़ रही थी। एक इंजेक्शन के प्रभाव से उसे नींद आ गई। दूसरे दिन जब नींद खुली तो सासूमाँ नाश्ता लेकर आ चुकी थीं। उनसे बात करते-करते उसका ध्यान बेड नंबर चौदह पर गया। वहाँ मरीज को न देखकर उसने समीप के अन्य सदस्यों से पूछा तो पता चला कि बैंड नंबर चौदह की मरीज को डाइलीसिस के लिये ले गए हैं। वृद्ध चाचा के मरीज के प्रति सेवाभाव को लेकर वहाँ उपस्थित लोगों में उनके आपसी सम्बन्ध की अटकलें लगायी जा रही थीं। यह विषय उनके बड़े कौतुहल का विषय था। सासूमाँ जी भी उनमें से एक थी। उन्होंने सुनैना से कहा “भाई पति हो तो ऐसा हो। भला, आज कलयुग में इतनी सेवा या देखरेख एक महिला की कहाँ सम्भव है। बड़ी भाग्यशाली है।” “माताजी ! आपको किसने बताया कि ये इनके पतिदेव है? – सुनैना ने उत्सुकता से पूछा । “अरी ! पूछना – पूछाना क्या, यहाँ यह तो सभी कह रहे हैं।” – माताजी ने बताया ।
     मानव का यह सामान्य स्वभाव होता है कि उसे अपने स्वभाव, समस्या व स्थिति की अपेक्षा दूसरों की कुछ अधिक चिन्ता रहती है। भले ही, उस व्यक्ति का उनसे दूर-दूर तक सम्बन्ध न हो परन्तु चिन्ता उसके सम्बन्धियों से बढ़‌कर होती है। समाज में दूसरे के विषय में अनुमान लगाना और चर्चा करना मानसिक आनन्द प्राप्त करने की एक लोकप्रिय विधा है। सोनी टी० बी. के ‘बिग बॉस’ धारावाहिक की टी०आ० पी० इसका सबसे बढ़ि‌या उदाहरण है।
     इस प्रकार बेड नंबर चौदह पर आये, वृद्ध चाचाजी व मरीज का सम्बन्ध वार्ड की परिचर्चा का ज्वलंत विषय था। चाचाजी प्रातःकाल सबके जागरण से पूर्व मरीज के वस्त्र तथा बेड की चादर तक बदल चुके होते थे। डॉक्टर के निरीक्षण के पूर्व उसके सिर में तेल लगाकर कंघी कर चुके होते थे। उनके मितभाषी होने के कारण कोई भी उनसे बातचीत अधिक नहीं करता था। वस्तुतः मरीज की शारीरिक अवस्था से उसकी आयु का अनुमान लगा, लोग उन्हें पति-पत्नी समझ सेवाभाव को देखकर दांतो तले उंगली दबाते थे। परंतु सुनैना को भोजन कराते या कंघी करते समय वृद्ध चाचा जी के स्वभाव में वात्सल्य भाव अधिक दिखता था।
     समय बीतता गया और वह महिला स्वस्थ होने लगी तो उसकी दबी रंगत में निखार आने लगा। वास्तव में बीमारी मनुष्य को समय से पहले ही बूढ़ा दिखाने लगती है; ऐसा उसे देखकर लग रहा था। अंततः उसके स्वस्थ होकर घर जाने का दिन भी आ गया। जब डॉक्टर साहब ने चाचाजी को मरीज को घर ले जाने की स्वीकृति दे दी। चाचा जी अश्रुपूरित नेत्रों से उनके चरणों में गिर पड़े और प्रसन्नता भरे स्वर में बोले – ” डॉक्टर साहब! आप तो मेरे लिए भगवान का रूप हैं। आपने मेरी इकलौती बिटिया को जीवनदान दे दिया। मुझे जीवन भर के लिये कृतज्ञ बना लिया। “
     वृद्ध चाचाजी के शब्दों ने वार्ड के सभी लोगो की अटकलों पर विराम चिह्न लगा दिया। साथ ही उनकी सीमित व संकीर्ण मानसिकता अथवा दृष्टिकोण को स्थितियों पर फिर से सोचने के लिये विवश कर दिया।
डॉ० उपासना पाण्डेय
प्रयागराज