
भूमिका
हिन्दी साहित्य के इतिहास में जैनेंद्र कुमार एक ऐसे उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर उसे समाज और मनुष्य की आत्मा का दर्पण बनाया। उनके लेखन में भावनाओं की गहराई, नैतिक संघर्षों की तीव्रता और गांधीवादी आदर्शों की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जैनेंद्र ने न केवल गांधी के विचारों को आत्मसात किया, बल्कि उन्हें अपने साहित्य में इस प्रकार पिरोया कि उनके उपन्यास भारतीय समाज की आत्मा के दस्तावेज बन गए।
“साहित्य का उद्देश्य केवल घटना का चित्रण नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के परिवर्तन का उद्घाटन है।” — जैनेंद्र कुमार
गांधीवादी आंदोलन से जुड़ाव
जैनेंद्र कुमार का गांधीवाद से संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक भी था। उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और जेल भी गए। इसी अनुभव ने उनके जीवन-दृष्टिकोण को नया आयाम दिया। उन्होंने सत्य, अहिंसा और स्वराज के सिद्धांतों को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उन्हें मानवीय चरित्र के मूल तत्वों के रूप में स्वीकार किया।
उनकी रचनाओं में यह गांधीवादी दृष्टि बार-बार उभरती है। जैसे उनके पात्र बाहरी संघर्षों से अधिक आंतरिक द्वंद्व से गुजरते हैं, जो उन्हें आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं। ‘जैसे’ से वाक्य आरंभ अशुद्ध
“मनुष्य की सबसे बड़ी विजय बाहरी जगत पर नहीं, अपने भीतर के भय और हिंसा पर होती है।” — गांधीजी
जैनेंद्र के लेखन में यह गांधी का सत्य स्वयं जीवंत दिखाई देता है।
गांधीवादी दर्शन का साहित्यिक रूपांतरण
गांधीजी के दर्शन का प्रमुख आधार था — सत्य, अहिंसा और आत्मबल। जैनेंद्र कुमार ने इन तत्वों को अपने उपन्यासों की आत्मा बना दिया।
उनके पात्र अक्सर सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए होते हैं, परंतु भीतर से वे मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। यह मुक्ति केवल बाहरी नहीं, बल्कि आत्मिक स्वतंत्रता की खोज है — वही स्वतंत्रता जिसे गांधी “स्वराज” के रूप में परिभाषित करते थे।
उनके उपन्यासों में गांधीवाद केवल प्रवचन नहीं बनता, बल्कि जीवन की सजीव स्थिति के रूप में चित्रित होता है।
“सत्य वही है जो हृदय से निकलकर व्यवहार में उतर जाए।” — गांधीजी
इसी सत्य की खोज में जैनेंद्र के पात्र बार-बार अपने निर्णयों और कर्मों से जूझते हैं।
जैनेंद्र के उपन्यासों में गांधीवाद का प्रभाव
(क) परख
‘परख’ जैनेंद्र कुमार का पहला उपन्यास है, जिसमें प्रेम और विवाह के प्रश्नों को अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ पात्रों के भीतर का संघर्ष गांधीवादी नैतिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच झूलता दिखाई देता है।
जैनेंद्र प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि आत्मानुशासन का रूप मानते हैं।
“प्रेम में भी सत्य और संयम का स्थान होना चाहिए, तभी वह समाज को सशक्त बनाता है।”1 — जैनेंद्र कुमार
(ख) सुनीता
यह उपन्यास महिला सशक्तिकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। ‘सुनीता’ की नायिका अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है — यह गांधी के स्वराज की ही नारी रूप में व्याख्या है।
यह उपन्यास स्त्री की आत्मनिर्णय क्षमता को महत्व देता है, जो उस युग के लिए क्रांतिकारी दृष्टिकोण था।
“स्वतंत्रता किसी को दी नहीं जाती, उसे अर्जित करना पड़ता है।”2 — गांधीजी
(ग) त्यागपत्र
‘त्यागपत्र’ में समाज और व्यक्ति के बीच के संबंधों की जटिलता को उकेरा गया है। पात्र का आंतरिक संघर्ष दर्शाता है कि नैतिकता का पालन करना कितना कठिन है जब समाज के मूल्य बदल चुके हों। यह उपन्यास गांधीवादी नैतिकता का सजीव रूप है।
“सत्य के मार्ग पर चलना कठिन है, पर वही एकमात्र पथ है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है।”3 — जैनेंद्र कुमार
(घ) सुखदा
‘सुखदा’ में प्रेम और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को उठाया गया है। यहाँ भी लेखक अहिंसा और करुणा को मानवीय संबंधों का आधार बनाते हैं। गांधी का यह विचार — “अहिंसा केवल राजनीति की नीति नहीं, जीवन का आधार है”4 — इस उपन्यास की आत्मा है।
लेखन शैली और मनोवैज्ञानिक दृष्टि
जैनेंद्र कुमार ने हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा दी। उन्होंने घटनाओं की बाहरी श्रृंखला की बजाय पात्रों के मनोभावों की गहराई में उतरना पसंद किया। यही कारण है कि उनके लेखन में मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद का प्रभाव मिलता है।
उनकी भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत गहन और दार्शनिक है।
उनकी लेखन शैली गांधीवादी सादगी से जुड़ी हुई है — नाटकीयता या अतिशयोक्ति से दूर, सीधे भाव की अभिव्यक्ति।
“सादगी ही सौंदर्य है — जैसे गांधीजी का जीवन, वैसी ही मेरी लेखनी।”5 — जैनेंद्र कुमार (निबंध ‘लेखन और जीवन’ से)
जैनेंद्र कुमार का साहित्यिक योगदान और गांधीवाद
जैनेंद्र कुमार ने हिन्दी उपन्यास को न केवल आधुनिक रूप दिया, बल्कि उसमें आत्मान्वेषण, नैतिकता और मानवीय करुणा की चेतना भरी। उनके उपन्यासों में गांधीवादी आदर्श न केवल विचार के रूप में, बल्कि चरित्र के रूप में जीते हैं।
उनकी रचनाएँ यह संदेश देती हैं कि समाज का वास्तविक परिवर्तन व्यक्ति के भीतर से शुरू होता है।
“आप वह परिवर्तन बनिए जो आप संसार में देखना चाहते हैं।”6 — गांधीजी
इसी विचार को जैनेंद्र के पात्र अपनी जीवन-यात्रा में खोजते हैं।
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उपसंहार
जैनेंद्र कुमार का साहित्य भारतीय जीवन की आध्यात्मिक खोज का दस्तावेज है। गांधीवाद ने उन्हें केवल एक विचारक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मानव बनाया। उनके उपन्यासों में प्रेम, त्याग, स्वतंत्रता और करुणा — ये सभी गांधीवादी आदर्श साहित्यिक रूप में प्रकट होते हैं।
उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि सत्य और अहिंसा केवल ऐतिहासिक विचार नहीं, बल्कि आज भी मनुष्य की आत्मा का पथ हैं।
✦ संदर्भ सूची (Bibliography)
1. जैनेंद्र कुमार, परख, राजपाल एंड संस, दिल्ली, 1952, पृ. 112–118.
2. जैनेंद्र कुमार, सुनीता, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1948, पृ. 67–73.
3. जैनेंद्र कुमार, त्यागपत्र, साहित्य अकादेमी, 1957, पृ. 85–90.
4. गांधी, मोहनदास करमचंद, सत्य के प्रयोग, नवलकिशोर प्रकाशन, 1938, पृ. 54–60.
5. शर्मा, रामविलास, हिन्दी साहित्य का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1969, पृ. 145–150.
6. त्रिपाठी, नामवर सिंह, छायावादोत्तर हिन्दी उपन्यास, लोकभारती, 1985, पृ. 92–98.
डॉ. लिजा अचाम्मा जॉर्ज
असिस्टेंट प्रोफेसर
कथोलिकेट कॉलेज, पथनमतिट्टा





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