गिरिराज किशोर जी का ब्रहतकाय उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ आधुनिक भारतीय ऐतिहासिक कथा साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। जो मोहनदास करमचंद गांधी के दक्षिण अफ्रीकी जीवन पर आधारित रचना है। प्रस्तुत उपन्यास में गिरिराज जी ने मोहनदास के अफ्रीकी युग को केंद्र बनाकर उनके परिवर्तनकारी वर्षों का एक व्यापक और गहन शोध किया है। मोहनदास नामक एक साधारण व्यक्ति से महात्मा बनने की विलक्षण प्रक्रिया के आधार पर इस महान वृत्तांत को प्रस्तुत करता है। गिरीराज किशोर समकालीन हिन्दी साहित्य के एक जाने-माने उपन्यासकार एवं कुशल लेखक हैं। किशोर जी ने इस कथात्मक ताने-बाने के निर्माण के लिए दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, मॉरीशस और भारत में व्यापक विद्वतापूर्ण कठोरता के साथ व्यापक शोध किया। उनके आत्मसमर्पण को व्यक्त करते हुए राजेन्द्र यादव जी कहते है –“पहला गिरमिटिया गिरिराज किशोर का महत्वाकांक्षी उपन्यास है। गांधी जी के अफ्रीकी युग को केंद्र बनाकर गिरिराज ने आठ वर्षों के परिश्रम से इसे लिखा है। मुझे स्वीकार करना चाहिए कि किसी हद तक बिना ऊबे नौ-सौ पृष्ठ पढ़वा लेने का कथा- कौशल गिरिराज ने सिद्ध कर लिया है।”1
सन 1999 में प्रकाशित इस उपन्यास उपन्यास के कथानक का घोषित उद्देश्य केवल ऐतिहासिक घटनाओं को दोहराना नहीं है, बल्कि एक औसत आदमी मोहनदास करमचंद के वैचारिक विकास को अंकित करना है। कथा को एक विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्टभूमि पर रखे हुए एक जीवन बदलने वाले मार्ग और महात्मा बनने की कथा को प्रस्तुत करता है। दक्षिण अफ्रीका के इस मौलिक काल पर ध्यान केंद्रित करना इस काम को विशिष्ट बनाता है। श्रीलाल शुक्ल जी के अनुसार-“ यह उपन्यास समकालीन हिन्दी साहित्य की एक असाधारण घटना है। यही नहीं ,यह गिरिराज किशोर के दीर्घकालीन लेखन की चरम सार्थकता भी है। .. यह कृति निश्चय हि हमारे- विशेषता: नई पीढी के लिए आश्चर्यपुरुष के जटिल जीवन और दर्शन को संवेदना और समझ के साथ पहचानने में मदद करेंगी”।2
यह उपन्यास पूरी तरह से गांधी के मोहनदास पक्ष पर बल देती है। बैरिस्टरी से लेकर दक्षिण अफ्रीका से लौटने तक का काल है मोहनदास पक्ष। मोहनदास जैसे एक आम आदमी कैसे महात्मा बना? जिस प्रश्न का उत्तर है ‘पहला गिरमिटिया’। इस उपन्यास का मुख्य पात्र मोहनदास उतना ही सामान्य व्यक्ति है जितना कोई भी हो सकता है, क्योंकि वह एक साधारण परिवार की संघर्षभरी जीवन बितानेवाले सामान्य व्यक्ति है। वह संवेदना और अनुभवों से नजदीक व्यक्ति है। वह अपनी कमज़ोरियों से महानता के द्वार पर प्रवेश किया। मोहनदास का संघर्ष एक बेगानि धरती पर अनजाने एवं विस्थापित आदमी का संघर्ष है। मोहनदास से महात्मा बनने के रास्ता इन्हीं अनिश्चितता, त्याग, संघर्ष, पीडा, समर्पण और अपमान आदि के संकरी गली से गुजरा था।
‘पहला गिरमिटिया’ में हिंदुस्तान से लोगों को दक्षिण अफ्रीका ले जाने वाले दलालों के व्यवहार और वहां के संघर्षरत जीवन को प्रस्तुत करती है। वहां की दुरवस्था को व्यक्त करते हुए उपन्यास का पात्र देवारम कहता है कि –“कभी वह दलाल मिला तो उससे जरूर पूछूंगा तूने तो मुझेसे उस देश में भेजने का वादा किया था जहां बिन खाये कोई नहीं सोता ,फिर ईस देश में काहे भिजवा दिया। जहां न रोटी है, न अपनी पहचान। बेइज़्जती है और रात- दिन की हल्कानी है।”3 विस्थापन के अनुभव पर ध्यान केंद्रित करके, लेखक गिरमिटिया समुदाय का इतिहास, संस्कृति और लचीलापन को प्रस्तुत किया है। गिरमिटिया अंग्रेजी के एग्रीमेंट शब्द के बिगडा हुआ शब्द है। वैश्विक भारतीय अनुभव के एक महत्वपूर्ण चरण और आधुनिक अहिंसक राजनीतिक सिद्धांत की उत्पत्ति का विवरण देने वाले इस उपन्यास में बौद्धिक विमर्श और गिरमिटिया प्रणाली को मुख्य रूप से अभिव्यक्त किया है।
मोहनदास एक बैरिस्टर के रूप में दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी का एक केस लड़ने के लिए अफ्रीका गए थे। गांधी उस कंपनी की वकालत करने के लिए गिरमिटिया के रूप में वहां जाने के कारण उनको अंग्रेजों के दुरव्यवहार एवं कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ा था। जब गांधी ने डरबन में अदालत जाने पर जज साहब ने फेटा उतारने का आदेश दिया,तब उन्होंने बताया है कि “हमारे यहां जब किसी सम्मान योग्य स्थान पर जाते हैं तो फेटा उतारते नहीं। वह राष्ट्रीय सम्मान और आत्मसम्मान का प्रतीक है। लेकिन कोर्टरूम में दाखिला होते ही सम्माननीय मजिस्ट्रेट ने मुझे फेटा उतारने का हुक्म दिया जबकि मेरी कंपनी के मालिक और नेता के प्रखयात व्यवसायी दादा अब्दुल्ला पगड़ी पहने थे। दादा अब्दुल्ला भारतीय हैं पर यहां अरब कहलाते हैं। अरब पगड़ी पहने तो उनकी पहचान, हम पहनें तो कोर्ट का असम्मान। यह कैसा भेदभाव?”4। वह संघर्षों को चुपचाप सहने के बजाया उसके विरुद्ध लड़ना पसंद करते हैं।
गांधी ने अलगाव के कानूनों का पालन करने से इनकार कर दिया था। जब उनके प्रिटोरिया की यात्रा के वक्त उन्हें गोरों के लिए आरक्षित डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया था। गांधी के साथ हुए इस अत्याचार के बारे में गिरिराज जी ने ऐसे लिखता है “गोरा रेलवे के दो गोरे कर्मचारियों को साथ लेकर लौट आया था। वह गोरा और उसके साथ एक आदमी दरवाजे पर खड़े हो गये । तीसरा आदमी मोहनदास के पास आकार खड़ा हो गया और गुस्साई नज़रों से देखता हुआ बोला ,तुमसे इस डिब्बे में बैठने के लिए किसने कहा? अपना सामान उठाओ, वैन में चले जाओ ,कुलियों के लिए वही है”5। इस अपमानजनक घटना के विरुद्ध उन्होंने सशक्त ढंग से प्रतिक्रिया किया और बताया, मैं इसी डिब्बे में सफर करूंगा।आप मुझे बाहर फिंकवा सकते हैं, लेकिन उतार नहीं सकते। क्योंकि मैं अधिकार को सत्य मानते है, जो अधिकार टिकट के रूप में मेरे पास है। इस प्रकार गांधी जी ने अन्याय के खिलाफ पहले से ही शब्द उठाई थी। यह घटना उनके भविष्य के राजनीतिक जीवन को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किया और अहिंसक प्रतिरोध के साथ उनके पहले व्यावहारिक अनुभव की शुरुआत की।

गांधी के परिवर्तन की शुरुआत दक्षिण अफ्रीका के सुदृढ़ औपनिवेशिक रंगभेद की नीतियों के साथ आघातजनक टकरावों की एक श्रृंखला से चिह्नित होती है। वहां के भारतीय गिरमिटियों का दयनीय स्थिति देखकर उन्होंने उनके हक के लिए लड़ाई लडना चाहते हैं और उस उत्पीड़ित समुदाय को एक ऐसी आवाज प्रदान करती है जो उन्हें मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करेगी। लोग उन्हें गांधी भाई संबोधित करते हैं। गांधी ने पृथक्करण कानूनों का पालन करने से इनकार कर दिया था। मोहनदास दक्षिण अफ्रीका के उपनिवेश में फंसे भारतीय मजदूरों के दयनीय स्थिति को बहुत जल्दी से पहचान लिया। उन्हें यह बात पर परेशान करती है कि, “आखिर भारतीय यहां इतना दबाकर क्यों रहते हैं? वे अपने अधिकारों को पहचानते क्यों नहीं?।”6 इस उपनिवेश भूमि में भारतीय लोगों की स्थिति जानवरों से बदतर है। गांधी हिन्दुस्थानियों के उत्थान के लिए प्रिटोरिया में एक बैठक बुलाया। मोहनदास के कहने में “ईश्वर ने हर एक को अधिकार दिया है कि वह अपनी जींदगी जीने का ढंग अपने आप तय करे। यह तो हम इन्सान ही हैं जो अपने आप को उससे भी ऊपर समझकर उसके विधान में भी हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं। कभी कानून का सहारा लेकर कभी अत्याचार का सहारा लेकर।”7 मोहनदास गांधी भारतीय लोगों के लिए फिनिक्स आश्रम और टांलस्टाय फार्म की स्थापना की और उनके खिलाफ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन करते हुए उनके अधिकार के लिए निरंतर प्रयास किया है।
‘पहला गिरमिटिया’ गांधी के सबसे बडे वैचारिक योगदान सत्याग्रह के विकास और अनुप्रयोग का विस्तृत दस्तावेज है। दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षों के दौरान, गांधी की सेवा, आत्म-संयम, और करुणा की वैचारिक जड़ें मजबूत हुईं । प्रस्तुत उपन्यास के द्वारे गिरिराज जी ने यह दिखाता है कि गांधी का वैचारिक आधार केवल निराशा और अपमान की दोहरी चोट से ही नहीं उपजा, बल्कि यह एक सचेत और क्रमिक आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया थी ।गांधी जी का सत्याग्रह का दर्शन सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और स्वच्छता जैसे मूल्यों से जुड़ा हुआ है । इन जीवन मूल्यों को आत्मसात करने के साथ साथ उन्होंने प्रार्थना को भी मानसिक उपचार के रूप में सवीकार किया है। प्रार्थना के महत्व के साथ उन्होंने शिक्षा को भी महत्व दिया है। वह अफ्रीका में गिरमिटिया के रूप में गए भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता के बारे में समझाया।
नस्लीय कानून ने जन-विरोध को जन्म दिया। इस सामूहिक संघर्ष में गांधी ने अपने सिद्धांत को लागू किया और उन्होंने सत्याग्रहियों के मन में यह दृढ़ धारणा बैठा दी थी कि “हर दिन एक नई लड़ाई की शुरुआत है। हर दिन एक हार का अंत है। हमें इन दोनों के लिए तैय्यार रहना होगा। हामारी लड़ाई और लडाइयों से अलाग है। और शायद विचित्र भी। अंतिम जीत तक पहूंचने के लिए हामारी लड़ाई के रास्ते में अन्गिनत हारें पड़ेंगी। इन हारों की राख से ही फीनिक्स चिड़िया की तरह जीत निकलेगी। हम हथियारबंध नहीं, हथियारमुक्त हैं। यही हमारी सच्चाई है और सच्चाई हमारी ताकत है।”8 इससे यह सिद्ध हुआ कि गांधी ने संघर्ष के माध्यम से अपने आदर्शों को न केवल परिभाषित किया, बल्कि उसका सफलतापूर्वक प्रयोग भी किया है। गांधी का दर्शन अहिंसा,सत्य और ईमानदारी से निर्भर होती है। वह सत्याग्रह को लड़ाई के सबसे सशक्त रूप मानते है और कहता है-“हमारी लड़ाई का काम ‘सत्याग्रह’ है। ‘सत्याग्रह’ ही हमारे मार्ग निर्देशक होगा, वही इस काले कानून से लोहा लेगा,जब भी विचार और अस्मिता का संकट आएगा ‘सत्याग्रह’ ही हमारा अस्त्र होगा, सत्याग्रह’ ही हमारा ध्येय होगा, सत्याग्रह वह मंत्र होगा जिससे हम सारी व्याधियों को जीत सकेंगे। सत्याग्रह में नफरत की कोई जगह नहीं, सत्याग्रह में देह-बल वर्जित है। यह सहीष्णुता की चरम परीक्षा है।”9 गांधी भाई का विश्वास सच्चाई पर निर्भर होती है। उनके अनुसार हिम्मत हारोगे तो जीत भी असंभव्य की बात है। और जीत का मतलब आज़ादी और आज़ादी का मतलब सबको सम्मान के साथ जीने की हक है।
गांधी के विचारों में सामाजिक समरसता एक केंद्रीय तत्व थी। वह वर्ग भेद एवं छुआछूत के विरुद्ध घोर विरोध प्रकट करते थे । सत्याग्रह आंदोलन में यह वैचारिक समावेशिता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। तीन पौंड कर के विरोध में पैंतीस मील की पैदल यात्रा में अलग-अलग धर्मों के सत्याग्रहीयां एक साथ मिले हुए थे । “पद यात्रियों की जमात पढ़े- लिखे लोगों की जमात नहीं थी। हर तरह के लोग थे। ज्यादातर मजदूर थे। उनमें भी निम्न किस्म के आदमी थे। चोर ,हत्यार,शराबी,व्यभिचारी,ऐसे लोगों के बीच किसी समय भी हिंसा भडक सकती थी। लोग खाने पर लड सकते हैं। फिर भी उन्हें एक बात का विश्वास था,वे कहते भी थे-दीन हीनों में और चाहे जो कमी हो पर वे प्यार की एक डोर में ऐसे बांधे होते हैं कि उसे टूटने नहीं देते।”10 यह उनके नेतृत्व और दर्शन की सार्वभौमिक स्वीकार्यता का सबूत है। उपन्यास में लेखक मोहनदास के शक्तिशाली पहलू को ही नहीं दर्शाता है बल्कि गांधी का वैचारिक प्रभाव को भी अंकित किया है। गांधी भाई का प्रभाव केवल उनके अनुयायियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने विरोधियों और तटस्थ लोगों के जीवन को भी रूपांतरित कर दिया। मिस्टर कैलनबैक द्वारा अपनी अथाह संपत्ति और सौ एकड़ जमीन गांधी जी को समर्पित करने की घटना इस रूपान्तरण, गांधीवादी अपरिग्रह का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इसी तरह, कोयला खदानों में प्लेग फैलने पर एक अंग्रेज नर्स का भारतीयों की देखभाल करना और अंत में गांधी भाई के हाथों में प्राण त्यागना , सेवा और करुणा के वैचारिक सिद्धांत का चरम बिंदु है, जो मानवीय करुणा के लिए नस्लीय विभाजन को अप्रासंगिक कर देता है।
गिरिराज किशोर का ‘पहला गिरमिटिया’ गांधी के वैचारिक प्रभाव को केवल रेखांकित नहीं किया , बल्कि उसे एक आधुनिक महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत करता है। उन्नीस्वीं और बीसवीं सदी के दक्षिण अफ्रीका की सामाजिक ,राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लिखित इस उपन्यास का उद्देश्य गांधी के राजनीतिक संघर्ष के बजाय उनके चरित्र की वैचारिक सिद्धांतों की स्थापना को केंद्र में रखना था। रंगभेद नीति की आड में दक्षिण अफ्रीका में काम कर रहे भारतीय मज़दूरों के प्रति हो रहे अन्याय पर गांधी सहानुभूति ही नहीं प्रकट किया बल्कि उनके अधिकार के लिए लड़ाई लडा। बंधुआ मजदूरों के साथ अपनी एकता को प्रदरशित करने के लिए गांधी अपने आप को पहला गिरमिटिया कहते है। उन्हें पहला बंधुआ मजदूर का ताज पहनाकर, किशोर जी संरचनात्मक रूप से यह सुनिश्चित करते हैं कि गिरमिटिया की दुर्दशा महात्मा की उत्पत्ति कहानी के केंद्र में स्थापित हो गए। गांधी का दक्षिण अफ्रीका के व्यक्तिगत आघात एवं अहिंसक प्रतिरोध एक सार्वभौमिक नैतिक ढांचे में बदल गया।
‘पहला गिरमिटिया’ एक ऐतिहासिक उपन्यास होने के साथ-साथ गांधी के वैचारिक सिद्धांतों की निर्मिति की दस्तावेज भी है। यह केवल गिरमिटिया प्रथा की गाथा नहीं, बल्कि मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा बनने की प्रक्रिया की कहानी है। गांधी के दर्शन ने उत्पीड़न के सामने अहिंसा, भोगवाद के सामने अपरिग्रह, और नस्लीय विभाजन के सामने सामाजिक समरसता का विकल्प दिया। यह उपन्यास भारतीय और वैश्विक पाठकों के लिए गांधी के प्रारंभिक, संघर्षपूर्ण, और वैचारिक जीवन को समझने की अनिवार्य ‘कुंजी’ है ।’पहला गिरमिटिया’ गांधी के वैचारिक पक्ष को उतारने का एक सफल साहित्यिक प्रयास है। जो उनके विचारों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणादायक महाकाव्य के रूप में सुरक्षित करता है। प्रस्तुत उपन्यास गांधी के विचार, सत्य, अहिंसा और सामुदायिक तपस्या पर आधारित हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं । हर व्यक्ति में यह शक्ति निहित है कि वह दुनिया को और अधिक मानवीय और बेहतर बना सके । यह अंतिम संदेश गांधी के आत्म-सुधार और सामाजिक परिवर्तन के वैचारिक संबंध से उपजा है, जिसे गिरिराज किशोर ने पूरी सूक्ष्मता के साथ उपन्यास में उकेरा है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. गिरिराज किशोर- ‘पहला गिरमिटिया’- पहला राजपाल प्रकाशन, दिल्ली, 2011,पृ-1
2. वही,पृ-1
3. वही,पृ-37
4. वही,पृ-79
5. वही,पृ-101
6. वही,पृ-88
7. वही,पृ-158
8. वही,पृ-227
9. वही,पृ-649
10. वही,पृ-817

ANJU JOY
RESEARCH SCHOLAR
ST.THOMAS COLLEGE PALA,KERALA
ajskaduppil@gmail.Com