कमलेश्वर ने ‘ कितने पाकिस्तान ‘ के विराट कथ्य में जहाँ एक ओर पौराणिक या पुराकथाओं का प्रयोग कर साहित्य और लोक प्रचलित इतिहास में मिथकों की परम्परा और प्रयोग को जगह दी है , तो वहीं दूसरी ओर सत्ता लोलुप शक्तियों द्वारा अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इतिहास को तोड़ – मरोड़कर उसे मिथक बनाने के लिए क्रूर षड्यंत्र का पर्दाफाश भी किया है । वैसे साहित्य में मिथक का प्रयोग परम्परा से चला आ रहा है । जिससे पुरा कथाओं के द्वारा साहित्य में कथात्मकता और कल्पना को विस्तार मिलता है । यहाँ गौरतलब है कि कमलेश्वर ने ‘ अंधायुग ‘ ‘ कामायनी ‘ , ‘ कनुप्रिया ‘ , ‘ संशय की एक रात ‘ , ‘ आत्मजयी ‘ और हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में प्रयुक्त मिथकों की परंपरा से अलग सिर्फ उन्हीं मिथकों का उपन्यास में जिक्र किया है जिनका पुरुषवर्चस्ववाद , विभाजन , राजनीति के सन्दर्भों में दुरुपयोग होता आया है । हालांकि कमलेश्वर ने उपन्यास में आचार्य द्विवेदी के ही मुख से मिथक को परिभाषित करवाया है- ” मिथक तो एक अलौकिक कथा है , वह अलौकिक कथा , जिसका प्रथम अनुभव मनुष्य ने प्रकृति के साथ किया और अपनी संकल्प शक्ति से उसने अपने उस लौकिक अनुभव को अलौकिक और अपराजेय बना दिया … ये पुराकथाएं मौखिक रूप में चलती रहीं … ये मनुष्य गाथाएं , ये मिथक , ये पुराकथाएं पौराणिक इतिहास में बदल गई … इन्हीं से धर्मकथाएँ निकलीं , धारणाएँ स्थापित हुई और इन्हीं से संकीर्ण धर्मों ने जन्म लिया !(1) इस उपन्यास में भी अनेक भारतीय वैश्विक पुराकथाओं का प्रयोग किया गया है , जैसे बेबीलोनियन सभ्यता के परमपुरुष मारदुक द्वारा भौतिक सत्ताओं और दजला – फरात नदियों का सृजन , युरूक सम्राट गिलगमेश से शत्रुता और ईर्ष्यावश विश्व सभ्यता ( बेबीलोनियां , मेसोपोटामियां सुमेरी , अक्कादी और सिंधु ) के देवताओं द्वारा गिलगमेश को मारने का षड्यंत्र , प्रमथ्यु द्वारा आग को चुराकर मानवजाति को देना , परिणामतः गिद्ध द्वारा कंधे पर बैठकर माँस खाते रहने की सजा पाना , पशुपुरुष एंकिदु और रुना से दुनिया की प्रथम प्रेम कथा का प्रारम्भ होना , गिलगमेश द्वारा अमरत्व प्रदान करने वाली औषधि की तलाश में सागरतल में समा जाना , अतल जलराशि में शुरूप्पक के जिउसुदू द्वारा मृत्यु की औषधि चुराना इन मिथकों से हिन्दी पाठक पहली बार रू – ब – रू होता है ।

     देवताओं के भोग – विलास की न केवल वैश्विक पुराकथाओं जैसे जीयस का देवदासी इष्टा के साथ और देवता सुवोग का परंती के साथ संभोग का वर्णन है बल्कि भारतीय पुराणकथाओं के देवताओं के जैसे ब्रह्मा द्वारा पुत्री शतरूपा सरस्वती के साथ , सूर्य द्वारा भाई विश्वकर्मा पुत्री संज्ञा के साथ और चन्द्रमा द्वारा गुरुपत्नी के साथ के बलात्कारी , व्यभिचारी और निकृष्ट कर्मों का भी उल्लेख है । जो देव सभ्यताओं की कुरूप कथा को ही सामने लाता है ।

     हिन्दू धर्म के भगवान राम के रामराज्य में ब्राह्मणधर्म की रक्षा के लिए शूद्रवंशी शंबूक की तप और साधना के विरोध स्वरूप राम द्वारा उसकी हत्या जैसे लोकप्रचलित मिथ का प्रयोग और बलात्कारी इन्द्र द्वारा अगस्त्य ऋषि पत्नी के साथ संभोग की सजा अहिल्या को मिलना मूलतः पौराणिक समाज में पुरुषवर्चस्ववादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शूद्र और स्त्री के साथ किए गए दुर्व्यवहारों को ही सामने लाता है ।

     दुनिया की तमाम सभ्यताओं के जलप्रलय की पुरा कथाओं का भी ( मनु – श्रद्धा , नूह , यू ) उपन्यास में मनुष्य जिजीविषा की आकांक्षा के तौर पर उल्लेख हुआ है । कमलेश्वर ने उपन्यास में साहित्य – परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अपनी किस्सागोई शैली में जहाँ लोकप्रचलित कथाओं का निर्वहन किया है वहीं अपनी प्रखर प्रगतिशील बौद्धिक दृष्टि से अब तक साहित्य में अनछुए हुए पहलुओं को अपनी तार्किक और यथार्थ शैली में स्पष्ट भी किया है । उपन्यास में इतिहास के अनेकों तथ्यों और घटनाओं को नजर अंदाज करके सत्ता लोलुप नेताओं और समाज द्वारा गढ़े गए मिथकों को जबर्दस्त ढंग से तोड़ने की कोशिश भी की गई है । दरअसल इतिहास का मिथकीकरण अनेक स्थितियों में होता है कुछ स्थितियों में पुराने पड़ गए सिद्धान्तों जैसे आर्य जाति के सिद्धान्त को दोहराने का प्रयास किया जाता है , भले ही ऐसे नए प्रमाण प्राप्त हुए हों जो ऐसे किसी सिद्धान्त विशेष का समर्थन नहीं करते । ऐसी स्थितियों में इतिहास की जगह मिथकों का प्रयोग करके राजनीतिज्ञों , साम्प्रदायिकों और राष्ट्रवादियों द्वारा इतिहास का दुरुपयोग किया जाता है , तो उसका भंडाफोड़ किया जाना आवश्यक है । पहला मिथक आर्य जाति के सिद्धान्त को लेकर है इसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार विपिन चन्द्रा ने लिखा है ” तीसरा मिथक था आर्य , जो ट्यूटानिक और आंग्ल सैक्सन किंवदंतियों की अनुकृति तथा श्वेत नस्लवादी सिद्धान्तों के प्रति भारतीय प्रयुत्तर था । यह किंवदंती इस प्रकार थी कि भारतीय लोग आर्य हैं और आर्य वैदिक काल की संस्कृति और समाज ‘ शुद्ध ‘ भारतीय संस्कृति और समाज थे ।(2) और ऐसा मानने वाले इतिहासकारों की कमी नहीं है । अनेक राष्ट्रवादी इतिहासकारों जैसे गंगानाथ झा ( ब्रहमर्षि देश ) , डॉ . अविनाशचन्द्र दास ( सप्त सैन्धव ) डी.एस. त्रिवेदी ( मुल्तान ) . एल.डी. कल्ल ( कश्मीर ) का मानना है कि आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे यहीं से विश्व के विभिन्न भागों में गए । इन इतिहासकारों के बरअक्स कमलेश्वर उपन्यास में इस मिथ को तोड़ते हुए , उस ऐतिहासिक सच्चाई का समर्थन करते हैं कि आर्य भारतीय मूल के नहीं वरन मध्य एशिया के थे और क्रोशिया के विंदिजा इलाके से चलकर वे कई शाखाओं में बंटते हुए ( रूस , मिस्र , तेहरान ) पूर्व दिशा में सूर्य की ओर बढ़ते हुए खैबर और बोलन दरें को पार कर सिंधु घाटी में दाखिल हुए ।

     अदीब की अदालत में इतिहास के दूसरे मिथ का भी पुरजोर खण्डन किया गया है कि तथाकथित मुस्लिम शासन हिन्दू भारत के लिए अनर्थकारी था और मुसलमानों ने नियमितता से हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद में तब्दील किया । महमूद गजनबी , मुहम्मद – बिन – कासिम , बाबर , औरंगजेब के ऊपर आरोप है कि उन्होंने हिन्दू धर्म का अपमान करने के लिए तथा इस्लाम को फैलाने के लिए हिंदू मंदिरों को तोड़ा । इसके पीछे धारणा यह रही है कि मुसलमान ही मन्दिरों को लूटेगा और मूर्तियों को तोड़ेगा क्योंकि इस्लाम धर्म मूर्तिपूजा का विरोधी है । वास्तविकता यह है कि सभी धर्मों के शासकों ने मन्दिरों को लूटा । कई मन्दिरों में धन का अंबार होता था जैसा कि उपन्यास में मुहम्मद – बिन कासिम अदीब से कहता है । – ” यह इल्जाम कि मैं तलवार के जोर पर हिन्दुओ हिंदियों को मुसलमान बनाने आया था । बिल्कुल बेबुनियाद और गलत है । … हुजूर ! मुझे तो मेरे मालिक हज्जाज ने हिन्द को लूटने भेजा था । … हिंदुओं के खजाने मन्दिरों के नीचे ही जमींदोज रहते थे । तालाब वाले उस मंदिर के नीचे उसने ( कश्मीर नरेश के सूबेदार जीबावन ) ताँबे के चालीस कोठारों में सोने का चूरा छिपा रखा था । कोठार तोड़ने से पहले मैंने मूर्तियों को तोड़ा था । मूर्तियाँ तोड़कर मुझे तीन सो मन सोना मिला था . फिर जब तालाब के अन्दर मन्दिर के नीचे वाले चालीस कोठारों को मैंने तोड़ा तो तेरह हजार दो सौ मन सोना मेरे हाथआया था । … तब मैं मन्दिरों को क्यों न तोड़ता अदीबे आलिया ?(3)  यह सच लगभग सभी आक्रमणकारियों के आक्रमणों के उद्देश्यों के पीछे लागू होता है । महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मन्दिर तोड़े जाने के पीछे भी वही उद्देश्य था । उसकी सेना में तो हिन्दू सिपाही भी थे । अगर कोई हिन्दू परम्परा की ओर निगाह डाले कि वे मन्दिरों के लुटेरे और मूर्तितोड़क थे या नहीं तो अनेक उदाहरण मिलते हैं । 11 वीं सदी के कश्मीर के राजा हर्ष ने मन्दिर तोड़े । इसका उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में है ? इसमें कहा गया है कि उसने मंदिरों में सोने की मूर्तियाँ उखाड़ने के लिए ‘ देवोत्पतन नायक ‘ नामक अधिकारी नियुक्त किए । परमार राजा शुभातवर्मन ने कैम्बे और डभाई में जैन मंदिर तोड़े और मन्दिरों को लूटा । औरंगजेब जैसे मुस्लिम शासकों पर लगाये आरोपों का खण्डन करते हुए ‘ हरबंश मुखिया ‘ लिखते हैं – ” कोई भी यह कल्पना कैसे कर सकता है कि किसी जनगण के हृदय को जीतने का तरीका है , जाकर उसके मंदिरों को तोड़ डालना ? मन्दिरों को तोड़ने से हिन्दू प्रजा के हृदय में इस्लाम के प्रति कम से कम नफरत जरूर पैदा होगी और प्यार तो निश्चित ही नहीं उपजेगा ।(4) अदीब की अदालत में इस मंदिर तोड़ने के मिथ को तोड़ते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि औरंगजेब ने सिर्फ उन्हीं मन्दिरों के प्रति कार्रवाई की जो दुराचार और विद्रोह के अड्डे समझे जाते थे । काशी के विश्वनाथ मन्दिर तोड़ने के पीछे वहाँ के पंडों द्वारा कच्छ की रानी का बलात्कार था , जिसका उल्लेख पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक ‘ फैदर्स एंड स्टोंस ‘ में किया है । बाकी मथुरा , उड़ीसा , सोमनाथ , उज्जैन के मंदिरों के तोड़ने के कारणों को शिबली नोमानी स्पष्ट करते हैं – ” मन्दिर और मस्जिद इबादतगाहों के साथ – साथ अपने – अपने मजहब के राय – मशविरे के केन्द्र भी हुआ करते थे । इन इबादतगाहों में बगावतों की साजिशें तैयार की जाती थीं । ईरानी , हिन्दुस्तानी और अंग्रेज इतिहासकारों को यह कहना गलत है कि आलमगीर ने मन्दिर तोड़े इसलिए बगावत हुई , सही वजह यह है कि बग़ावत हुई , इसलिए मन्दिर तोड़े गए ।(5) शिबली नोमानी का यह तर्क बहुत हद तक सही भी है क्योंकि औरंगजेब ने उन्हीं मन्दिरों को तोड़ा था जहाँ से उसे विद्रोह की आशंका थी जैसे मथुरा के जाट विद्रोह से वीरसिंह बुन्देला मन्दिर का ध्वंस बाकी मन्दिरों के प्रति उसकी नीति सद्भावनापूर्ण थी । उसने गैर – मुस्लिम धार्मिक स्थानों को जमीन और दूसरी सुविधाएँ देना जारी रखा था । वृन्दावन के मंदिर , देहरादून का सिख गुरुद्वारा इसके उदाहरण हैं ।

     मध्यकालीन इतिहास के इस मिथ की मुसलमान ( मुगल ) विदेशी थे और इनके खिलाफ हिन्दू शासक राणा प्रताप , शिवाजी और गुरुगोविन्द सिंह के संघर्ष को साम्प्रदायिक इतिहासकार राष्ट्रीय संघर्ष के रूप में पेश करते हैं जबकि उस समय राष्ट्रवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं थी । सुमित सरकार ‘ राष्ट्रवाद ‘ और ‘ सम्प्रदायवाद ‘ को अनिवार्य रूप से ‘ आधुनिक संप्रवृत्तियाँ ‘ कहते हैं । गत शताब्दियों में निश्चय ही हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं । ऐसे संघर्ष तो शिया और सुन्नियों में भी होते रहे हैं । 1855 के अयोध्या के हनुमानगढ़ी के विवाद को छोड़कर 1880 से पहले साम्प्रदायिक दंगे लगभग नहीं हुए थे । डॉ . नामवर सिंह भी मध्ययुग के भारतीय इतिहास का मुख्य अन्तर्विरोध शास्त्र और लोक के बीच का द्वन्द्व मानते हैं , न कि इस्लाम और हिन्दू धर्म का संघर्ष । बावजूद इसके राणा प्रताप और शिवाजी को इस्लाम के विरुद्ध हिन्दू संघर्ष का प्रतीक साम्प्रदायिकतावादी लगातार कटते आ रहे हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि राणा प्रताप अकबर से बढ़कर या शिवाजी औरंगजेब से बढ़कर राष्ट्रीय विभूति नहीं थे । क्योंकि इन्होंने पूरे भारत को एक करने के लिए संघर्ष किया। अदीब घोषणा करता है कि ” इतिहास के इस दौर तक आते – आते मुगलिया सल्तनत के वारिस मुसलमान हिन्दुओं के लिए विधर्मी जरूर थे , पर वे विदेशी नहीं थे … हिन्दुस्तान में हिन्दू बहुसंख्या में थे , उनके राज्य भी थे , लेकिन हिन्दुस्तान कभी भी हिन्दू राष्ट्र नहीं था । तब हिन्दू राष्ट्र नाम का कोई दार्शनिक प्राणबिन्दु और धार्मिक केन्द्रबिन्दु मौजूद नहीं था । “ (6)  गौरतलब है कि शिवाजी , महाराणा प्रताप , गुरुगोविन्द सिंह क्षेत्रीय और जातीय रूप से मुगलों से संघर्षरत थे । राणा प्रताप अखिल भारत की बात तो दूर रही , राजपूताना के लिए भी नहीं , बल्कि स्वयं अपनी रियासत के लिए लड़ रहे थे ।

     साम्प्रदायवादियों के आकांक्षाओं पर तुषारापात करते हुए यह उपन्यास बाबरी मस्जिद और भारत – विभाजन आदि को लेकर बने अनेक धुंध को भी साफ करता है । इस तरह उपन्यास अनेक मिथकों से पर्दा उठाकर पाठक को इतिहास का सच बताने वाली एक सफल कृति के रूप में परिणत हो जाता है ।

संदर्भ सूची

  • कितने पाकिस्तान – कमलेश्वर , पृष्ठ-95
  • इतिहास की पुनर्व्याख्या, ( विपिन चन्द्र का लेख , ‘ आधुनिक भारत के इतिहासकार और सांप्रदायिकता ‘ ) पृष्ठ-213
  • कितने पाकिस्तान – कमलेश्वर , पृष्ठ-152
  • इतिहास की पुनर्व्याख्या , ( हरबंस मुखिया का लेख ‘ मध्यकालीन भारतीय इतिहास और सांप्रदायिक दृष्टिकोण) पृष्ठ-113
  • कितने पाकिस्तान – कमलेश्वर , पृष्ठ-169
  • वही – पृष्ठ-227-228

 डॉ. चन्दन कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर( हिंदी विभाग)
राजकीय महाविघालय,पंचमोहिनी सिद्धार्थनगर