“जो बदलाव तुम दुनिया में देखना चाहते हो,

वह खुद में लेकर आओ” – महात्मा गाँधी

शोध सार:

महात्मा गाँधी के विचार विश्व के सामजिक एवं राजनैतिक आन्दोलन को प्रभावित किया। उनके विचार केवल दुनिया भर के लोगों को न सिर्फ प्रेरित किया अपितु करुणा, सहिष्णुता और शांति से भारत और दुनिया भर को बदलने का मार्गदर्शन भी किया। दुनिया भर में उत्पीडित समुदाय और हाशिये के समूहों की आवाज़ उठाने भी अमूल्य योगदान दिया। गांधीजी के विचारों का ओडिया साहित्य में गहरा प्रभाव डाला, विशेष रूप से उनके अहिंसावादी विचारधारा, स्वराज, खादी, सत्य और अस्पृश्यता उन्मूलन आदि गांधीजी ने 1921 और 1946 के बीच में ओडिशा के दौरे में किया। इसके कारण ओडिया साहित्यकारों और कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन मिला। उन्होंने ओडिया साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम और सामजिक परिवर्तन को प्रेरित किया। गाँधी जि से प्रभावित होकर कई आदिवासी नेता भी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी दर्ज की और अपने समाज को अन्धविश्वास और रूढिगत परम्पराओं से मुक्त करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने समाज को मुख्य समाज के साथ जोड़ने का भी प्रयास किया।

बीज़ शब्द:

महात्मा गाँधी, स्वतंत्रता संग्राम. गांधवादी दर्शन, ओडिया साहित्य, ओडिया साहित्यकार, खादी, स्वराज, स्वदेशी, अस्पृश्यता उन्मूलन, महिला शिक्षा, जातिगत भेदभाव

आमुख:

मोहनदास करमचंद गांधी, गुजरात के एक बनिया परिवार में जन्म लिए थे लेकिन उनके कार्य के प्रति निष्ठा जाति, भाषा, धर्म और लिंग की सीमाओं से परे थी। उनका ओडिशा ग्रस्त  के कारण ही ओडिशा में कांग्रेस विचारों का आगमन हुआ और स्वतंत्रता संग्राम की सुरुआत हुई। 1920 से पहले ओडिशा में ऐसा कोई प्रेरणा श्रोत नहीं हुआ जो अंग्रेजों के खिलाफ खडा हो सके और आन्दोलन को आगे बढ़ा सके। गांधी आने के बाद ही ओडिशा में राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नया मोड़ मिला। 1921 और 1946 के बीच में गाँधी ने सात दौरा ओडिशा राज्य का किया। पहले दौरे में उन्होंने मध्यम वर्गों के लोगों से मुलाक़ात की और उनका साथ देने का वादा किया। उनको समझने की कोशिश की जो कमजोर पृष्ठभूमि के थे जैसे नाई, किसान, बढ़ाई, मजदूर आदि।

महात्मा गांधी पहली बार 22 मार्च 1921 को ओडिशा का दौरा किया। इस दौरे का मूल उद्देश्य था कि असहयोग आन्दोलन को आगे बढ़ाना और ज्यादा से ज्यादा लोगों को सामिल करना। इस बार वे आठ दिन के लिए कटक में रहे और इस आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया। मार्च 23 को उन्होंने काठजोड़ी नदी के किनारे कटक में सभी ओडिशावासियों को आह्वान दिया। 25 मार्च को भद्रक में अपने भाषण के माध्यम से लोगों में उत्साह भरने का प्रयास किया। 26 मार्च को साक्षीगोपाल और 27 मार्च को पूरी में महिला सम्मलेन में आह्वान दिया। इन दिनों में काफी लोग गुण्डिचा मंदिर के पास इकट्ठा हुए। वे 28 और 29 मार्च पूरी में ही रहे और बाद में ब्रह्मपुर चले गए। उनका और एक लक्ष्य था कि ‘तिलक स्वराज खंड’ के लिए पैसों का जुगाड़ करना। ओडिशा से भी इस खंड के लिए योगदान दिया गया था। उनके स्वराज का लक्ष्य ओडिशा में सभी तरफ फैलने लगा था।

उनके कार्य को लेकर चिंतामणि आचार्य ने ‘गाँधीन्क स्वराज’ जगबंधु सिंह ने ‘कटक एवं गाँधी महात्म्य’ आदि किताब लिखे गए। जिसे स्वतंत्रता संग्राम को और भी प्रेरणा मिली। 19 अगस्त 1925 में महात्मा गाँधी फिर से ओडिशा आये। इस बार उनको मधुसुदन दास ने ओडिशा आने का निमंत्रण दिया था। इस बार उन्होंने कटक के नगरपालिका का के परिसर में अपन वक्तव्य को सांझा किया था। इस बार उन्होंने मधुसुदन दास के साथ उनके कार्यस्थल घुमने गए और उसके साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव को दूर करने का कोशिश किए। गाँधीजी के विचारों से प्रभावित होकर गोविन्द मिश्र ने सालेपुर के पास गंध सेवाश्रम का स्थापना किया, ताकि गांधीजी के कार्य को आगे बढाया जा सके।

फिर वे 1927 में ओडिशा आये। इस बार वे गंजाम में कुछ दिन रुके। 1927 में गाँधी ओडिशा के कटक के यात्रा पर थे, जब महान बंगाली वकील- देशभक्त सी.आर. दास की बहन उनके लिए भोजन बनाने के लिए आयी। रामकृष्ण परिहारी ने गांधीजी के 1927 ओडिशा ग्रस्त से संबंधित उत्कल दीपिका पत्रिका में लिखा कि – “ गांधीजी के इस दौरे से ओडिशावासी बहुत उत्सुक हैं। उनका कहना था कि ओडिशा प्रान्त के वासी आलस त्याग कर कुछ गठनात्मक कार्य में सुचारू रूप से भाग लें।” 16 नवम्बर 1927 को गांधीजी ने ओडिशावासियों के लिए एक पात्र लिखा जिसमें लिखा था कि – “मुझे गरीब से गरीब वर्ग के लोगों को देखना है, उनके पास जाना है और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा भी करना है।”

महात्मा गाँधी के नेतृत्व में दांडी मार्च तथा नमक सत्याग्रह 1930 ने ओडिशा के साथ-साथ पुरे देश को प्रेरित किया। इस कानून के विरोध में बालेश्वर जिले में समुद्र के पानी से नमक बनाकर इस कानून को तोडा। सरकारी नमक कारखाने के सामने लोगों ने धरना प्रदर्शन किए। इस का नेतृत्व ओडिशा में कांग्रेस समिति के अध्यक्ष एच.के.महताब ने किया। दांडी मार्च के सफलता के बाद जवाहरलाल नेहरु ने ओडिशा के लोगों के बारे में लिखते हैं कि –          “ उत्कलवासियों को मेरा सादर नमन। राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में उनके बलिदान और पीड़ा को मैं ने सुना। मैं इस केलिए उनको धन्यवाद देता हूँ एवं मैं आशा करता हूँ कि वे अपने मातृभूमि की आज़ादी की लडाई को आगे लेकर जाएँगे। (My greetings to the people of Utkal. I have heard of their sacrifice and sufferings in the National Struggle for Freedom. I congratulate them and trust they will carry on the good fight till our Motherland is free.)

उनका एक और दौरा ओडिशा में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए थी। वे ओडिशा के किसी भी स्थान पर गए और पाया कि उच्च जाति के लोग नीचे जाति के लोगों के साथ मिलते-जुलते नहीं हैं। इस लिए उन्होंने सभी उच्च वर्ग से आग्रह किया कि वे निम्न वर्ग के लोगों के साथ खाना खाएं, उन्हें शिक्षा का अवसर दें, उन्हें मंदिर में प्रवेश दें। जैसे उन्होंने बालकाटी में अपने व्यक्तव्य में उन्होंने भाषण में कहा था कि – “मानवीय अहंकार अस्पृश्यता की जड़ में है। तपेदिक की तरह, अस्पृश्यता भी मनुष्य को निगल जाती है। हमें खुद को इस बिमारी का शिकार नहीं बनने देना चाहिए। पूरी दुनिया हमें देख रही है। अगर हम इस पाप को नहीं धोएँगे, तो लोग हम से घृणा करेंगे।” लोग गांधीजी से मिलने के लिए मीलों पैदल चलते थे और गांधीजी उनसे मिलने के लिए मीलों चलते थे। उनकी एक झलक पाने के लिए लोगों में जो उत्साह थी उसकी कोई कल्पना भी नहीं किया जा सकता। 1934 की दौरे में उन्होंने पाया कि वे जो अस्पृश्यता उन्मूलन करना चाहते थे उन विचारों को कुछ लोगों ने तो सैद्धांतिक रूप से ग्रहण किया तो कुछ ने उसका विरोध किया। गांधीजी ने यह महसूस किया कि लोग ब्रिटिश सरकार की गोलियों का सामना तो कर रहे थे किन्तु वे इस सामाजिक रूढ़िवादी परम्परा से लड़ना नहीं चाहते थे। 1934 में महात्मा गाँधी फिर ओडिशा आये। यह उनका बहुत महत्वपूर्ण ओडिशा ग्रस्त था। इस में उन्होंने ओडिशा के झारसुगुडा से अपनी पतितपावन यात्रा सुरु किया जो अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए था। इस में उन्होंने दलितों के बस्तियों का भी दौरा किया। इस में वे बामुर और अनगुल भी गए। अनगुल में उनको रहने की अनुमति नहीं मिली, इसलिए वे सहर के बाहर ही रहने लगे।

1938 में वे ओडिशा ‘खादी केंद्र’ का उद्घाटन के लिए आये थे। यह उद्घाटन गाँधी सेवासंघ, डेलांग के चौथे वार्षिक अधिवेशन 1938 में बेराबोई में आयोजित किया गया था। बेराबोई स्थल के खादी केंद्र कृपासिंधु होता की तत्वावधान में चलता था। वे अपने वक्तव्य में बताए कि ओडिशा उनके सबसे पसंदीदा स्थान है जो उनके ह्रदय के करीब है। जब से वे ओडिशा आए तब से वे ओडिशा के गरीबी और भुकमरी के बारे में सुने हैं। इसके बाद ओडिशा उनके लिए एक तीर्थ केंद्र के रूप में उनके हृदय में स्थान बनाया। वे चाहते थे कि वे दलितों की आवाज़ को नया मुकाम दें। उनका लक्ष्य था कि वे ओडिशा को खुशहाल और प्रगतिशील राज्य के रूप में स्थापित करें। ओडिशा का अंतिम दौरा गांधीजी ने जनवरी 1946 में किया।

महत्मा गाँधी के निर्देशानुसार ओडिशा में कई खादी तथा हस्तनिर्मित वस्तुएं के कार्यालय खोले गए और इसमें उनके सहयोगी के रूप में गोपबंधु दास, निरंजन पटनायक, आदि कार्य करने लगे। ओडिशा एक गरीब और प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ से प्रभावित राज्य है इस लिए ज्यादातर लोग बेरोजगार हैं। स्वदेसी मन्त्र के साथ खाड़ी का प्रचार-प्रसार जितना बढ़ता गया उसके साथ-साथ लोगों को रोज़गार भी बढ़ता गया। इससे लोगों की आर्थिक स्थिति में भी परिवर्तन देखा जा सकता है । वे ओडिशा के लोगों में आत्मनित्भार्ता को भरना चाहते थे जो खादी के प्रचार-प्रसार के माध्यम से संभव था। कांग्रेस कार्यकर्ता इस ‘स्वदेसी’ मन्त्र को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करा रहे थे।  यह उनका एक बड़ा योगदान ओडिशा के लोगों के लिए था।  जो उन्होंने पाने भाषा में एक बार कहा था कि “भारत का ओडिशा एक गरीब राज्य है एवं इसकी गरीबी को दूर क्या जा सकता है यदि कोई एक भी खादी का प्रयोग करेगा।”(Orissa is the poorest province in India and this can be easily removed if evenly one uses Khadi) वे इसके प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अलग-अलग स्थान पर अभियान शुरू कर दिया।  उनका मूल लक्ष्य खादी और चरखा को ज्यादा से ज्यादा कार्य में लाये ताकि लोगों को काम मिल सके।

गांधीजी के विचारों का प्रभाव महिलाओं पर भी देखने को मिलता है। उनके भाषणों और विचारों की गरिमा से प्रभावित होकर ओडिशा की महिलाएं अपने घर के बन्धनों से निकल कर राजनैतिक तौर पर अपनी भागीदारी दर्ज की उसके साथ-साथ समाज सेवा के कार्य के लिए गाँव-गाँव में अपना कार्य भी किया। प्रमुख रूप से भाग लेनेवाली महिलाओं में रमा देवी, सारला देवी, मालती देवी आदि आगे बढ़ कर अन्य महिलाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य करने लगी। गांधीजी का जो विचार था कि सामजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर ओडिशा को मजबूत और प्रगतिशील बनाने का कार्य उसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। अपने विचार और लोगों की अपने देश की आज़ादी के लिए जागृत करने के लिए गांधी ने ओडिशा ग्रस्त के समय कई पद यात्रा करने लगे। कई लोगों से प्रत्यक्ष रूप से साक्षात करने लगे, उनका जो बिचार था उसको भी वे घर-गहर जाकर समझाने लगे। इस से महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन परिलक्षित होने लगी। उनके अस्तित्व को भी पहचान मिलने लगी।

उपसंहार:

महात्मा गांधी मूल रूप से ओडिशा के गरीबी और प्राकृतिक आपदाओं के कारण होनेवाली भुकमरी और उसके कारण होनेवाली सामाजिक और आर्थिक प्रगति में बाधाओं को लेकर चिंतित थे। वे ओडिशा में अस्पृश्यता उन्मूलन, जातिगत भेदभाव आदि को लेकर जनता की सोच को बदलने का कार्य किए। उनका और एक महत्वपूर्ण कार्य था स्त्री शिक्षा और उनको राजनैतिक और आर्थिक भागीदारी में सामिल करना। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आन्दोलन में ओडिशावा सियों की भागीदारी एक और महत्वपूर्ण घटना है। गांधीजी ओडिशा को भाषाई, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर विश्व पटल में स्थापित करना चाहते थे। उनका मूल लक्ष्य था कि ओडिशा एक खुशहाल और प्रगतिशील राज्य के रूप में विश्व में अपना प्रतिनिधित्व करें।

 डॉ. भारती लक्ष्मी पाल
अतिथि प्राध्यापिका, हिंदी विभाग
गुलबर्गा विश्वविद्यालय, कलबुरगी, कर्नाटक
एवं
के.बी.एन. विश्वविद्यालय, कलबुरगी, कर्नाटक