
सारांश
हमारे समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी जो गीत, नृत्य, नाट्य, कथा, कहानी मौखिक रुप में जन साधारण में प्रवाहमान है उसी को लोक साहित्य कहा जाता है। लोक साहित्य लोक मानस की अभिव्यक्ति है। हमारे समाज के सभी लोगों की आशा-आकांक्षा, हर्ष-विषाद इस लोक साहित्य में समाहित है। लोक साहित्य के अनेक विधाओं में से लोक गीत, लोक नाट्य, लोक नृत्य और लोक कथा प्रमुख हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में असमिया लोक गीतों में महात्मा गांधी को किस रुप में चित्रित किया है, उसी के बारे में विस्तृत रुप में आलोचना की गई है।
प्रस्तावना
लोक मानस की अभिव्यक्ति ही लोक गीत है। असम में लोक गीतों के भण्डार बहुत ही विशाल है। यहाँ जीवन के हर एक पहलु पर लोक गीत मिलते है। जन्म से पहले, जन्म के बाद, विवाह के समय, विवाह के बाद, मृत्यु के समय, धान रोपते समय, धान काटते समय, पालने के गीत, मछली पकड़ते समय, नाव चलाते समय,उत्सव-पर्वन-अनुष्ठान के समय, स्वाधीनता संग्राम के समय गाये गए असंख्य गीत हमारे समाज में मिलते है।
असमिया लोक गीतों का वर्गीकरण करना अत्यन्त जटिल कार्य है। फिर भी कुछ आलोचकों ने इस जटिल कार्य को करने के लिए प्रयास किया हैं। डॉ. सत्येन्द्र नाथ शर्मा ने असमिया लोक गीतों को मूलतः तीन भागों में विभाजित किया है- (I) आनुष्ठानिक लोकगीत, (II) आख्यामूलक लोकगीत, (III) विविध विषयक लोकगीत। डॉ. हेमन्त कुमार शर्मा ने असमिया लोकगीतों को चार भागों में विभाजित किया हैं- (I)आनुष्ठानिक, (II)कर्म विषयक, (III)आख्यान मूलक, (IV)जूना तथा हँसी मजाक के गीत। ‘आनुष्ठानिक’ को फिर से (क) भक्ति निरपेक्ष और (ख) भक्ति मूलक दो भागों में विभाजित किया है। डॉ. भूपेन्द्र नाथ रायचौधुरी ने असमिया लोकगीतों का वर्गीकरण अपेक्षया विस्तृत रुप में करने का प्रयास किया है। रायचौधुरी ने असमिया लोकगीतों को मूलतः छः भागों में विभाजित किया हैं- (I)संस्कार विषयक,(II) पूजा और धर्म विषयक, (III)ऋतु विषयक, (IV)कर्म विषयक, (V) राजनैतिक विषयक और (IV) विविध विषयक । पूजा और धर्म विषयक गीतों को उन्होंने फिर से चार भागों में विभाजित किया है- (क) व्रत-पर्व त्योहार (ख) मांगलिक त्योहार। (ग) दार्शनिक आख्यान मूलक (घ) भक्ति विषयक। प्रस्तुत शोध पत्र में केवल राजनीति विषयक जिन लोक गीतों में महात्मा गांधी के बारे में उल्लेख मिलता है उन्ही गीतों का सम्यक अध्ययन किया जाएगा।
राजनीति हमारे जीवन का अविच्छिन्न अंग है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में राजनीति के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जुड़ा हुआ होता हैं। इसी कारण लोकगीतों में राजनीति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। राजा महाराजाओं के समय से लेकर तत्कालीन समय तक के बहुत सारी घटनाएँ इन गीतों में समाहित हैं। राजनीति विषयक गीतों में कम्पनी शासन विषयक, स्वतन्त्रता तथा महात्मा गांधी विषयक और चीनी आक्रमण आदि से सम्बन्धित गीतों को रखा गया है। इस तरह के गीतों को ऐतिहासिक गीत भी कह सकते है।
असमिया लोक गीतों में महात्मा गांधी
देश जब अंग्रेजों का गुलाम था तब अंग्रेजों द्वारा सम्पूर्ण देश के लोगों को विभिन्न तरह से सताया गया था। गरीब जनता के ऊपर लगान बृद्धि, मूल्य बृद्धि से लेकर हर तरफ से शोषण और अत्याचारों के कारण लोगों के मन में गुलामी की बेढ़ियों को काटने के लिए ललक पैदा हुई। इसी ललक से बीज रूप में स्वतन्त्रता संग्राम शुरू हुआ। सन् 1917 में महात्मा गांधी इस स्वतन्त्रता संग्राम में पैर रखे। बहुत ही कम समय में गांधी जनता के हृदय में प्रवेश करने के लिए सक्षम हुए। उनके अहिंसा आन्दोलन ने हर एक भारतीय के मन में छाप पहुँची। भारत की साधारण जनता महात्मा गांधी को भगवान के अवतार मानने लगी थी। मेरे विचार में भारत के प्रत्येक भाषा के लोक गीतों में महात्मा गांधी को स्थान मिला है। असमिया लोगों ने भी अपने लोक गीतों में गांधी बाबा को समाहित कर लिया। गांधी जी के आदर्शों से प्रभावित असम के स्वतन्त्रता सेनानी लोकप्रिय गोपिनाथ बरदलै, नवीन चन्द्र बरदलै, देशभक्त तरूणराम फुकन आदि के नेतृत्व में स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने के लिए असम की जनता कमर कसकर आगे बढ़ आए थे। स्वराज और अहिंसा का प्रचार इतनी हद तक हुआ कि लोक गीतों में भी इसका प्रभाव पड़ा-
नवीनोर बारीते सनिधरे गछ
तार चारि फाले बेरा
स्वराज लबा लागि हाते मुखे धरि
हिंसा- खङके एरा।
(भावार्थ- स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए हमें हिम्मत के साथ आगे बढ़ना होगा। पर इसके लिए हिंसा को त्यागकर
अहिंसा को अपनाना होगा।)
स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान सन् 1921 में गांधी जी असम आए थे। उस समय विदेशी कपड़ा विसर्जन और स्वदेशी कपड़ा तथा खादी के प्रयोग के लिए उनका जो आह्वान था, उससे असमवासी अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसी से सम्बन्धित लोकगीत का एक हिस्सा उदाहरण के रूप में प्रस्तुत है, जिसे यहाँ लोग चरखे में सूत कातते समय गाया करते थे-
गांधी सूता काटो गांधी सूता काटो
शलाकाठिर आँर लागिछे
भलन्टारोक मातो
गांधी सूता काटो ।।
(भावार्थ- प्रस्तुत गीत में सूत काटने के कार्य को गांधी कार्य का नाम दिया गया है। गांधी सूता काटते जाओं। सूता काटते समय कुछ गड़बड़ी हो रही है। इसलिए भलन्टियर (कार्यकर्ता) को जल्दी बुलाकर लाओ।)
महात्मा गांधी के आह्वान से असम के सभी जनता अपने प्राणों का मोह छोड़ कर मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने लिए आगे बढ़े। स्वतन्त्रता संग्राम में देश के वृद्ध, युवक, युवतियों के हृदय में उल्लास पैदा करने के लिए स्वाधीनता विषयक लोक गीतों ने अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदाहरण के रूप में एक गीत नीचे द्रष्टव्य है-
ब’ला भाई ब’ला भाई
वीर दर्पे आगुवाई
ब’ला भाई ब’ला भाई
जननीर जय गान गाई।
ऐइ देश आमार देश
चावा तार काङाल वेश,
धन-जन-प्राण नोहे मूल्यवान,
सकलोवे आहाँ आजि
करो अग्नि स्नान,
महात्मार आज्ञा मानि
दिउ सवे आत्म बलिदान।
(भावार्थ- मातृभूमि की जयगान गाते हुए हम सब अपने छाती तान कर आगे बढ़े। यह देश हमारा है। इसकी दरिद्रस्थिति को अच्छी तरह से देखो। अपने मातृभूमि के सामने परिवार, धन. प्राण सब कुछ तुच्छ है। आओ, आज हम सब मिलकर अग्नि में स्नान करे। गांधी जी की आज्ञा मानकर सब लोग देश के लिए आत्म बलिदान दे।)
स्वाधीनता संग्राम के समय महात्मा गांधी ने एक और आह्वान किया था कि भारत देश की जनता अपनी जाति-धर्म, जात-पात सब कुछ भूलकर एक शुद्ध भारतीय होकर सब लोग एक साथ मिलकर संग्राम करे, तब हम स्वाधीनता प्राप्त कर सकते है। उन्होंने देश के सभी धर्म के लोगों को एकत्रित रखने के लिए जीवन के अन्त तक प्रयास किया। इसका झलक भी असमिया लोक गीतों में देखने को निलता हैं-
जाग जाग जाग आजि
हिन्दू-मूसलिम भाई भनी जाग
देशर हके प्राण बलि दिम
नाई आमार एको भय
अहिंसा आमार रण
हिंसार नाई ठाई
हय करिम नहय मरिम
एयेइ आमार पण।
जाग जाग जाग आजि
हिन्दू-मुसलिम ऐक्य ह’ब
गांधी आमार रणनेता
नाई जे एको भय।।
(भावार्थ- हिन्दू-मुस्लिम सब भाई बहन जाग उठो। अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों का बलिदान देने का समय आ गया। अहिंसा ही हमारा रण है, जहाँ हिंसा का कोई स्थान नहीं। ‘करेगें या मरेगें’ यही हमारा प्रण हैं। देश के हर एक हिन्दू मुस्लिम एक साथ मिलकर अंग्रेजों से लड़ेंगे तो जीत अवश्य ही होगा। इस युद्ध में गांधी हमारा मुख्य नेता है, हमें किसी से कोई भय नहीं।)
इसी भावधारा के अनेक गीत असमिया लोकगीतों में मिलते हैं। सभी गीतों को उल्लेख करना यहाँ सम्भव नहीं है। असमिया भाषा में कुछ लोकगीत हैं जिसे ऐतिहासिक मालिता कहा जाता है, जो गीत किसी ऐतिहासिक घटना के आधार पर प्रतिष्ठित है वही ऐतिहासिक मालिता है। कभी कभी इतिहास के निर्माण में ऐतिहासिक मालिता तात्पर्यपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस तरह के लोकगीतों में ऐतिहासिक पात्र के चरित्र देखने को मिलता है। इसी कारण ये गीत साधारणतः वीर रस प्रधान होते हैं। जनता के हृदय में जातीय चेतना जागृत करने के लिए इन लोकगीतों का महत्वपूर्ण अवदान देखने को मिलता है। जिन जातियों या जनजातियों का लिखित रूप में इतिहास नहीं है, उन लोगों में इस तरह के गीत इतिहास की भूमिका निभाते हैं। असमिया भाषा में अभी तक संकलित और प्रकाशित ऐतिहासिक लोकगीतों में प्रमुख है-बरफूकनर गीत, पद्मकुमारीर गीत, मणिराम देवानर गीत, जयमती कुँवरीर गीत, आजान फकीरर गीत, पथरूघाट रण, गांधीर गीत आदि।
असम के बाघमरा अंचल से संकलित एक लोक गीत (ऐतिहासिक मालिता) का उदाहरण नीचे दिया गया है। इस लोकगीत में महात्मा गांधी के जन्म उनके कर्ममय जीवन से लेकर आतातायी के हाथों उनकी मृत्यु तक की कथा को समाहित किया गया है –
गाँधी नामर नाऊ खेनि जवहरलाल बेठा।
स्वाधीन आमि पालो भन्नी सूता काटि ऊठा।
एकशत दुईशत तिनिशत बरे।
गुजराते जन्म पाइछिल गाँधी महावीर।।
गांधीहे लिखिला हरिरे नाम।
कि करा जहरलाल भारतर काम।।
बिदेशी जाब बलि मनते आखा।
बन्दी करि मन्त्रीक जेलते राखा।।
जेलर भितरे मन्त्रीहे भावे मने मने।
मौ थाकलो जेलते बिदेशी खेदे कोनो ?
————————————
गांधीक गुलि देगं बुलि थइ दिला।।
गांधीर बुके दिला गुली ह’ल तेजेरे रागंलि
बइ गेल तेजरे नइ।
——————————-
अकालते गांधी राजाई आमाक एरि थइ
स्वर्गले गेल रथे चरि।।
(भावार्थ- स्वाधीनता संग्राम में गांधी और जवाहरलाल दो अभिन्न जोड़े हैं। एक नौका है तो दूसरा पतवार। सूत कातकर हमें स्वाधीनता प्राप्त हुई है। गुजरात में गांधी का जन्म हुआ था। भगवान के ऊपर उनका अगाध विश्वास था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान सभी नेताओं को जेल में डाला गया था, और सभी के मन में यह आशा थी कि देश बहुत जल्द ही विदेशियों से मुक्त हो जाएगा। जेल में रहकर नेता लोग इस बात को लेकर चिन्तित थे कि अब विदेशी को भगाने का काम कौन करेगा। कुछ आतातायी ने गांधी को मारने के लिए बम तैयार किए। आतातायी ने गांधी को गोली मार दी और वह खून से लथपथ हो गए। यमुना के तट पर चन्दन की लकड़ी से अंतिम संस्कार किया गया। कम उम्र में ही गांधी हमें छोड़कर चले गए।)
हमारे समाज में विभिन्न तरह के असामाजिक कार्य घटित होते रहते है। इस तरह के अनैतिक कार्य के कारण समाज जीवन के प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है। कृष्टि-संस्कृति को ठेस पहुंचती है। फिर भी ऐसे कर्मों के विरोध आवाज उठाने में लोग संकोच करते या दड़ते है। ऐसे स्थिति में व्यंगरूपी वाण ही प्रयोग किया जाता है। समाज संस्कार के लिए व्यंग्य को ब्रह्मास्त्र के रूप में व्यवहार किया जाता है। असम में इस तरह के बहुत सारे व्यंग्य गीत मौखिक रूप में प्रचलित हैं। निम्नलिखित लोकगीत में स्वाधीनता संग्राम के समय कुछ सुविधावादी लोगों के खिलाफ व्यंग वाण कसा गया है। इस तरह के लोग गांधी का नाम लेकर सभी सुविधा प्राप्त करते रहते हैं। प्रस्तुत लोकगीत में बार-बार गांधी का नाम लिया गया है।
चालोत आछे जालि कुमरा
कुकुर सुतार पात ए।
लोने-तेले रान्धे-बाढ़े
कुकुर सुतार पात ए।
बाँहोर कणीत सूता भरे
नबीन दलैक मात ए
कुकुर सुतार पात ए।
बाटोरे दुवरि मई फेलाउ उभालि
गांधी आहिबो बुलि
गांधी आहिचे पदूलित बहिछे
आनागौ चोँवरे बरि।
कोँचते कटारी दिया गांधी राजा
शिलोते धरिले उइ
नुख भरि भरि बोला हरि हरि संसारोर नुमाई दिउँ जुइ।….
…………………………………
हाते हाते दिला निरमालि
माथा भरि लउँ,
बिदाय दिया गांधीर राजा
घराघरि जाउँ।।
(भावार्थ- स्वाधीनता संग्राम के समय देश के ज्यादातर लोग अभावग्रस्त थे। लेकिन उस समय नवीन दलै के घर के छत पर भर भर कर कद्दु लगा हुआ है। और उनके घर में खाने पीने का कोई अभाव नहीं। गांधी के प्रति हमारे मन में अगाध प्रेम हैं। गांधी के जगह पर गाँव के सारी जनता जेल जाने के लिए तैयार हैं। गांधी के साथ सभी भलन्टियर जेल में गए। इस कारण जनता के आँखों में आँसू हैं। लेकिन नवीन, अरुण जैसे सुविधावादी लोग आराम से बात बनाते हुए बाहर घूम रहे हैं। अन्त में गांधी हमारे हाथों में निर्मालि देते हैं और हम घर लोट आते हैं।)
निष्कर्ष-
विस्तृत अध्ययन के पश्चात हम यह कह सकते है कि महात्मा गांधी को अपनी प्रेरणा या नायक के रूप में लेकर असमिया समाज में बहुत सारे लोकगीत प्राप्त हैं। कभी विदेशी कपड़ा वर्जन और स्वदेशी कपड़े के प्रयोग को विषय बनाया गया है तो कभी हिंसा त्यागकर अहिंसा नीति ग्रहण करने के लिए, तो कभी जाति धर्म भूलकर सभी एकत्रित होकर स्वाधीनता संग्राम में टूट पड़ने के लिए शक्ति के रूप में गांधी बाबा को लेकर गाए गए असंख्य असमिया लोकगीत हमारी ग्रामीन जनता के बीच में आज भी प्रवाहमान हैं। अनेक शोधकर्ता इन लोक गीतों को एकत्रित करने के लिए प्रयासरत हैं। पहले संकलित गीतों को ‘गाँधी-नाम’ नाम से प्रकाशित किया गया है। स्वाधीनता संग्राम के समय लोगों के आशा-आकांक्षा, हर्ष-विषाद युक्त राजनैतिक मनोभावों का चित्रण इन लोक गीतों में मिलता है। इन लोकगीतों को तत्काल संग्रह नहीं किया जाएगा, तो वे अतीत के गर्भ में समा जाएंगे।





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