भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था। वह एक सांस्कृतिक और नैतिक पुनर्जागरण भी था। महात्मा गाँधी के आदर्श सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज और समानता ने देश के जन-मानस में गहरी पैठ बनायी। अवधी लोकगीत लोक-जीवन की आत्मा हैं। अतः ये गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। प्रस्तुत शोध आलेख में अवधी लोकगीतों में गाँधीवादी विचारों की अभिव्यक्ति उनके सामाजिक, सांस्कृतिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।
भारतीय समाज की आत्मा उसके लोक साहित्य में बसती है। लोकगीत उस लोक जीवन की संवेदना है जहाँ शिक्षा का औपचारिक माध्यम नहीं होता है बल्कि लोकानुभव ही संस्कृति का वाहक होता है। अवधी क्षेत्र अयोध्या, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली, लखनऊ, लखीमपुर, सीतापुर, उन्नाव आदि जिलों में बोली जाने वाली अवधी भाषा लोकजीवन का जीवन्त दर्पण है। महात्मा गाँधी जब भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के माध्यम से ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात करते हैं तब उनके विचार स्वाभाविक रूप से लोक संस्कृति से जुड़ जाते हैं। गाँधीवाद ने जहाँ सत्य, अहिंसा और स्वदेशी की बात की, वहीं अवधी लोकगीतों ने भी इन्हीं मूल्यों को लोकभाषा में गाया।
गाँधीवाद कोई शुष्क राजनीतिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि लोकजीवन का आध्यात्मिक मार्ग है। गाँधी जी के आदर्श भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े हुए हैं। गाँव, श्रम, नैतिकता और प्रेम की संस्कृति पर पलता है। इसी कारण यह विचार ग्रामीण अंचलों के लोकगीतों में सहज रूप से प्रभावित हुआ। लोकगीतों में बापू, खादी, चरखा और अहिंसा जैसे प्रतीक लोकमानस के आदर्श बन गए। गाँधी जी का प्रभाव केवल नेताओं तक सीमित न रहा बल्कि ग्राम गीतों और जन-भक्ति के स्वर में भी समाहित हुआ। वैसे भी गाँधीवाद कोई केवल राजनीतिक दर्शन नहीं था, बल्कि यह लोकचेतना का आन्दोलन था। गाँधी जी ने ग्रामीण भारत को अपनी साधना का केन्द्र बनाया। उनके विचारों का प्रभाव उत्तर भारत के गाँवों तक पहुँचा और अवधी अंचल के लोकगीतों में यह प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अवधी लोकगीतों में सत्य, श्रम, नैतिकता, प्रेम, करूणा और सामूहिकता जैसे मूल्य गाँधीवादी जीवन दर्शन के प्रतीक हैं। लोक गायक अपने गीतों के माध्यम से लोगों में सत्य और नैतिकता के प्रति जागृति लाते हैं।
गाँधीवाद का आधार सत्य और अंहिसा है। अवधी लोकगीतों में हिंसा के बजाय भाईचारे और प्रेम का सन्देश मिलता है। जो गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन की आत्मा था। अवधी लोकगीतों में गांधी आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। वे लोकमानस में आदर के पात्र हैं। उनका व्यक्तित्व अनूठा है। उनके ओजस्वी भाषण और सत्य, अहिंसा के व्रत ने अंग्रेजों को भारत से भागने के लिए विवश किया और सदियों से गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। गाँधी जी का अहिंसा व्रत लोक-जीवन में राष्ट्र प्रेम का आधार बन गया –
बन्दन हम करत तुम्हारी,
जिन भारत भार उतारी। अहिंसाधारी
उदै अस्त अँगरेजन की सागा,
बिना रोक जग ड्वालै पताका।
बताइ बात निकारी। अहिंसाधारी
धनि भारत के भागि-बिधाता,
धनि-धनि बापू राष्ट्र-निरमाता।
जननी जइसे रही है दुखारी,
वइसेन करि दीन सुखारी। अहिंसाधारी
अइसि अनोखी लड़ेउ है लड़ाई,
अड़ु बम केरी सकति गै हेराई।
गोरा भागि अस्त्र डारी। अहिंसाधारी …….(1)
गाँधी जी का मानना था कि भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। इसलिए उन्होंने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की। ग्राम स्वराज्य में उन्होंने पंचायती व्यवस्था, हस्तकला, स्वदेशी उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थानीय व्यवस्था का समर्थन किया और सत्य तथा अहिंसा को स्वराज्य का मार्ग बताया। आज जब लोकतन्त्र को केवल शासन प्रणाली समझ लिया गया है तब गाँधी का स्वराज्य हमें याद दिलाता है कि सच्चा लोकतन्त्र तभी सम्भव है जब नागरिक, नैतिक, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बने।
हम भारतवासी, पाये सुराज सही रे सही।
मिले गाँधी जवाहिर, एक बात कही रे कही।।
सब कातहु चरखवा, सुख कर मूल यही रे यही।
छ्वाड़ौ कपड़ा बिदेसी, खद्दर लेहु गही रे गही।।
छ्वाड़ौ कपड़ा बिदेसी, खद्दर लेहु गही रे गही।।
छ्वाड़ौ फूहरि गारी, लाला भवानी कैबात सही रे सही।
सुन्दर चरखा चलावौ, अब घर-बार सभी रे सभी।।
पहिरौ खद्दर मोटिया, सुनौ नर-नारी सभी रे सभी ।
प्यारे हिन्दू-मुसलमान, आपुस मँ मेल चही रे चही।। …….. (2)
गुलाम भारत में गाँधी जी भारत माता को आजाद कराने का प्रमुख चेहरा थे। अतः आधुनिक युगीन राजनीतिक चेतना का नेतृत्व महात्मा गाँधी द्वारा हुआ। गाँधी जी ने देश को विभिन्न रूपों में प्रभावित किया। उनके इस प्रभाव की अभिव्यक्ति उस समय रचे गीतों में मिलती हैं। लोक गायकों ने अपनी ओजस्वी वाणी में गाँधी और जवाहर का सन्देश घर-घर तक पहुँचाया। ‘‘वर्ष 1917 में बिहार के चम्पारण में सत्याग्रह गाँधी जी का पहला सत्याग्रह था।’’
चम्पारण में नील के खेतों में कार्य करने वाले किसानों पर यूरोपीय नील बागान मालिक अत्यधिक अत्याचार करते थे।’’ ……… (3) अतः गांधी जी ने किसानों की पुकार को सुना। उनके कष्टों का अनुभव किया और उन्हें कष्ट-मुक्त कराने के लिए वीणा उठाया। इससे गाँधी जी भारतीय लोक-मानस में भगवान राम और कृष्ण की तरह एक अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। और लोगों के अंदर दृढ़ विश्वास हो गया कि गाँधी जी हैं जो भारत का भार हरण कर सकते हैं।
अउतार महतिमा गाँधी कै, भारत कै भार उतारै का।।
सिरी राम की सेना बाँदर, औ सिरी क्रिस्न की सेना ग्वालबाल।
गाँधी के साथे पबलिक है, भारत कै भार उतारै का।।
सिरी राम की सेना में साथे लछिमन औ सिरी क्रिस्न के साथ बलदाऊ।
गाँधी के साथ जवाहिर हैं, भारत कै भार उतारै का।।
सिरी राम के हाथे धनुखबान, सिरी क्रिस्न के हाथे चक्र रहा।
गाँधी के हाथे चरखा है, भारत कै भार उतारै का।।
सिरी राम जी मारिनि रवना का, सिरी क्रिस्न सँवारिनि कंसा का।
गाँधी जी जग माँ परघट भये, अँगरेजी राज हटावै का।। ……(4)
गाँधी जी का चरखा आन्दोलन बहुत महत्वपूर्ण है। चरखा आन्दोलन का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। अवधी समाज का प्रत्येक स्त्री और पुरूष तथा बूढ़ा बच्चा और जवान अत्यन्त उत्साहित होकर इस आन्दोलन से जुड़ता जा रहा था। सभी इस आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहते थे। अंग्रेजों के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रही जनता अति शीघ्र गाँधी जी के निर्देशों पर चलकर स्वदेशी अपनाने की ओर अग्रसर थी। लोक कण्ठ अपनी धुन में गुनगुना रहा था।
चरखा चलै मजेदार रे,
लिख-लिख भेजूँ, मैं तार रे।
अपने स्वदेशवा के कपड़ा बनइबै,
सजिहैं आपन बजार रे। …………. (5)
धीरे-धीरे गाँधी जी के ओजस्वी भाषणों को सुनकर तथा उनके कुशल नेतृत्व से सामान्य लोग भी निर्भीक हो गए थे। लोगों ने गाँधी जी के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना प्रारम्भ कर दिया था।
अपने हाथन से चरखा चलउबै,
हमार कोउ का करिहै।
गाँधी बाबा से लगन लगइबै,
हमार कोउ का करिहै।
सूत खद्दर के कपड़ा बनइबै,
देशवा से लगन लगइबै,
हमारे कोउ का करिहै। ………. (6)
स्वराज्य आन्दोलन ने देशप्रेम की नयी उमंग पैदा कर दी। जिसके परिणाम स्वरूप भारत की भूमि के कण-कण से राष्ट्रीय चेतना जाग उठी तो लोक धुन भी उसी धारा में बहने लगी। गाँधी जी की शिक्षाओं और संकल्पों तथा देश में चल रहे कांग्रेस के कार्यकलापों का लोक गायकोे ने अपनी धुनों में पिरोकर गली-गली पहुँचाने का संकल्प ले लिया। विदेशी सामान के बहिष्कार के लिए गाँधी जी ने जो संकल्प लिया वह लोक-धुनों में भी गूँज उठा। एक गारी-गीत में विदेशी वस्त्र न छोड़ने पर कितना सुन्दर व्यंग्य है।
आये कांगरेसी जमाना रे झमकोइया मोरे लाल,
छोड़ी विदेशी बाना रे झमकोइया मोरे लाल।
लाला भवानी कै कहना रे झमकोइया मोरे लाल,
खद्दर की सारी वनके मनवाँ भावै।
छोड़ै विदेसी बाना रे झमकोइया मोरे लाल,
भारत से भागि गये मेम के भतार।
भारत माँ आइगै आपन राज झमकोइया मोरे लाल। ………. (7)
गाँधी जी का चरखा जहाँ एक ओर स्वराज्य और स्वदेशी अपनाने के लिए सबको एकत्रिक कर रहा था वहीं दूसरी ओर वह चरखा वियोगिनी का सम्बल था। परदेश जाते समय उसका पति उसे चरखा देकर जाता है। उसी चरखे को गाँधी जी ने राष्ट्रीयता बोध के लिए और स्वावलम्बन के लिए प्रचारित किया। अतः वह लोकप्रिय बन गया।
मोरे चरखा कै टूटइ न तार,
चरखवा चालू रहै।
गाँधी महतिमा दुलहा बने हैं,
अरे, दुलहिनि बनी सरकार।
चरखवा चालू रहै।।
सारे काँगरेसिया बनें हैं बराती,
अरे, पुलिस बनी है कहार।
चरखवा चालू रहै।। ………… (8)
गाँधी जी का प्रभाव इतना व्यापक था कि स्त्री और पुरूषों के साथ-साथ युवा पीढ़ी भी उससे दूर न रह सकी। गाँधी जी स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रथम नेता थे, जिन्होंने देश के नव-युवकों को भी कर्त्तव्य बोध कराया। गाँधी जी के इस प्रभाव को तत्कालीन गीतकारों ने लोक-धुनों में सजाया है। गाँधी जी के ओजपूर्ण भाषणों का नवयुवकों पर इतना प्रभाव हुआ कि विवाह के लिए जाता हुआ दूल्हा भी हाथ में तिरंगा लेकर चल रहा है।
बन्ना हमारा गाँधी के बस में,
तिरंगा झण्डा उठा रहा है।
बाबा महलों में सज रहे हैं,
चाचा महलों में सज रहे हैं।
चलो रे बाबा गाँधी के रस्ते,
सभी को बन्ना सिखा रहा।
चलो रे चाचा गाँधी के रस्ते।। ………. (9)
1942 में भारतीय आन्दोलन अपने चरम पर था। जननायक गाँधी जी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया। आन्दोलन इतना देश व्यापी था कि अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। गाँधी जी के इस भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रभाव लोक-धुन से पृथक न रह सका। लोक गायकों ने गाँधी जी के शौर्य, भारतीयों के उत्साह और अंग्रेजों के पलायन का बहुत सुन्दर चित्र खींचा है।
भारत छोड़ो रे अंगरेजों,
चली जोर से आँधी।
लंदन भागे रे अँगरेजवा
जीते भारत माँ गाँधी।
गाँधी बाबा आगे आये,
सारे देशवा का संग लाये।
देशवा छोड़ि भगे बेइमनवा,
रन जीति गए गाँधी। ………….. (10)
गाँधी जी के अथक प्रयासों से भारतीय लोगों के लिए वह महान दिन आ गया जब 15 अगस्त, 1947 को भारत माता गुलामी की जंजीरों से स्वतन्त्र हुई। सदियों की गुलामी और घुटन भरे परिवेश से खुली वादियों में आकर देश के प्रत्येक व्यक्ति ने चैन की साँस ली। चारों ओर आजादी का पर्व मनाया जा रहा था। जन-मानस मस्ती में झूम रहा था। सभी अपनी-अपनी मस्ती और अपने अनुसार माँ भारती के चरणों में प्रेम पुष्प अर्पित कर रहे थे तो भला इस अवसर पर लोक-कण्ठ पीछे कैसे रहता। भारत माता के चरणों में लोक-कण्ठ द्वारा भावान्जलि अर्पित हुई।
गोरेन से हुई गयीं उद्धार,
हमारि भारत माता।
भारत मंदिरवा माँ आरती उतारौ,
सीस नवाबौ बार-बार हमारि भारत माता।।
गाँधी, जवाहर, डोली लै आये,
भारत माता हुईं हैं सवार, हमारि भारत माता।
नये सुरूज की किरनै चमकी,
देशवा माँ भया उजियार हमारि भारत माता।।
आओ प्यारे भइया सब हिलि-मिलि गाओ,
आजादी का त्यौहार हमारि भारत माता।। ………… (11)
इस प्रकार अवधी लोकजीवन में गली-गली गाँधी जी की जय-जयकार हो रही थी क्योंकि उनके नेतृत्व में भारत माता को आजादी प्राप्त हुई थी। बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी गाँधी जी जय-जयकार कर रहे थे।
गोल चवन्नी चाँदी की।
जय बोल महात्मा गाँधी जी। ……. (12)
इस प्रकार हम पाते हैं कि अवधी लोकगीतों ने गाँधीवादी विचारधारा को जनभाषा के माध्यम से जनता के हृदय तक पहुँचाया। गाँधी जी के आदर्श सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज्य और समानता अवधी गीतों की धड़कन बन गए। इस गीतों ने ग्रामीण समाज में राष्ट्रीय चेतना, आत्म गौरव और नैतिक बल का संचार किया है। यह कहने में तथा स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होगी कि अवधी लोकगीतों में गाँधी और गाँधीवाद लोक-मन की भाव भरी वाणी में आज भी जीवित है और इन गीतों ने प्रत्येक देशकाल वातावरण में सबको प्रभावित भी किया है।
सन्दर्भ सूची:-
1. डॉ.महेश प्रताप नारायण अवस्थी – अवधी लोकगीत भाग-2, वसुमति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 155
2. डॉ.महेश प्रताप नारायण अवस्थी – अवधी लोकगीत भाग-2, वसुमति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 169
3. राजन शर्मा – एन.सी.ई.आर.टी. भारतीय इतिहास अरिहन्त प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 198
4. शिव शंकर शुक्ल, हरदोई (उत्तर प्रदेश) मोबाइल नं. 9452519110
5. ज्योति सिंह, परसा, अतरौली, हरदोई मोबाइल नं. 9450192229
6. विनोद कुमार दीक्षित, परसा, अतरौली, हरदोई मोबाइल नं. 6307713032
7. डॉ.राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी – लोकसाहित्य विश्वविद्यालय प्रकाशन आगरा पृष्ठ संख्या – 227
8. डॉ.महेश प्रताप नारायण अवस्थी – अवधी लोकगीत भाग-2, वसुमति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 198
9. शशी बाजपेई, लोधौरा, अतरौली, हरदोई मोबाइल नं. 9415121820
10. रजनी सिंह, सोनिकपुर, हरदोई मोबाइल नं. 9936874311
11. पवन अवस्थी, चकतहा, हरदोई मोबाइल नं. 9794688555
12. डॉ.महेश प्रताप नारायण अवस्थी – अवधी लोकगीत भाग-2, वसुमति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 147
प्रो.गरिमा जैन
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आर्मापुर पी.जी. कॉलेज,
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