मुफ़्त की कीमत
तुम दे देना मुफ़्त का राशन,
और करना प्रचार अपने ही बड़प्पन का।
गाँव के बीचों-बीच
एक बड़ी-सी टंकी भी बनवाना,
और नदी के किनारे खोदकर
छीन लेना उसका अस्तित्व।
तुम बनवाना बेहिसाब सड़कें,
बिना किसी पैमाने को ध्यान में रखे,
और पहाड़ों को मजबूर कर देना
धंसने पर।
तुम धर्म का ढोंग रचना
और हमें बाँट देना,
ताकि हम कभी
इकट्ठे न हो सकें।
तुम शिक्षा मत देना,
जिससे जाग सकूँ मैं।
अगर फिर भी
मेरे मन में
आ जाए कोई प्रश्न तुम्हारे खिलाफ,
तो ज़रा-से पैसे
मेरे मुँह पर फेंक देना
और खुद को महान कह देना।
मैं मान जाऊँगा
बहुत जल्दी,
बिना किसी हिचकिचाहट के,
क्योंकि तुमने मुझे
मुफ़्त में बहुत कुछ दिया है।
बदले में
सिर्फ़ मेरी आवाज़ छीनी है
जो तुम्हारे लिए
बहुत सस्ती थी।




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