साहित्य में व्यंजित लोक-संस्कृति की महत्ता – डॉ. कुलभूषण शर्मा

लोक-संस्कृति लोक-मानस की सहज अभिव्यक्ति है। लोक-संस्कृति ही किसी जाति या प्रदेश के अस्तित्व की परिचायक है जिससे उसके संपूर्ण विश्वास एवं परपंराएँ प्रतिबिंबित होती हैं। लोक-संस्कृति की व्यापक अवधारणा […]

भक्ति आंदोलन के अवसान संबंधी आलोचनात्मक मतों का विश्लेषण – श्वेतांशु शेखर 

भारत के सांस्कृतिक क्षितिज पर भक्ति आंदोलन का उदय एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है।  क्योंकि इसकी व्याप्ति किसी एक क्षेत्र या भाषा विशेष तक सीमित नहीं थी। अलग-अलग समय में […]

भगवान श्रीराम के सच्चे सखा ‘गुहराज निषाद’ – मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

ऋंगवेरपुर के राजा गुहराज निषाद को संसार भगवान श्रीराम सखा के रूप में जानता है । गुहराज निषाद जी को कहार, भील, केवट, मल्लाह, मांझी, कश्यप आदि समाज के लोग […]

 निराला के काव्य में आक्रोश एवं संवेदना –   डॉ. दिनेश कुमार

अक्खड़, मस्तमौला व्यक्तित्व के धनी निराला छायावाद की चतुष्टय में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। निराला का पूरा नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला है। इनका जन्म 21 फरवरी सन 1896 ई. को […]

हिंदी सिनेमा में चित्रित आदिवासी समाज और उनकी समस्याएँ – ज्ञान चन्द्र पाल

19वीं सदी की महत्वपूर्ण खोजों में से सिनेमा की खोज विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस समय किसी के भी चित्र को रूपहले पर्दे पर प्रकट कर देना किसी आश्चर्य […]

भूमंडलीकरण को असग़र वजाहत का संदेश – प्रियंका कुमारी

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी सम्पूर्ण मानव जाति को एक परिवार की तरह देखने-मानने की अवधारणा हमारे आर्ष ग्रंथों में मिलती है। ‘जियो और जीने दो’ का सह अस्तित्ववादी सूत्र विश्व समाज को सूत्र बद्ध […]

सहित्य और पर्यावरण का अंतर्सबंध – डॉ. गरिमा जैन

संसृति के प्रारम्भ में मानव ने जिज्ञासा, जिजीविषा और चिन्तन के आधार पर अपनी बौद्विक  चेतना का विकास किया है। उसी का उत्स साहित्य है। मानव की गतिषील चेतना ने […]

आजादी का अमृत महोत्सव और श्रमजीवी वर्ग: कुछ साहित्यिक कुछ जगबीती – मुन्नी चौधरी

भारत अपनी आजादी का 75वां साल पूरा करने जा रहा है। इतनी लम्बी अवधि किसी देश के निवासियों के लिए एक गर्व की बात है। इस बीच भारत ने वह […]

भूमण्डलीकरण, लोकतन्त्र और भारतीय किसान की ‘फाँस’ – राम विनय शर्मा

‘‘भूमण्डलीकरण के आक्रामक दौर में नष्ट होती हुई ग्राम संस्कृति और आत्महत्या के लिए विवश किसानों को केन्द्र में रखकर किया जाने वाला कथा-सृजन ही अपनी सार्थकता प्रमाणित कर सकता […]