त्रिलोचन की ‘धरती’ का बिम्ब विधान – कुमारी प्रीति मिश्रा

काव्य में अकथ्य की कथनीयता और मौन का निनाद वर्ण्य विषय के भावपक्ष को पुष्ट करने वाले प्रधान तत्व हैं। शायद यही कारण है कि कविता गोचर जगत के अन्तर्मन […]

भारतीय रंगमंच में स्त्रियों का प्रवेश – स्वाति मौर्या

आज रंगमंच के क्षेत्र में भारतीय स्त्रियों ने जो मुकाम हासिल किया है, वह उसे एकाएक नहीं प्राप्त हो गया बल्कि यह शिखर उसके कई वर्षों के संघर्षों का परिणाम […]

आंचलिकता के महानायक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ – डाॅ0 नीलू सिंह

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ जी मुंशी प्रेमचन्द के बाद के युग में आधुनिक हिन्दी साहित्य के सबसे सफल और प्रभावशाली लेखकों में गिने जाते थे। किसी भी साहित्यकार पर लेखनी चलाने से […]

धर्म बनाम मानवता का छद्म रूप – घनश्याम कुमार

सही अर्थों में मनुष्य वही है जिसके मन में अन्य प्राणियों के प्रति दया का भाव हो तथा जो आजीवन धर्म के मार्ग पर अडिग रहे। मानवता ही मनुष्य की […]

कविता का समकालीन परिदृश्य : नये इलाके में – कदम गजानन साहेबराव

प्रस्तुत लेख में समकालीन कविता के बहाने वर्तमान समाज के नए पण को दर्शाया गया है। हम इस बात से परिचित हो जायेंगे कि किस प्रकार हम इतिहास, धर्म-दर्शन एवं […]

मंझन कृत मधुमालती में सामाजिक मूल्य –  रेखा

मंझन कृत मधुमालती सूफी प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा का प्रमुख ग्रन्थ है । इसका रचनाकाल सन 1545 ई. है । यह एक नायिका प्रधान कृति है, जिसमें लौकिक प्रेम से अलौकिक […]

दिल्ली महिला आयोग से अनभिज्ञ हैं महिलाएं – डॉ. अनु चौहान

दिल्ली महिला आयोग का गठन वर्ष 1994 में हुआ था। दिल्ली सरकार द्वारा पारित दिल्ली महिला आयोग अधिनियम -1994 के अंतर्गत गठित आयोग को पिछले 26 सालों से राजधानी में […]

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में गाँव के चित्र – डॉ. प्रिया ए.

फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध आँचलिक रचनाकार हैं। ग्रामीण अंचलों से उनके निकट का परिचय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखनेवाले एक सशक्त कहानीकार के […]

स्त्री मुक्ति का स्वर और तसलीमा नसरीन का साहित्य – शिव दत्त

सृष्टि निर्माण में पुरुषों के समक्ष स्त्रियों का भी बराबर का योगदान रहा किन्तु समाज निर्माण के क्रम में पुरुषों द्वारा स्त्रियों को उचित स्थान प्राप्त नहीं हुआ । विदित […]

भारतेंदु साहित्य और हिंदी नवजागरण की चेतना में अनुवाद की भूमिका – सुमन

भारतेंदु हरिश्चंद्र का साहित्य मोटे तौर पर सन् 1858-1885 के बीच एक ऐसे ऐतिहासिक काल की उपज है, जिसके एक छोर पर भारतीय किसानों और सिपाहियों का राष्ट्रीय विद्रोह था, […]