निर्गुण संत कवियों की संधा भाषा : परंपरा और प्रयोग – श्वेतांशु शेखर

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को ‘स्वर्ण-युग’ का दर्जा प्राप्त है। भक्ति के आरंभ और विकास को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं, लेकिन भारतीय साहित्य में भक्तिकाल के महत्व […]

हिंदी आलोचकों की विहंगम दृष्टि ( सूरदास के परिप्रेक्ष्य में ) – अनिल कुमार

हिंदी आलोचना को परिष्कृत एवं समृद्ध करने में जिन आलोचकों का योगदान रहा हैं उनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम सर्वप्रमुख हैं। सूरदास के साहित्य […]

हिन्दी साहित्य परिप्रेक्ष्य में गुरुनानक देव जी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक देय – अभिनव

हिन्दी साहित्य में भक्ति काल विशेष रूपेण भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन एवं सम्मिश्रण का युग रहा है। विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय दुर्बल राजव्यवस्था का लाभ उठाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। […]

विलक्षण प्रयोगधर्मी रचनाकार कृष्ण बलदेव वैद – राम विनय शर्मा

कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के आधुनिक, किन्तु विरल रचनाकार हैं। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट और भय के अपने लिए एक अलग रास्ता बनाया और उस पर जीवनपर्यन्त चलते रहे। दस […]

गुरुनानक (एक दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, समाजसुधारक, कवि और देशभक्त ) – तेजस पूनिया 

10 वें सिक्‍ख गुरूओं के प्रथम गुरू गुरुनानक सिक्‍ख पंथ के संस्‍थापक थे । जिन्‍होंने धर्म में एक नई लहर उत्पन्न की । सिख गुरूओं में प्रथम गुरू नानक का […]

सूरदास के काव्यलोक की प्रासंगिकता – अनिल कुमार

प्रासंगिकता का प्रश्न जितना सीधा दिखता है , जब उसके अंतर में उतरिये तो वह उतना ही विचित्र दिखाई पड़ता है – वह भी तब जब रचना और रचनाकार के […]

बहुभाषिकता-एक समाज भाषावैज्ञानिक अध्ययन – बीरेन्द्र सिंह

भाषा एक समाज सापेक्ष प्रतीक व्यवस्था है। वह समाज के सापेक्षता में ही जीवित रह सकता है तथा उसका विकास भी समाज के भीतर ही होता है। इस प्रकार यह […]

हिन्दी यात्रा साहित्य में स्त्री चेतना के स्वर – नीलम रानी

समाज में स्त्री को हमेशा पार्श्व में रखने की ही परम्परा रही है। पुरूष के समकक्ष स्त्री को खड़ा देखने की आदत आज भी हमारे भारतीय समाज में नहीं आ […]

भक्तिकाव्य की वर्तमान अर्थवत्ता : एक पुनर्विचार – राम विनय शर्मा

भारतीय इतिहास का मध्यकाल कई दृष्टियों से उल्लेखनीय है। यह वही दौर है जब भारत की धरती पर मुसलमानों का विधिवत् शासन स्थापित हुआ था। इसी दौर में भक्ति ने […]

अमृतलाल नागर के उपन्यासों में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध – आरती

मनुष्य अपने व्यापक अर्थ में स्त्री-पुरुष का योग है। सभ्यता और समाज के विकास में इन दोनों का ही सहयोग समान रूप से आवश्यक माना गया है। लेकिन भारतीय समाज […]