‘राष्ट्रीय अस्मिता को हिंदी भाषा ही बचा सकती है?’ विषय पर प्रो. हरिशंकर मिश्रा और प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय से ज्वलंत चर्चा

आज जिस दौर में हम रह रहे हैं वहाँ कदम-कदम पर भाषा की समस्या से रुबरू होना पड़ रहा है, कोई अंग्रेजी की महत्ता की बात कर रहा है तो […]

भारतीय योग परंपरा और कबीर – डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

कबीर भक्तिकाल के संत कवियों में श्रेष्ठतम स्थान रखते हैं । इन्होंने अपने काव्य में भारतीय योग दर्शन का समुचित प्रयोग किया ।योग तन, मन, आत्मा समेत चेतना की सभी […]

काशी में कबीर – डाॅ. संगीता राय

कबीर को सलेबस में ख़ूब पढ़ा है, पर उससे भी पहले उन्हें सुना है। कबीर कोई दरबारी कवि नहीं थे। मन की मौज आयी और कह दिया। कबीर ने जो […]

कबीर की चिंतन धारा – डॉ. माला मिश्र

कबीरदास जी आडंबर एवं बाह्याचार का खंडन केवल खंडन के लिए नहीं है। वे भक्ति को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में, ‘‘चाहे मुसलमान (इस्लाम) के […]

कबीर की सामाजिक चेतना – डॉ. साधना शर्मा

सामान्यतः सामाजिक से हमारा तात्पर्य किसी देश एवं काल विशेष से संबंधित मानव समाज में अभिव्यक्त परिवर्तनशील जागृति से होता है। इसका उद्भव सामाजिक अन्याय, अनीति, दुराचार, शोषण की प्रक्रिया […]

हिंदी आलोचना में कबीर की विविध छवियाँ – विनय कुमार गुप्ता

कबीर क्या थे? और अब उनकी क्या-क्या छवियाँ हैं? यह मालूम करना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि अतीत से वर्तमान तक कबीर की छवि में बहुत परिवर्तन आया है और […]

कबीर: सामंती समाज का लोकतांत्रिक व्यक्तित्व – आशुतोष तिवारी

कबीर घोर सामंती समाज में पैदा हुए थे। उस समय अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए जमींदारों, पुरोहितों-पंडों, मौलवियों आदि ने समाज को अपनी सुविधा के अनुसार बांट रखा […]

कबीर की सामाजिक चेतना के आयाम – ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह

कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ जब समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था। छुआछूत, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, मिथ्याचार, पाखण्ड का बोलबाला था और हिन्दू-मुसलमान आपस में झगड़ते रहते थे । […]

कबीर के अध्ययन की समस्याएँ – ललन कुमार

हिंदी साहित्य के इतिहास में कबीर का स्थान भक्तिकाल के शुरूआती दौर में माना जाता है। कबीर भक्तिकाल और आदिकाल की संधिबेला पर अवस्थित हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, […]

कबीर के काव्य में ब्रह्म का स्वरूप – आरती

हिन्दी साहित्य में मध्यकाल का बहुत महत्त्व है। मध्यकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है। मध्यकाल में बहुत से कवि हुए लेकिन कुछ कवि सूर्य के समान हैं जिनमें […]