शिवप्रसाद सिंह के कथा साहित्य में समाज, संस्कृति और इतिहास : डॉ. साधना शर्मा

हिंदी कथा-साहित्य में शिवप्रसाद सिंह के कथाकर्म का अर्थ-सन्दर्भ अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। वे प्रेमचन्द की कथा परम्परा का अनुकरण नहीं करते हैं वरन् उसे मोड़ते हैं। इस मोड़ने […]

नई किरण (कहानी) : डॉ.संतोष खन्ना

सुबह के दस बजते-बजते वह तीनों पार्क में पहुँच गए। कोहरा काफी छट चुका था, क्योंकि सूर्य अपनी पूरी प्रभा के साथ पूर्व दिशा से आगे बढ़ रहा था, किंतु […]

साथी थी तुम (कविता) – शैलेंद्र कुमार सिंह

आज बहुत दिनों बाद तुमसे मेरी नज़रें मिलीं, पिछली बार का याद नहीं एक लंबा अरसा गुज़र गया है! चलते-चलते अचानक ठिठक गया मेरे क़दम मेरा साथ नहीं दे रहे […]

उसका चेहरा (लघुकथा) – मनोज शर्मा

नाश्ते के अंतिम निवाले को मुँह में निगलते हुए अश्वनी ने बैग उठाया और जल्दी से घर से बाहर की राह ली और भीड़-भाड़ वाली गलियों से होता हुआ मैट्रो स्टेशन की […]

सुभाष कुमार कामत की कविताएँ

प्रेम नादान प्रेमी-प्रेमिका ने खा ली कसमें एक साथ जीने मरने की रिश्ते नाते सब भूल गए खो गए दोनों एक दूजे में एक दूसरे के खुशी की खातिर जाति […]

एक कटोरा भरकर (कविता) – नम्रता सिंह

एक कटोरा भरकर… एक कटोरा भरकर वो लाती है अपनी ज़िंदगी की मुस्कान ममता के आँचल से निचोड़कर इधर‌‌-उधर बूँदो को छलकाये बिना समेटकर, संजोकर दूसरों की नजरों से दूर […]

इच्छा (लघुकथा) – ओमप्रकाश क्षत्रिय

वह उनकी इकलौती पुत्री थी.  माता चाहती थी कि उनकी पुत्री को उनके पति जैस व्यापारी वर न मिले, जबकि पिता चाहते थे कि उनकी पुत्री को व्यापारी वर मिलें । […]

मददगार (कविता) – संजय वर्मा “दृष्टि”

अस्वस्थता में पहचान होती ईश्वर और इंसान की कौन था मददगार श्मशान के क्षणिक वैराग्य ज्ञान की तरह भूल जाता इंसान मदद के अहसान को फर्ज के धुएँ में सांसे […]

कृष्ण सुकुमार की सात कविताएँ

(1) सपने देखते देखते चुक जाता है वुजूद, जैसे चुक जाये सूरज शाम ढलते न ढलते ! रास्ते चुक जाते हैं मंज़िल तक पहुँचते पहुँचते जैसे चुक जायें विचार अपनी […]