अनुक्रमणिका

संपादकीय  डॉ. आलोक रंजन पांडेय बातों-बातों में  डी.डी. के प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘दो टूक’ में अपने सवालों से पस्त करनेवाले प्रसिद्ध पत्रकार और वरीय एंकर अशोक श्रीवास्तव से सहचर टीम की […]

वैश्वीकरण, बाजारवाद और हिंदी भाषा : डॉ. साधना शर्मा

प्रगति चाहे देश की हो या समुदाय की उसमें भाषा की अहम् भूमिका होती है । भाषा न सिर्फ ज्ञान की संवाहक है वरन् देश की उन्नति एवं प्रगति की […]

राजभाषा हिंदी का स्वरूप – डॉ. ममता सिंगला

जिस  प्रकार मनुष्य अपने भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए किसी विशिष्ट भाषा का प्रयोग करता है, उसी प्रकार एक राष्ट्र भी अपने सरकारी काम-काज सम्पन्न करने के […]

सोशल मीडिया : दशा और दिशा ‌- प्रवीण कुमार झा

सूचना प्रौ़द्योगिकी के युग में तकनीकी समृद्धि मानव समाजिक सभ्यता के विकास का परिचायक है। सभ्यता का विकास आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव को दर्शाता है। मीडिया का नवीन रूप […]

नारी की संकल्पना और तुलसी की नारी – डाॅ ऋचा शर्मा

नारी किसी भी महाकाव्य का प्राण होती है।नारी के बिना काव्य के सभी रस श्रृंगार ,वीर ,वात्सल्य रसहीन होकर रह जाते है।अपने प्राकृतिक गुणों के कारण नारी सदा से ही […]

संघ के सत्कार्य और मीडिया का पूर्वाग्रही मूल्यांकन – पीयूष द्विवेदी

आज से नौ दशक पहले 27 सितम्बर, 1925 की तारीख को विजयादशमी के शुभ अवसर पर नागपुर में बीस-पच्चीस लोगों को इकठ्ठा कर जब छत्तीस वर्षीय सामान्य कद-काठी के डॉ […]

न्यू मीडिया का दुरुपयोग : सोशल मीडिया के संदर्भ में – वीरेन्दर

बीसवीं सदी में जनसंचार को नया परिचय मिला जिसमें रेडियों पत्र-पत्रिका, टेलीविजन न सिर्फ मनोरंजन और ज्ञानवर्धन का साधन बना बल्कि इसने ही भारत के जनसंचार के ढाँचे को खड़ा […]

21वीं सदी में तकनीक और मीडिया का बदलता स्वरूप – अतुल वैभव

इक्कीसवीं सदी पूरे विश्व में अनेकों चुनौतियाँ ले कर आया है। गरीबी, कुपोषण, आतंकवाद, प्रदूषण और ऐसी न जाने कितनी चुनौतियों से इस सदी के मानव को दो चार होना […]

युवाओं के कंधों पर सवार न्यू मीडिया – डॉ. अनु चौहान

सुबह-सुबह आंख खुली तो पहली नजर मोबाइल खोजती नजर आई। बगल में ही रखे मोबाइल की स्क्रीन लाइट ने नींद का नशा कुछ कम किया और रही बची कसर फेसबुक […]