तुलसी साहित्य में मानवीय मूल्य – दीपक जायसवाल

भक्ति आन्दोलन का प्रादुर्भाव वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे जाकर मनुष्य-सत्य की उद्घोषणा के साथ हुआ था। उनकी भक्ति में सामाजिक विषमता और भेदभाव के लिए जगह […]

घनानंद के काव्य में व्यंजित ‘प्रेम’ का आदर्श स्वरूप – रवि कृष्ण कटियार

यह मनुष्य की सीमा भी है और प्रकृति की महानता भी कि उसने सदैव ही मानव निर्मिति को आइना दिखाया है, जब हम किसी भाव को शब्दों में बयाँ नहीं […]