1947 में भारत के विभाजन का शिकार बने संस्कृत के विद्वान प्रोफ़ेसर जयदेव बादु की तीन संतानों में सबसे बड़ी पद्मा जी ने अपनी शिक्षा की शुरुआत पवित्र नदी ‘देवका’ के तट पर स्थित अपने पैतृक गाँव पुरमंडल के प्राथमिक विद्यालय से की। उनके लेखन में प्रकृति की झलक शायद इसीलिए संपूर्णता में मौजूद है। पद्मा सचदेव के छंदों की लयबद्ध सुंदरता संस्कृत काव्य के साथ आपके परिचित होने का प्रत्यक्ष परिणाम है। लोककथाओं और लोकगीतों की समृद्ध वाचिक परंपरा के साथ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान डोगरी के आकर्षण की पुनर्खोज ने आपको साहित्य की सेवा, लेखन व विकास के लिए प्रेरित किया तथा आपको एक कवयित्री के रूप में उत्कृष्ट बनाया।

समाज से तात्पर्य व्यक्तियों के समूह से होता है, जो अपने विकास, सुरक्षा और व्यवस्था के लिए हितकारी प्रणालियों का विधान करता है । समाज शब्द से ही सामाजिक शब्द का निर्माण हुआ है इसलिए समाज के केंद्र में वे सभी तत्व स्थान पाते हैं, जो समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति का परिवेश, कर्म व मानवीय व्यवहार सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र स्वरूप का नाम है। संस्कृति एक व्यवस्था है, जिसमें जीवन के प्रतिमानों, व्यवहार के तरीकों, अनेकानेक भौतिक प्रतीकों, परंपराओं, विचारों, सामाजिक मूल्यों, मानवीय क्रियाओं और अविष्कारों को शामिल किया जाता हैं, जिस तरह से समाज से सामाजिक शब्द का निर्माण हुआ है। उसी तरह संस्कृति से सांस्कृतिक शब्द का निर्माण हुआ है, जिसमें व्यक्तियों के जीवन मूल्य स्थान पाते हैं। मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाने में जिन मानवीय मूल्यों की आवश्यकता होती है, वे मानवीय मूल्य इस समाज और संस्कृति में ही निहित होते हैं। प्राचीन काल से ही समाज और संस्कृति का घनिष्ठ संबंध रहा है। संस्कृति के अभाव में समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

समाज एवं संस्कृति का संबंध प्राचीन काल से रहा है। बिना समाज के संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। इस लेख में मैंने पद्मा सचदेव के साहित्य को आधार बनाकर जम्मू-कश्मीर के सामाजिक जीवन का विश्लेषण करने का प्रयास किया हैं। साहित्य एवं संस्कृति की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहाँ के लोगों ने साहित्य की अनूठी परम्परा को विकसित किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही यह राज्य विवादों से घिरा रहा है। लेकिन राजनीति से परे भी जम्मू-कश्मीर के समाज व संस्कृति में कुछ ऐसे तत्व रहें हैं, जो भारत के अन्य राज्यों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना से अलग व विशेष हैं। अभी तक जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक दृष्टि से ही देखने का प्रयास किया गया है लेकिन अब वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को जानने की कोशिश भी करनी होगी, जिससे की वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक परम्परा में निहित सत्य एवं यथार्थ को रेखांकित और चिन्हित किया जा सके।

उन्होंने अपने ‘जम्मू जो कभी शहर था’ उपन्यास में लिखा है-

‘वो जम्मू जो मुझे याद आता रहता है। आज तो जम्मू कूड़ाखाना हो गया है। भीख मांगने वाले भी बाहर से आ गये हैं। वैसे तो सारा भारत एक घर है, पर जब शेख अब्दुल्ला की सलाह पर महाराज हरि सिंह ने रियायत में किसी भी बाहर को आकर बस ने में रोक लगाई तब यही मंशा रही होगी कि भीड़ ना हो जाय, कहीं भीड़ ना हो जाए।

किसी भी राज्य के सामाजिक जीवन को सूक्ष्मता के साथ जानने और समझने के लिए वहाँ के इतिहास और साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक होता है। यदि रचनाकार स्वयं उस परिवेश से जुड़ा हो तो उसकी अभिव्यक्ति और प्रामाणिक लगने लगती है। एक उदाहरण देखा जा सकता है-

फटेहाल ध्यान कौर पिछले दो दिनों से बरामदे में विलाप करती बैठी हुई है। विलाप करती उनकी देह कांप- कांप जाती हैं। उनके हाथ में लोहे के साथ कड़े हैं इनमें से कोई जमा हुए खून से भरा है, कोई जला हुआ है ,किसी से पेट्रोल की बू आ रही है।

क्या जम्मू कश्मीर का सामाजिक जीवन उसी प्रकार का है, जैसा दिखाई देता है?

इसका उत्तर हाँ है और इसके लिए हमें उनके साहित्य को विशुद्ध रूप में देखना होगा। तभी तो वो ‘कानवाई कहानी’ में लिखती है –‘फौजियों के डर से वह दोनों दीवार से लग कर खड़ी हो जाती हैं ट्रक की रोशनी के करीब आते ही वह सड़क छोड़ देती हैं। 3पद्मा सचदेव की कविता सुनकर ही कवि दिनकर ने कहा था, “जो बात पद्मा कहती हैं, वही असली कविता है। हम में से हर कवि उस कविता से दूर, बहुत दूर हो गया है।“

राजनीतिक धारा से परे जम्मू-कश्मीर के सामाजिक जीवन को पद्मा सचदेव का साहित्य बहुत ही मार्मिक ढंग से हमसे परिचय कराता हैं। जम्मू-कश्मीर की संस्कृति-समाज, वहाँ की भौगोलिक सीमाएँ तथा सांस्कृतिक विस्तार, आतंकवाद से जूझता जम्मू-कश्मीर, विभाजन की विभीषिका तथा पुनः निर्माण जैसे प्रश्नों को आधार बनाकर, उन्होंने इन सभी विषयों को अपने साहित्य में स्थान दिया है। यदि हम देखें तो पाएँगे की ‘धुआं कहानी में वो लिखती है ‘फटेहाल ध्यान कौर पिछले दो दिनों से बरामदे में विलाप करती बैठी हुई है। विलाप करती उनकी देह कांप- कांप जाती हैं। उनके हाथ में लोहे के साथ कड़े हैं इनमें से कोई जमा हुए खून से भरा है, कोई जला हुआ है ,किसी से पेट्रोल की बू आ रही है।’कि उनकी कविता पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव उनके प्रिय डुग्गर प्रदेश के मधुर लोकगीतों से आया है। पद्मा सचदेव ने 1969 में अपने पहले कविता-संग्रह ‘मेरी कविता मेरे गीत’ के साथ राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य में पर्दापण किया। विशेष बात यह कि इसकी भूमिका हिंदी के क़द्दावर कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखी थी। इस पुस्तक को 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

शास्वत आनंद
शोधार्थी
हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग
केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू

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