भारत में साहित्य और संस्कृति ने स्त्री से जुड़ी माहवारी संबंधी कुप्रथा को गंभीरता से नहीं लिया है। वर्षों से भारतीय पौराणिक मिथक कथाओं में भी मासिक धर्म का स्पष्ट चित्रण नहीं मिलता है। लेकिन कुछ पौराणिक मिथक कथाओं में ऐसे दृश्य अवश्य दिखाई देते है। जैसे: ‘महाभारत’ में दुशासन द्वारा द्रौपदी के बाल पकड़ कर लाने के समय द्रौपदी को रजस्वला माना गया है। अर्थात् विश्राम के समय दुशासन ने द्रौपदी का अपमान किया जो दुर्योधन के लिए घृणा, क्रोध व प्रतिज्ञा का द्योतक बना। ‘‘दुर्योधन ने द्रौपदी को सभा में लाने का सूत को आदेश दिया। वह दो बार विफल होकर लौटापहले तो इस सूचना के साथ की देवी रजस्वला एकवस्त्रा है। वे इस अवस्था में सभा में नहीं आ सकती।’’[1] ‘भारत में महाभारत’ भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक और पांचाली शपथम् (तमिल) नामक कृति में सुब्रमण्यभारती द्वारा रचित कथा में स्पष्ट बताया गया है कि द्रौपदी इस दौरान रजस्वला थी। ‘भारत में महाभारत’ में द्रौपदी के रजस्वला होने की भी पुष्टि मिलती है। इसी प्रकार दूसरे पौराणिक मिथक कथा के अनुसार भारतीय संस्कृति में कामख्या देवी के रजस्वला होने के दौरान लोग उनकी पूजा करते है। भारत में 51 शक्तिपीठों में सबसे बड़ा शक्तिपीठ कामाख्या देवी का मंदिर गुवाहटी में है। नीलांचल पर्वत का यह मंदिर अम्बूवाची पर्व के समय सबसे पवित्र माना जाता है क्योंकि इस उत्सव के दौरान माता रजस्वला होती है। अम्बूवाची पर्व जून माह के 22, 23 व 24 तिथि को मनाया जाता है और दिनों देवी की पूजा विशेष रुप में की जाती है। इस प्रकार यदि एक देवी रजस्वला होने पर पवित्र और सर्वशक्तिशाली मानी जाती है तो एक साधारण स्त्री को रजस्वला के समय अपवित्र (अस्वच्छ) माना जाना तर्कसंगत है? और दूसरी ओर देवी के रजस्वला होने के दौरान सभी लोग देवी की पूजा करते है वहीं साधारण स्त्री के रजस्वला होने के दौरान उसे तमाम पुरुषवादी अंधविश्वास और परंपराओं में बांध दिया जाता है। समाज सदियों से रजस्वला के दौरान स्त्री का तिरस्कार करता आ रहा है। जबकि कामख्या देवी की इस स्थिति पर पर्व मनाया जाता है। वर्तमान भारत में भी देवी के रजस्वला होने पर पर्व होता है और एक साधारण स्त्री के रजस्वला होने पर कठोर नियम और मान्यताएं थोपने की प्रथा हैं। इन मान्यताओं और नियमों में भारत के साहित्य, समाज और संस्कृति का कितना योगदान है? साथ ही आज के समय में सिनेमा इन नियमों और मान्यताओं में किस प्रकार हस्तक्षेप कर रहा है?

      आधुनिक साहित्य स्त्री, दलित और आदिवासी जैसे हाशिये के समाज की चेतना और प्रतिरोध को निरंतर प्रकट कर रहा है। साहित्य, समाज और संस्कृति में स्त्री की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। इस संदर्भ में सिमोन द बोउआ का कथन सत्य है कि ‘साहित्य, इतिहास व परंपराए पुरुषों ने बनाए है, और पुरुषों ने अपने बनाए इस विधान में स्त्रियों को सर्वत्र दोयम दर्जा दिया है।’ संसार भर में गत बीते दशक में स्त्री मुक्ति, चेतना व स्त्रीवादी दृष्टिकोण से संबंधित स्त्री विमर्श लिखा जा रहा है। भारत के परिप्रेक्ष्य में भारतीय नवजागरण के समय से ही स्त्री की दयनीय स्थिति के निवारण संबंधी कुछ अहम प्रयास मिलते है। जिसमें की राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द विद्यासागर, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानाडे, आदि कई महापुरुषों ने अपना योगदान दिया है। भारत की आज़ादी के उपरांत साहित्य में लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श को उजागर किया है। किंतु आश्चर्य यह है कि आज़ादी के पश्चात भी आज तक लेखिकाओं ने स्त्री- विमर्श में मासिक धर्म के विषय पर स्पष्ट लेखन नहीं किया हैं। समकालीन साहित्य में स्त्री संबंधी अनेक विषयों को विभिन्न लेखिकाओं ने उठाया है। हिन्दी साहित्य में आवाँ, चाक, पीली आँधी, कलिकथा बाईपास, बेघर, परिजात, आदि अनेक पुस्तकें स्त्री से जुड़ी तमाम समकालीन विषयों की चर्चा करती है। किंतु आज भी स्त्री से जुड़े कुछ मुख्य बुनियादी सवाल क़ायम है जो समाज की दृष्टि में है। साहित्य ने इन बुनियादी सवालों को ओझल कर दिया है ? जिसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। इस संदर्भ में प्रभा खेतान ने लिखा है कि मासिक धर्म समाज या परिवार द्वारा अब भी सहजता से स्वीकार्य नहीं है। यह एक दाग है जो औरत को अपूर्ण वर्ग में रख देता है। बराबरी के अधिकारों से वंचित होना, औरत के ऊपर एक बोझ है। वह मानवीय गरिमा से वंचित होती है। सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक व्यवस्था बचपन से ही स्त्री के मन में ये बातें भर देती है कि मासिक धर्म के कारण स्त्री सारी वर्जनाओं से कम है। पर समाज का यह भाव तब दूर हो सकता था, जब औरत अपने अस्तित्व को अतिक्रमण के अन्य सारे रास्ते पुरुष की बराबरी में खुले होते हैं।”[2] भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति में बुनियादी सवाल अभी तक क़ायम हैं। अर्थात् मासिक धर्म के नियम और मान्यताओं में फंसे समाज के इन सवालों को सामाजिक संदर्भों में वैज्ञानिक तर्क द्वारा ही नारी अस्मिता की खोज की जा सकती है।

    समकालीन हिंदी साहित्य में माहवारी की समस्या से संबंधित साहित्य न के बराबर है। अर्थात् साहित्य में मासिक धर्म से संबंधित उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना या नाट्य विधा आदि नहीं हैं। केवल कुछ रचनाओं में ही मासिक धर्म से संबंधित दृश्य दिखाई देते हैं। जैसे गद्य में संजीव के फाँस उपन्यास में माहवारी से संबंधित एक दृश्य है। इसी प्रकार समकालीन हिन्दी साहित्य में प्रमुख साहित्यकार एवं स्त्रीवादी कवियत्री अनामिका की प्रथम स्राव मासिक धर्म से संबंधित कविता है। जिसमें कवयित्री ने एक अबोध बालिका के अंदरूनी होने वाले बदलाव को स्पष्ट रूप में अपने शब्दों में व्याख्यित करने के साथ ही प्रथम स्राव (पहली माहवारी) के दौरान होने वाले शारीरिक कष्टों को भी सूक्ष्मता से चिन्हित् किया है।

‘‘उसकी सफेद फ्रॉक
और जाँघिए पर
किस परी माँ ने काढ़ दिए हैं
कत्थई गुलाब रातभर में ?
और कहानी के वे सात बौने
क्यों गुत्थमगुत्थी
मचा रहे हैं
उसके पेट में ?”[3]

अनामिका के अलावा भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित युवा कवियत्री सुश्री शुभम श्री की कविता मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सैनिटरी नैपकिन फेंकने से इन्कार कर दिया है भी है। यह कविता आधुनिक पुरुषवादी विचारधारा से ग्रसित शहरी समाज के खोखलेपन के यथार्थ को दर्शाती  है। आधुनिक भारतीय पुरुषवादी समाज, साहित्य और संस्कृति स्त्री की दयनीय स्थिति से किनारा कर रहा हैं। भारत के अधिकतर भागों में आज भी स्त्रियों के साथ मासिक धर्म (माहवारी) के दौरान अछूतों की तरह व्यवहार होता है। भारत में ही नहीं वरन् संसार भर में यह समस्या किसी-न-किसी रुप में व्याप्त है जो समाज में स्त्री की लैंगिक हीनता को दर्शाती है। पुरुषवादी समाज में स्त्री के मासिक धर्म के दौरान कठोर व्यवहार किया जाता है और आज भी समाज स्त्री के मासिक धर्म में स्वच्छता जैसे अहम् विषय से दूर है। अर्थात् स्त्रीवादी विमर्श भी इस विषय से इतर है। जगदीश्वर चतुर्वेदी का कथन है कि ‘‘स्त्री की व्यक्ति के रुप में अस्मिता को स्थापित करना, उसकी संवेदनाओं, भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देना स्त्री साहित्य का बुनियादी दायित्व है।’’[4] यह कथन स्पष्ट रूप में मासिक धर्म जैसे विषय की ओर ध्यान जुटाने के लिए प्रेरित करता है।

   भारत में मनुष्य के मनोरंजन के लिए सिनेमा (चल-चित्र) एक सस्ता व सुलभ साधन है। मनोरंजन के अन्य साधनों की तुलना में सिनेमा अधिक लोकप्रिय भी है। यही कारण है कि सिनेमा का समाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सिनेमा में दिखाए गए पात्रों, उनकी जीवनचर्या और घटनाओं से आज का समाज सर्वाधिक प्रभावित होता है। सिनेमा बदलते सामाजिक ढांचे और भावनाओं को दर्शाता है अर्थात् सिनेमा, समाज में बदलाव का आधार बन रहा है। आधुनिक भारतीय सिनेमा की कथाओं में बाल-विवाह, दहेज, मासिक धर्म में स्वच्छता के साथ मिथकों व मान्यताओं तोड़कर हुए सामाजिक कुप्रथाओं पर प्रहार किया जा रहा है और वास्तविक घटनाओं के द्वारा समाज में स्त्री के अस्तित्व, आपसी भाईचारे व जात-पांत के भेद-भाव को मिटाने का संदेश दिया गया है। वस्तुत: सिनेमा के संदेश को भारतीय समाज शीघ्र ग्रहण कर लेता है। आर. बाल्की सिनेमा में एक प्रसिद्ध निर्देशक है जो सैनिटरी पैड्स के ‘दाग अच्छे हैं, वॉक एंड टॉकऔर जागो रे जैसे एड्स के विज्ञापनों के विचारक हैं। चीनी कम, पा और पैडमैन जैसी अलग-अलग पृष्ठभूमि की फिल्मों से निर्देशक आर. बाल्की ने भारतीय सिनेमा को एक सकारात्मक विचार दिया है। पैडमैन फिल्म स्त्री की मासिक धर्म (मेंस्ट्रुअल हाइजीन) की समस्या को लेकर बनी है। दरअसल सैनिटरी पैड को केंद्र में रखकर उन्होंने समाज में स्त्री की अनेक समस्याओं को उजागर किया हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मासिक धर्म को लेकर समाज में अनेक निषेध हैं। पैडमैन आज के दौर की सबसे महत्त्वपूर्ण फिल्म है जिसमें कई जगहों पर आर. बाल्की ने भावनाओं के साथ समाज को उपदेशात्मक कथन भी सटीक दिया हैं। जैसे सोनम कपूर का एक संवाद है- 

तुम गांव हों, मैं शहर।

इन्हें तो आज तक डिजिटल इंडिया भी नहीं जोड़ पाया।[5]

यह दृश्य भारत के ग्रामीण यर्थाथ परिवेश को दर्शाता है। आज भी भारत के ग्रामीण जीवन में शिक्षा, बिजली व परिवहन की अधिक समस्या है। जहाँ साधनों की कमी हैं वहां स्त्री का जीवन सरल व सहज नहीं है। किंतु स्त्री अपने परिवेश में अनेक समस्याओं से जूझते हुए जीवन को सहज बनाने का प्रयत्न करती है। सैनिटरी पैड को लेकर फैलाई जानेवाली जागरूकता की कहानी कई जगहों पर अत्यधिक मार्मिक लगती है। अपितु आर. बाल्की ने उसमें संवादों और बदलते परिवेश के दृश्यों के साथ स्त्रियों की माहवारी में अस्वच्छता की समस्या को उजागर किया है।

फिल्म का दूसरा अंश पहले अंश की तुलना में ज्यादा मजबूत है। लक्ष्मीकांत चौहान एक सीधा-सादा और होनहार आदमी है। वह वेल्डिंग वर्कशॉप में काम करता है। लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को गायत्री (राधिका आप्टे) से शादी करने के बाद पता चलता है कि माहवारी के दौरान उसकी पत्नी न केवल गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती है बल्कि अछूत की तरह पांच दिन घर से बाहर भी रहती है। उसकी पत्नी लोक-लाज के कारण उस गंदे कपड़े को छिपाकर भी रखती है। लक्ष्‍मी को महीने के उन पांच दिनों में गायत्री की स्‍वच्‍छता की चिंता है। लक्ष्मी को जब डॉक्टर से पता चलता है कि उन पांच दिनों में महिलाएं गंदे कपड़े, राख, छाल आदि का इस्तेमाल करके कई जानलेवा और खतरनाक रोगों से ग्रसित हो जाती हैं। लक्ष्मीकांत अपनी पत्नी गायत्री से बहुत प्रेम करता है और उसके जीवन को सरल और बेहतर बनाने का हर संभव प्रयत्न करता है। वह गायत्री को सैनिटरी पैड लाकर देता है, लेकिन महंगा होने के कारण गायत्री कपड़े के इस्‍तेमाल पर ही जोर देती है। लक्ष्‍मी को अब इस ‘लेडीज प्रॉब्‍लम की चिंता सताने लगती है जबकि उसकी पत्नी गायत्री उसे औरतों वाली बात से दूर रहने की सलाह देती है।

लक्ष्मी अपनी पत्नी की ‘औरतों वाली बात’ यानी मेंस्ट्रुअल हाइजीन की समस्या को लेकर अधिक अस्थिर हो जाता है कि उस समस्या के निवारण करने के लिए स्वयं सैनिटरी पैड बनाने की कार्यविधि में जुट जाता है। किंतु इस दौरान लक्ष्मी को पहले अपनी पत्नी, बहन व मां के तिरस्कार का सामना करना पड़ता है और फिर गांव और समाज से उसे बहिष्कृत कर दिया जाता हैं। लक्ष्मी की पत्नी घर छोड़कर मायके चली जाती है, परिवार उसे छोड़ देता है। वह गाँव छोड़ किसी अन्य स्थान पर आकर रहने लगता है। उसकी चिंता पत्नी से आगे बढ़कर समाज की सारी औरतों के लिए भी हैं। लक्ष्मी सस्ता पैड बनाने के कार्य में जुट जाता है किंतु वह जिस दौर में यह निर्णय लेता है वह वर्तमान समय से 16 साल पहले यानी 2001 का समय है। देखा जाए तो उस समय में टीवी पर किसी सैनिटरी पैड के विज्ञापन के आने पर या तो चैनल बदल दिया जाता था या किसी के पूछे जाने पर उसे साबुन या किसी अन्य विज्ञापन का नाम दे दिया जाता था। ग्रामीण इलाकों में सैनिटरी पैड को गंदा और अपवित्र मानकर इससे संबंधित बात करना भी पाप समझा जाता था। अरुणाचलम मुरुगनंथम की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म पैडमैन के जरिए निर्देशक आर. बाल्की और अक्षय कुमार ने मेंस्ट्रुअल हाइजीन के प्रति लोगों को जागरूक करने की मजबूत पहल की है। वर्तमान समय में भी मासिक धर्म में अस्वच्छता की समस्‍या एक कुप्रथा बनी हुई है क्योंकि आज भी महिलाएँ इस विषय पर बात करने से कतराती हैं। जैसे कि लक्ष्मी की पत्‍नी भी इस विषय पर खुलकर बात करने से कतराती है। माहवारी को लेकर दकि‍यानूसी सोच समाज में बनी हुई है। इसके बाद अचानक लक्ष्मी की मुलाकात परी (सोनम कपूर) से होती है और वो उसकी प्रेरणा बन जाती है। पैड के इस्तेमाल जैसी जिस छोटी-सी बात को लक्ष्मी औरतों को नहीं समझा पाता, परी वह चुटकियों में कर देती है। परी नाम से सैनिटरी पैड बनाकर लक्ष्मी और परी अन्य महिलाओं को इस व्यवसाय में लाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी को यू.एन. (यूनाइटेड नेशंस) में स्पीच देने के लिए बुलाया जाता है। वहां पर लक्ष्मी जो बोलता है वो बातें सुनने वालों के दिल में उतर जाती हैं। लक्ष्मी टूटीफूटी अंग्रेज़ी में कहता हैजब आपकी मां, बहन और बेटी मजबूत होती हैं तब देश मजबूत होता है।[6] यह एक पंक्ति का संदेश है जो भारत देश के समाज के बदलाव और विकास के लिए सार्थक है।

‘पैडमैन’ के जरिए आर. बाल्की ने वास्तविक जीवन में अरुणाचलम मुरुगनाथम की कहानी को सिनेमा के पर्दे पर दर्शाया है, जो आज सभी भारतीयों के लिए प्रेरणादायक है। कोयंबटूर के अरुणाचलम ने भारत में सस्‍ते सैनिटरी पैड का आविष्‍कार किया। इस महान कार्य के लिए उन्‍हें समाज का विरोध सहना पड़ा और घोर शर्मिंदगी उठानी पड़ी। जिससे अरुणाचलम को अपना घर-परिवार भी छोड़ना पड़ा। आर. बाल्‍की ने फिल्‍म की पृष्ठभूमि को कोयंबटूर की बजाय मध्‍य प्रदेश के महेश्‍वर में रखा है, लेकिन कहानी के मर्म को टूटने नहीं दिया है। इस फिल्‍म की कहानी में मासिक धर्म को तमाम कुप्रथाओं से पृथक करके सामाजिक संदेश दिया गया है। भारत में 12-18 फीसदी महिलाएं ही सैनिटरी पैड का इस्‍तेमाल करती हैं। यह कहा जा सकता है कि माहवारी के दौरान स्त्रियों को स्वच्छ रखने के लिए सस्‍ता सैनिटरी पैड समाज की जरूरत है। वर्षों से समाज में मासिक धर्म को अशुभ माना जाता आ रहा है। किंतु यह प्राकृतिक है, जो स्त्रियों के लिए आवश्यक भी है। यदि किसी स्त्री को माहवारी न हो तो वह संतान को जन्म नहीं दे सकती और समाज उसे अशुभ व बांझ कहता है। अर्थात् स्त्री का माहवारी आना शुभ है। लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी से लेकर सस्‍ते पैड की जरूरत तक महिलाएं इस पर खुलकर बात करने व खरीदने में शर्माती है। यहाँ तक कि महिलाएं अपने पति व परिवार के लोगों को बताने-समझाने में संकोच करती है। भारतीय समाज में मासिक धर्म विशेष इसलिए भी है कि यहाँ के समाज में महिलाएं पीरियड्स और पैड के बारे में घर में सहजता से बात नहीं कर पातीं, क्योंकि मासिक धर्म को इस समाज में कुप्रथा माना जाता रहा है।

विश्वभर में मासिक धर्म के लिए कोई सम्मानपूर्ण एवं सामान्य शब्द नहीं है। भारत में ही इसे बड़े ही हीन भाव से अलग-अलग शब्दों से उच्चरित किया जाता है। ‘उत्तर भारत में पीरियड्स आना, कपड़े आना, महीना आना, सिग्नल डाउन, रेड सिग्नल, नेचर पनिशमेंट, और आजकल की छोटी बच्चियों में केक कट गया जैसी शब्दावली उपयोग में लाई जा रही है।’ माहवारी के दौरान समाज का स्त्री के प्रति बड़ा कठोर रवैया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मासिक धर्म एक स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है। जिसके दौरान स्त्री सामान्य दिनों की अपेक्षा सुस्त और कमजोर होती है। उस दौरान हमारी संस्कृति व समाज का उसके प्रति ऐसा कठोर व्यवहार क्या कोई घोर अपराध नहीं हैं? ‘गर्भधारणपोषाद्धि ततो माता गरीयसि’ इस श्लोक का सामान्यतः अर्थ है कि गर्भधारण और पोषण करने के कारण माता का पद सबसे ऊँचा है। और मनुष्य ही नहीं पृथ्वी के सभी जीवों में मादा को जननी होने के कारण श्रेष्ठ माना गया है। किंतु इस परिप्रेक्ष्य में पुरुषवादी सामंती विचारधारा से ग्रसित समाज इस उक्ति को अपने व्यवहार से अस्वीकार करते आ रहा है।

भारत में अनगिनत अंधविश्वास व मान्यताएँ भी फैली हुई है। भारतीय समाज में उत्तर से लेकर दक्षिण तक, और पूर्व से लेकर पश्चिम तक हर क्षेत्र में यह अंधविश्वास मौजूद है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कुप्रथा पैर टिकाए जमी हुई है। दक्षिण भारत में स्त्री का माहवारी आने पर उत्सव के रुप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत में कुछ-कुछ स्थानों पर मासिक धर्म के दौरान स्त्री को दूध अथवा तेल से नहलाने का रिवाज है। और जिस युवती के लिए यह उत्सव मनाया जाता है, उसे कई उपहार व भेंट परिवारजनों द्वारा दिया जाता है। किंतु इसके पश्चात दुबारा उस युवती के इस प्रक्रिया से गुजरने पर अंधविश्वासी और सामंती नियमों को उस पर थोपा जाता है। वही उत्तर भारत में यह कुप्रथा स्त्री को भीषण नियमों में घेरे हुए है।

भारतीय समाज को देखें तो यह कुप्रथाएँ लगभग सभी धर्मों, जातियों व वर्गों में फैली हुई है। भारतीय समाज में माहवारी से जुड़े कुछ प्राचीन मिथक हैं जो लंबे समय से समाज में व्याप्त हैं। भारत के गाँवों में मासिक धर्म से संबंधित मिथकों की मान्यताओं व नियमों को अस्वीकारने पर स्त्रियों को विभिन्न अनहोनियों व हानियों के आडंबर द्वारा डराया जाता है। जैसे माहवारी के दौरान महिलाओं का अछूत हो जाना, सामान्य पानी छूने पर सूखा पड़ना, फल को हाथ लगाने से पेड़ में फल नहीं आना, फसल को हाथ लगाने से फसल बर्बाद होना, सामान्य अन्य दिनों की तरह रहने पर बीमार पड़ना, मान्यताओं की अवहेलना के कारण परिवार में किसी सदस्य की मौत होना, पूजा घर में ना जाने की अनुमति, बाल नहीं धोना, अचार नहीं छूना, धार्मिक स्थलों पर जाना निषेध आदि। इन मिथकों का वैज्ञानिक तर्क हैं- पहले जमाने में जांघिया नहीं होता था और मासिक धर्म के दौरान लड़की को किसी एक कमरे में रहने को कहा जाता था। क्योंकि उस समय पैड जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी और लडकियाँ जब घरों में इधर-उधर घूमती तो गंदा खून घरों में गिरता जिसे साफ करने के लिए तालाबों या कुएं से पानी लाना पड़ता। यह हो सकता है कि हाइजीन की कमी के चलते बैक्टीरिया और इंफेक्शन फैलते होंगे और इसे रोकने के लिए लड़कियों को एक कमरे में रहने को कह दिया जाता हो। दूसरा मिथक यह कि लड़कियों को नहाने या फिर बाल धोने से मना करना। इसका कारण यह हो सकता है कि पहले जमाने में घरों में शौचालय और नहाने के लिए अलग व्यवस्था नहीं होती थी, लड़कियों को तालाबों में जाकर नहाना पड़ता होगा, तालाब का पानी रुका हुआ होता है और बैक्टीरिया फैलने का डर बना रहता होगा। यह हो सकता है इन्हीं सबको रोकने के लिए तमाम तरह की बंदिशें लगाई जाती होंगी। किंतु आज ऐसी कोई समस्या नहीं है और महिलाओं के अशुद्ध होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है बल्कि यह सिर्फ समाज में सदियों से चली आ रही परंपरा ही इसका मुख्य कारण है।

अतः भारतीय समाज के लिए यह बड़े दुःख की बात है कि वह स्त्री की इस सहज शारीरिक प्रक्रिया को अछूत रोग समझता है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद17 सभी नागरिकों को अछूत व्यवहार निष्क्रिय है, का अधिकार देता है। फिर भी स्त्री के प्रति ऐसा निर्दयी व्यवहार समाज की पुरुषवादी मनोदशा का अत्यंत पीड़ादायक दुव्र्यवहार है। स्त्रियों पर माहवारी के दौरान थोपी गई विभिन्न मान्यताओं से हम स्पष्ट समझ सकते है कि आज साहित्य, समाज और संस्कृति किस दशा और दिशा में है? आज विश्वभर में मासिक धर्म के दौरान प्रचलित कुप्रथाओं को मिटाने तथा इसके प्रति सामान्य जागरुकता बढ़ाने को लेकर बहस चल रही है। 28 मई को अंतरराष्ट्रीय मासिक धर्म दिवस 140 देशों द्वारा स्वीकार गया है। संयुक्त राष्ट्र विमेन, वर्ल्ड बैंक जैसी अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व संगठनों ने इस मासिक धर्म के विषय को मुख्यधारा के कार्यक्रमों में शामिल कर लिया है। इस प्रकार आज अनेक वैश्विक जागरुकता की रुपरेखा व कार्यक्रम बन गए है। भारत सरकार ने मासिक धर्म को राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल किया है। इसके अतिरिक्त साहित्य, समाज और सिनेमा को स्त्री की स्वच्छ्ता व मासिक धर्म से संबंधित कुप्रथाओं के निवारण के लिए प्राचीन मिथकों को आज वैज्ञानिक तर्क के द्वारा समाप्त करने का प्रयास करना होगा। तभी समाज, साहित्य और सिनेमा भारत का पारदर्शी रूप प्रस्तुत करने में सफल सिद्ध हो सकता हैं।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि साहित्य से जुड़ा और समाज का यथार्थ रूप प्रदर्शित करने वाला सिनेमा सकारात्मक विचारों को प्रस्तुत करता है। यदि उनमें निहित साहित्यिक संवेदनाओं का सिनेमाई रूपांतरण सफलतापूर्वक किया जाए। अर्थात् आज के दौर में सिनेमा समाज के मिथक कुप्रथाओं के जडवत् रूप को नष्ट करने की ओर प्रयत्नशील है। समाज में व्याप्त मासिक धर्म के विषय में साहित्य की किसी भी विधा में अभी तक कोई स्पष्ट लेखन नहीं है। जबकि आधुनिक सिनेमा में माहवारी को लेकर पैडमैन जैसी सशक्त फिल्म का निर्माण हुआ है साथ ही फिल्म में भारतीय समाज में मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों के साथ किए गए कठोर व्यवहार को भी दिखाया गया है। अर्थात् आज भी समाज में स्त्रियों के माहवारी से संबंधित अनेक प्राचीन मिथकों को जोड़ा हुआ है। जबकि प्राचीन समय में मासिक धर्म के दौरान सैनिटरी पैड स्त्रियों को इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं थे तो समाज और स्त्री को स्वच्छ रखनेके लिए यह मान्यताएँ और नियम आवश्यक थे। वर्तमान में इन कुप्रथाओं का माहवारी से कोई वैज्ञानिक तर्क या नाता नहीं है क्योंकि आधुनिक भारत में स्त्रियों को माहवारी में इस्तेमाल करने के लिए सैनिटरी पैड हैं। सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन ही नहीं वरन् समाज को शिक्ष‍ित करना भी है। फिल्‍म पैडमैन भी समाज को स्त्री स्वच्छता की शिक्षा देती है और यह तभी संभव होगा, जब इसे देखकर महिलाएं पीरियड्स के दौरान अपनी परेशानियों को लेकर मुखर हों और स्‍वच्‍छता की जरूरत को समझे। साहित्य, सिनेमा के साथ-साथ आज समाज को भी स्त्री की मासिक धर्म में स्वच्छता को लेकर जागरुक होने की आवश्यता है।

 

सन्दर्भ सूची

[1]श्रोत्रिय, प्रभाकर. भारत में महाभारत, नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ

[2]खेतान, प्रभा (अनुवाद). (2000). स्त्री उपेक्षिता, दिल्ली: सरस्वती प्रकाशन

[3]अनामिका. (1998). अनुष्टुप, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन

[4]चतुर्वेदी, जगदीश्वर. (2002). स्त्रीवादी साहित्य विमर्श, दिल्ली: अनामिका प्रकाशन

[5] फिल्म ‘पैडमैन’ से उद्धृत

[6] फिल्म ‘पैडमैन’ से उद्धृत

 

अनुराधा
शोधार्थी
वर्धा, महाराष्ट्र

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