साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य किसी भी काल का हो, उनमें समाज का यथार्थ चित्राण होता है । लेखक समाज के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है और फिर समाज का निरीक्षण कर उसमें व्याप्त बुराईयों को निकालने का प्रयास करता है । साहित्य के माध्यम से ही लेखक पाठक के मन को जागृत कर उसमें समाज के प्रति संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान करता है । रामदरश मिश्र का कथन है कि ‘ साहित्य का मूल सम्बन्ध मानव की संवेदना से है । बिना संवेदना के साहित्य नहीं बनता, चाहे उसमें बुद्धिवाद का कितना ही ऊहापोह क्यों न हो। …. साहित्य सृष्टि एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें सौन्दर्य चेतना, भाव-बोध्, मूल्य-बोध्, जीवन-चिंतन सभी संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत होता है ।‘

हिन्दी साहित्य में महिला लेखिकाओं की एक सुदीर्घ परम्परा मिलती है । साहित्य के क्षेत्र में नारी में चेतना के उस रूप का उदय हुआ जो उसने भोगा था पर दूसरे उससे अनभिज्ञ रहे थे । युगों के साथ नारी लेखन के तेवर भी बदले । लेखिकाएँ जीवन के माध्यम से कहानी और कहानी के माध्यम से जीवन की खोज करती है । वे जानती हैं कि व्यवस्था की स्थिति में बलदाव लाने के लिए समाज को गति प्रदान करना, दिशा-निर्देश करना जरूरी है । यही व्यक्ति की स्वयं प्रगति है, यही उसका जीवन बोध । डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में “साहित्य रचना की प्रक्रिया में समाज-लेखक और साहित्य परम्परा एक दूसरे को इस तरह प्रभावित करते हैं कि इनमें से प्रत्येक क्रमशः परिवर्तित और विकसित होता रहता है- समाज से लेखक, लेखक से साहित्य और साहित्य से पुनः समाज ।

मृदुला गर्ग एक ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने अपने समय और समाज की कुरूपताओं और विडंबनाओं को विश्लेषित और व्यख्यायित किया। इन्होंने तब अपने लेखन की शुरूआत की जब पाश्चात्य प्रभाव और आधुनिकता का भारतीय संस्कृति में आगमन हो रहा था और हमारा देश प्राचीन और नवीन संस्कृतियों के बीच झूल रहा था। व्यक्ति अपने-आपको आधुनिक कहलाने के अंधी दौड़ में ही अपने अस्तित्व को भूलता जा रहा है । मृदुला गर्ग की कहानियाँ आज की चुनौतियों को समाना करती है, इनके पात्रा परंपरागत अंधविश्वास, रूढ़ि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि प्रक्रियाओं के प्रति प्रश्न चिह्न लगाते हैं। इनके कथानकों के केन्द्र में नारी चेतना है। इनकी नायिकाएँ परंपरागत रूप से स्थापित नारी की छवि को तोड़ती है और उनसे मुक्त होती है। इनकी कहानियाँ सामाजिक पारिवारिक विसंगतियों, व्यवस्था के भ्रष्टाचार का प्रमाणिक आलेख हैं।

मृदुला गर्ग ने अपनी कहानियों में समकालीन समाज का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। ये अपनी रचनाओं के जरिए जहाँ राजनीतिक परिवेश की ओर पाठक की सजगता को मोड़ती हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक परिवेश में व्याप्त बुराईयों को दूर करने का प्रयास करती है। इन्होंने स्त्री के संघर्ष के जरिए समाज में ऐसा संघर्ष व्याप्त किया जो प्राचीन रूढ़ियों व प्राचीन आदर्शों को एक नया रूप प्रदान करता है।

‘दुनिया का कायदा’ कहानी के द्वारा लेखिका ने समाज की पंरपराओं पर कठोर आघात किया है । उन्होंने नारी के प्रति अन्यायपूर्ण दुनिया के कायदे की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है । एक पत्नी के मरने के बाद दूसरी पत्नी लाने की बात शुरू होती है । मृत पत्नी की स्मृति तक का आदर नहीं होता है- इसमें अचरज काहे का है लक्ष्मी बुआ बोली, यह तो दुनिया का कायदा है । औरत आदमी के बगैर रह सकती है, आदमी औरत के बगैर नहीं रह सकता ।

मुदुला गर्ग स्त्रिायों को परंपरा के नाम पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए विद्रोह और संघर्ष करने के लिए कहती हैं । उन्होंने मदन के मुँह से कहलवाया है ‘अमरीका में स्त्रिायाँ कितनी जागरूक होती हैं, जीवन से उन्हें कितना प्रेम होता है, खुले हृदय से सबसे मिलती है। यहाँ तो बचपन से स्त्रिायों को शिक्षा मिलती है लज्जा की, लज्जा ही स्त्रिायों का आभूषण है । कोरी बकवास ।

‘एक और विवाह’कहानी में आधुनिक नारी के स्वतंत्रता व्यक्तित्व को स्थापित करने का प्रयास लेखिका ने किया है । इसमें विवाह नामक संस्था और उसके औचित्य और उसमें स्त्री की भूमिका पर बहस है । इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने विवाह के बाजारीकरण को प्रस्तुत किया है, विवाह आजकल ‘इंटरव्यू’बन कर रह गया है जो कई बार के मेल-मिलाप के बाद तय होता है । स्त्री की स्वतंत्राता को ‘कोमल’ के द्वारा व्यक्त किया गया है । स्त्री शादी के बाद घर और नौकरी दोनों संभालती है, पर घरेलू नौकरी के उसे पैसे नहीं मिलते। कोमल की आधुनिक विचारधरा को लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया-

फ्विवाह के बाद आप काम करना चाहेंगी ?

फ्किस किस्म का काम ?

फ्मेरा मतलब, नौकरी।

फ्पैसों के लिए या बिना पैसों के ?

 क्या मतलब?

बिना पैसा पाये नौकरी तो सभी विवाहित स्त्रिायाँ करती हैं ।

मृदुला गर्ग एक ऐसी लेखिका है जिनकी कहानियों में समसामायिक समाज का यथार्थ रूप उजागर हुआ है। इनकी रचनाओं में केवल समाज में व्याप्त नई चेतना ही नहीं अभिव्यक्त हुई बल्कि अपनी स्वतंत्रा सत्ता की स्थापना के लिए लगातार संघर्ष करते पात्रों का चित्रण हुआ है आज  की जागरूक नारी अपनी सभी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संघर्षरत है । आज वह भावुकतावश कोई पफैसला नहीं करती बल्कि भविष्य से ज्यादा वर्तमान के बारे में सोचती है। आधुनिक स्त्री प्रेम को ही जीवन नहीं मानती बल्कि जीवन में उसे आवश्यकता के रूप में अपनाती है।

‘खरीददार’ कहानी की नायिका एक कामकाजी साहसी स्त्री है जो पुरुषों को नारी के प्रति हीनभावना, व्यंग्य, अभिमान के प्रति विद्रोह प्रकट करती है । यहाँ सामाजिक मूल्य बदले हैं, औरत आज अपने बल पर ऊँचे से ऊँचा रूतबा हासिल कर सकती है । माँ उसे समझाती है-यह तो दुनिया का कायदा है । पहले-पहले लड़की की सूरत देखी जाती है और लड़के की कमाई । तेरी तरह ज़िद करती तो आधी लड़कियाँ कुंवारी रह जाती ।

भ्रष्टाचार के फैलाव को ‘टोपी’ कहानी में मृदुला गर्ग ने बखूबी व्यक्त किया है । हमारे सारे आदर्श पूँजीवादी व्यवस्था रूपी चट्टान से टकराकर मिट गए हैं, मृदुला  जी का कहना है कि हम आजाद हैं अंग्रेजों के शोषण और भारतीयों पर किए गए अत्याचार के खिलापफ लड़कर अपना देश वापस पा चुके हैं । लेखिका एक नई जंग का ऐलान करते हुए एक नई आजादी की मांग करती हैं । आम जनता के जरिए आम जनता के लिए ।

राजनीति के छिपे छिद्रों से आदमखोर सरपरस्तों को बेनकाब करती कहानी है ‘बेनकाब’। माधव चाहे जिस कारण से बागी बना हो लेकिन वह  गरीबों, असहायों की मदद करता है। अपनी माँ के अपमान का बदला लेने के लिए उसने बेतबा इंस्पेक्टर का खून किया। राजनीति में बिनोबा के कहने पर मौका देखकर असने आत्मसमर्पण किया था ताकि उसके शहीद साथियों की जब्त जमीन उनके परिवार को वापस मिल जाए। परन्तु राजनीति फिर व्यापार कर गई- नहीं ! यह राजनीति नहीं व्यापार नीति हैं !………. आंखों के आगे अत्याचार होता देखकर आप आँखे मूँद लेते हैं । तिजारत के नये तरीके सोचते हैं, नफे की मापतौल करते हैं ।

‘प्रतिध्वनि’ कहानी भी राजनीति के दबाव के प्रति नई प्रतिध्वनि पैदा करती है। ‘प्रतिध्वनि’उस अंतध्र्वनि की काव्यात्मक कहानी है जो अंग्रेजी सभ्यता, नशा, आधुनिक भड़कीले समाज और धर्म पर गहरा प्रहार करती है । मृदुला जी का मानना है कि अपनी जिम्मेदारी खुद समझ उस पर अमल करने पर ही देश एवं समाज का कल्याण होगा-

जिम्मेदारी उनकी है, मेरी नहीं ।

वे भी यही सोचते हैं ।

सोचते नहीं, महसूस करते हैं ।

सोच के दायरे से बाहर आकर भी दायरों में बंद रहते हैं ।

आधुनिक जमाने में बेहतर से बेहतर नौकरी की तलाश में युवा पीढ़ी का नौकरी पर नौकरी बदलने की स्थिति का बयान ‘मंजूर-नामंजूर’ कहानी में मिलता है। ‘मंजूर-नामंजूर’ दो बहनों की कहानी है। मंजूर बड़ी और नामंजूर छोटी बहन है । नामंजूर का पति एक जगह स्थाई नौकरी करता है तो मंजूर का पति बार-बार बेहतर नौकरी की तलाश में जगह बदलता रहता है । इस कहानी में बाजारीकरण तथा आधुनिकता के झमेले में पड़े नव युवकों की नई सोच का बाजारीकरण प्रस्तुत किया गया है  । बाजार के पीछे भागने वाले भगोड़ों से अपनी संस्कृति के बचाव की मांग लेखिका का उद्देश्य है ।

आर्थिक असमानता के कारण भारतीय जनता में असंतोष की ज्वाला प्रज्वलित होती जा रही है । अर्थ ही जीवन का विधयक बन चुका है  । मूल्यों के विघटन से मानव का मूल्यांकन ध्न के आधर पर ही होता है । मृदुला गर्ग ने आर्थिक विषमता का चित्राण ‘अनाड़ी’ नामक कहानी में किया है।

                        इस कहानी में सुवर्णा नामक 12 वर्ष की बच्ची हैं जो स्कूल जाने की उम्र में किसी अमीर घर की नौकरानी है । परन्तु उस पर कोई बेचारगी जताए यह उसे पंसद नहीं । उस पर तरस खाते सेठ जी से वह बहुत बेबाकी से कहती है- इतना तरस आ रहा है तो भेज दो न स्कूल करवा दो उसकी पढ़ाई लिखाई का इंतेजाम । ना वो इसके बस का नई ।

जीवन को विभिन्न दृष्टियों से परखने पर ही कला अपनी संपूर्णावस्था में निखरती है । मृदुला गर्ग ने विभिन्न सरोकारों को एक गांठ में जिल्द बंद कर अपनी संपूर्ण जटिलताओं में भी कृति के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है । उनका कथा साहित्य जहाँ प्रेम प्रसंग केा घोषित करता है । वही लगभग संपूर्ण मानव जीवन संबंधी समस्याओं एवं जीवन मूल्यों को भी इंगित करता है । उनकी कहानियां मानव जीवन की गहन संवेदनाओं से गहरा सरोकार रखती है ।

                        मृदुला गर्ग समसामायिक विषयों की गहरी पड़ताल करती है । आत्मविश्वासी मृदुला गर्ग ने अपने जीवननुभवो की तर्ज पर अपनी कहानियों की नींव डाली । वे स्त्री को उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि जीवित व्यक्ति मानती है । उनकी कहानियाँ समाज की वास्तविकता को दर्शाती है । निःसंदेह मृदुला गर्ग आधुनिक जीवन के नए यथार्थ को तराशनेवाली तथा आधुनिक मानव के अंतरंग सत्य को अनावृत करने वाले साहित्यकारों में अग्रणी है ।

 

संदर्भ ग्रंथ –

  1. नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2002
  2. मृदुला गर्ग, कितनी कैदें, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, कृष्णा नगर, दिल्ली-51, प्रथम संस्करण 1975
  3. मृदुला गर्ग, हरी बिंदी, समसामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, तीसरा संस्करण 2008
  4. मृदुला गर्ग, ग्लेशियर से, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2 , प्रथम संस्करण 1986
  5. मृदुला गर्ग, जूते का जोड़ गोभी का तोड़, पेंगुड़न बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
  6. मृदुला गर्ग स्त्री प्रथम कहानियाँ, वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर, प्रथम संस्करण 2010
  7. रामदरश मिश्रा, आज का हिंदी साहित्य संवेदना और शिल्प अभिनव प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण 1975

सुमिता त्रिपाठी
शोधार्थी

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