मैं अमृत की जय, मरण का भय नहीं हूँ,

नियति हूँ, निर्माण हूँ, बलिदान हूँ मैं,

          जिन्दगी हूँ, साधना हूँ, ज्ञान हूँ मैं,

सूझ हूँ, श्रम हूँ, प्रखर आदित्य हूँ मैं,

          मैं जमाना हूँ, स्वयं साहित्य हूँ मैं।

                     ग्                     ग्                     ग्        

बाढ़ में तूफान में इन्सान हूँ मैं,

          शीश पर हिमगिरि लिए, पहचान हूँ मैं।

उठो, जीवन से न कतराओ, खिलो तुम,

          उठो, जीवन वा गया है, हँसकर मिलो तुम।

          भारतीय मुक्ति संग्राम के इस अमर सैनिक की ये पंक्तियाँ जिन ओज, उत्साह और विश्वास से सुसज्जित हैं, वे भारत की क्रन्दन करती निर्धन जनता में ‘दरिद्र देवता’ के दर्दमनीय दर्शन से ऊर्जस्विता हासिल करती हैं और जेल की दीवारों में कैद चक्की के अंधियारे पार्टों के घर्षण से स्वतंत्रता के प्रकाश का आह्वान करती हैं। काव्य, गद्य, पत्रकारिता या पत्र-लेखन, कहानी, नाटक या गद्यकाव्य, प्रेम, भक्ति, क्रांति या विद्रोह सभी में राष्ट्र को ही आराध्यदेव मानने वाले इस राष्ट्रीय एवं स्वाधीन चेतना के धधकते ज्वालामुखी ने राष्ट्र रक्षा के निमित्त समर्पण एवं बलिदान के ही गीत गाये और सुनाये हैं। ‘हिमकिरीटिनी’, ‘हिमतंरगिनी’, ‘माता’, ‘युगचरण’, ‘समर्पण’, ‘वेणु ले गूंजे धरा’, ‘मरण ज्वार’, ‘बीजुरी काजल आँज रही’ और ‘धूम्रवलय’ जैसी काव्य कृतियाँ, ‘कृष्णार्जुन युद्ध’, जैसा प्रतीक नाटक ‘समय के पाँव’ जैसी संस्मरणात्मक कृति या ‘साहित्य देवता’, ‘अमीर इरादे गरीब इरादे’, ‘पाँव-पांव और रंगों की बोली’ जैसे निबंध संग्रह- सभी में इस क्रांतिदूत की संघर्ष यात्रा का दस्तावेजी ब्यौरा है! यही नहीं समय-समय पर लिखे गए चतुर्वेदीजी के पत्र तथा यत तव दिए गए भाषण भी जन जागरण और उद्बोधन से ओत-प्रोत हैं। ‘कर्मवीर’ नामक पत्रिका के माध्यम से भी अमरराष्ट्र, उद्दण्ड राष्ट्र और उन्मुक्त राष्ट्र के निर्माण की आकांक्षा रखने वाला यह विद्रोही स्वर देश प्रेम, देश वंदना और देश भक्ति का डंका बजाता रहा।

          स्वाधीनता संग्राम की ऐतिहासिक गति ने जिसकी रचनात्मक प्रतिभा को और तीखा किया हो, साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी तथा पूंजीवादी शक्तियों के बेदर्द शोषण ने जिस ज्वाला को और धधकाया हो, वंदेमातरम जैसे सांस्कृतिक संवेदन और सामर्थ्य गुण गर्जन ने जिस चेतना में जागरण नाद भरा हो उस ‘पुत्र-पुष्प’ की चाह भला मातृभूमि के चरणों में समर्पित होने के अतिरिक्त और हो भी क्या सकती थी-

चाह नही मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ,

चाह नही प्रेमी माला में विध प्यारी को ललचाऊं,

चाह नही सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं,

चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ भाग्य पर इतराऊं,

मुझे तोड़ लेना बन माली उस पथ में देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।2

          वंदेमातरम की मूल भावना जिस साहित्यकार के सृजन और चिन्तन की मूल भावभूमि बनती है, फिरंगी शासन का दिल तो स्वतः ही उसके गर्जन की गूंज से थर-थर कांपने लगता है। ‘मरण त्यौहार‘, ‘जवानी’, ‘सिपाही’, ‘विद्रोही’ तथा ‘कैदी और कोकिल’ जैसी क्रांति लहरियाँ प्रकट करती कविताएँ स्वयं ही इस कर्मवीर की जन्मजात वीरता का बखान करती है। बाल गंगाधर तिलक के ‘मराठा’ और ‘हिन्द केसरी’ की अग्नि शिखा से ज्वालाओं को निमंत्रित करने वाला यह शूरवीर ‘प्रभा’ और ‘कर्मवीर’ की क्रांति लौ जलाकर पराधीनता के भयावह तथा अंधकारमय चक्रव्यूह को ललकारता है’

क्यों पड़ी परतन्त्रता की बेड़ियां?

दासता की हाथ हथकड़ियां पड़ीं।

न्याय का मुंह बन्द भांसी के लिए

कंठ पर जंजीर की लड़ियां पड़ीं।3

          राष्ट्रीय स्वातन्त्रय का दस्तावेजी इतिहास कवितात्मक शैली में लिख रहे राष्ट्रीय चेतना के इस प्रतिरूप ने समय के पैरों को उनके चिन्हों को तथा कदमों की आहट को देखा, पहचाना और जी भर के सुना है। प्रेम प्रकृति और आध्यात्मिक ससार में भी राष्ट्रीय चेतना को विद्रोही शंखनाद से निमंत्रण देते रहने वाले इस मां-भारती के ‘जागृति पुत्र’ ने बांसुरी वादन से मंत्रमुग्ध करके गुलामी की काली अंधियारी रातों को चिर निद्रा में सुलाकर स्वतंत्रता की मीठी, उनींदी और शोब मस्ती भरी सुबह को जगाया, वह साक्षात नटवर भगवान श्रीकृष्ण की वेणु ही तो थी जो अपनी मधुर लहरियों से क्रांति पुत्रों को बरबस तथा अनायास उस क्रांति-ध्वज के नीचे खीच लाती थी।

          बलिदान की दृढ़ भावना से सुसज्जित राष्ट्रीय प्रगीतों को जन-जन के आँचल में ‘क्रांति पुष्प’ या ‘जागृति प्रतीक’ सा बाँटता यह महासाधु तप, त्याग, अहिंसा तथा प्रेम का पुजारी भी था ती राजनीतिक सर्प के फुकरण और विदेशी शासकों की यातनाओं से भयभीत न होने वाला प्रखर, कर्मवीर, शूरवीर और विद्रोही सिपाही भी। अमीर इरादे: गरीब इरादे में चतुर्वेदी जी स्वयं कहते भी हैं- ‘पीढ़ी को तुम मधुर गार्ने दो तो प्राणों की उठान भी दो, सपने फूल तो बलि के पुष्प भी फूलै कली चटके तो आकाश से गोलियां भी चटक दें। रिमझिम मेह बरसे तो बारुद की फुलझड़िया क्यों न रंग दें?’4 स्वामी विवेकानन्द के ‘‘उठो, जागो गंतव्य को प्राप्त करो’’ जैसे मंत्र ने तथा महर्षि अरविन्द घोष के ‘राष्ट्रवाद एक ईश्वरीय धर्म है’, राष्ट्र ईश्वर है जैसे जाप ने इस भारत पुत्र को मातृ वंदना का पाठ पढ़ाया तो लोकमान्य तिलक के ‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे’ जैसे उद्घोष ने माखनलाल चतुर्वेदी को लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, दादाभाई नौरोजी, महात्मा गांधी, गोपाल कृष्ण गोखले, मोतीलाल नेहरु तथा चितरंजनदास जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पंक्ति में ला खड़ा किया। बाल गंगाधर तिलक के जादू भरे इरादों का अद्भुत जादू इस महाकवि पर भी चढ़ कर बोलने लगा। एक एक कविता जैसे क्रांति के स्फुल्लिंग बिखेरने मगी-

सूरज सावधान हो जाओ, मातृभूमि तुम धरलो धीर

पश्चिम तू भी शीघ्र समझ ले, नीति बदल बन जा गंभीर।

कर्मक्षेत्र में आते हैं अब करने को जननी का त्राण,

कई करोड़ दुःखों के व्याकुल, भारत के भावी विद्वान।5

          अफ्रीका में गांधीजी का रोमांचकारी संघर्ष चतुर्वेदीजी के उत्साह को प्रेरित कर कर रहा था तो विराट जन्म भूमि की विकृतियां रूपायित होकर उन्हें संघर्ष की चुनौती का निमंत्रण दे रही थीं। गांधीजी के सत्याग्रह की ध्वनि समग्र विश्व में गूंज रही थी तो खण्डवा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘प्रभा’ स्वतंत्रता के लिए निष्काम कर्म की चेतना को विकीर्ण करती हुई भारतीयता की शान और अभिमान की कसौटी निर्धारित कर रही थी-

मेरे जीते पूरा स्वराज्य भारत पाये अरमान यही।

बस शान यही अभिमान यही हम कोटि-कोटि की जान यही।

          जिस महायोद्धा की जीवन यात्रा का विराम में विश्वास ही न हो, उस अथक क्रांति पुत्र को तो पराधीनता, गरीबी, अशिक्षा, हीनभावना, भाषिक अवमूल्यन, भारती पुत्र की देन्यता, शिल्प और कला की हत्या, गौरव चेतना का ह्रास, साम्प्रदायिक तथा ऊँच-नीच के भेद-भाव आदि कितने ही सोपानों पर निरंतर विजय ध्वज लहराने थे। सभी चुनौतियों का ऋण चुकाना था। मानवता धर्म से वंचित हो रहे राष्ट्र को उसकी ग्लानि और क्षोभ से मुक्त कराना था और ये सभी दायित्व माखनलाल चतुर्वेदी जी ने अपनी अंतिम श्वास तक निभाये। अपने राष्ट्रीय सांस्कृतिक साहित्य से वे सार्वभौमिक, वैश्विक तथा चिरंतन-मूल्यों की वह धरोहर हमें सौप गए जिसके सामने बड़ी-बड़ी तोपों के मुंह बंद या फीके पड़ जाते हैं।

          तत्कालीन भारत की दारुण परतंत्रता, अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण दुरभिमानी सत्ताधारिता तथा घोर, भयावह एवं निकृष्टतम सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों का जाल, प्रथम विश्व युद्ध का निराशा हताशा भरा परिवेश, युद्ध की विभीषिकाओं के सम्मुख बिलबिलाता अपाहिज विश्व जीवन तथा व्यक्तितगत स्वार्थों के अतृप्त अहम का शिकार बना पूरा वायुमण्डल सभी कुछ कवि के हृदय को खंडित भी करते हैं तो उस विचलित होते भाव हृदय को विद्रोही बनाने की भूमिका भी निभाते हैं। दैन्य और दैन्य उत्पन्न करने वाली शक्तियां संघर्ष भूमि का निर्माण करती हैं तो स्वाभिमान का शंख श्रेणीवाद को मिटा देने के लिए क्रांति चक्र का आह्वान करता है-

पधारो, एक बार फिर सुनें धनुष की वह अद्भुत टंकार

पधारो, मेघनाथ दब जाय, हो पड़े जहां कठिन हुंकार

ग                     ग                     ग

मातृ-भू कौशल्या की गोद आज हरी हरी हो उठे

कष्ट में लेता हूँ अवतार तुम्हारी बात खरी हो उठे,

नगारों से नगरों में नाथ मुबारकबादी-सी सुन पड़े

कंटीली जंजीरे कट जायें, जरा आजादी सी सुन पढ़े।।

          नवीन युग और नयी पीढ़ी को आह्वान और संस्कार दे सकने वाले परम आस्तिक की उस जागरूक, स्वाध्यायी, समर्पणशील, निर्भीक तथा स्वातंत्त्रयप्रिय सौन्दर्य दृष्टि को जितनी बार नमन करें, कम है जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता की महत्ता को अनुभव किया, पहचाना और भावाकुल अनुरोध किया कि इस भेद-भाव की संकीर्णता में मानव जीवन ही नहीं इस जीवन का जनक भी कलंकित होता है-

मन्दिर में हो चाँद चमकता, मसजिद में मुरली की तान,

मक्का हो चाहे वृन्दावन, होवें आपस में कुरबान

ग                     ग                     ग

हिन्दी माता की दोनों आंख, नाक को रखकर बीचों बीच,

अश्रु की उज्ज्वल धारा छोड़, प्रेम का पौधा देवें सोच।।

          यही नहीं, इस गुलाम और अनपढ़ देश में मनुष्य को अशिक्षा के अभाव में तिल तिल कर पिसते या शोषित होते भी कवि ने देखा उस शोषण की पीड़ा और कथा को सुना, गुना, गुनगुनाया तथा जन-जन को सुनाया भी-

अन्न नहीं है, फीस नहीं है, पुस्तक है न सहायक हाय,

जी में आता है पढ़ लिख लें, पर इसका है नहीं उपाय।

कोई हमें पढ़ाओ भाई, हुए हमारे व्याकुल प्राण,

हा! हा!! रोते फिरते हैं भारत के भावी विद्वान।

          भारत की आत्मा से साधारणीकृत हो जाने वाली इस ‘भारतीय आत्मा ने उद्बोधन क्षमता’, व्यापक दृष्टि, शोषितों और असहायों के प्रति हार्दिक सहानुभूति, संघर्षोन्मुखता, प्रखरता, तथा स्पष्टता के कारण अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई और यह विशिष्ट पहचान ही उनके सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों को रेखांकित करती हैं। जबलपुर से सन् 1920 में माखनलालजी के सम्पादन में निकले ‘कर्मवीर’ के पहले अंक के सम्पादकीय ने ही गुलामी की जंजीरें काट फेंकने का उद्घोष किया। किसान मजदूर, छोटे-बड़े पढ़े बेपढ़े, स्त्री-पुरुष तथा बच्चे वह सभी को इस कर्म स्थल पर मातृ-सेवा के दायित्व निर्वाहकी मंजिल पाने के लिए आत्मविश्वास की दीपशिखा प्रदान की – ‘‘हमारी आँखों में भारतीय जीवन गुलामी की जंजीरों में कसा दीखता है। हृदय की पवित्रता से हम प्रयत्न करेंगे कि व जंजीरें फिसल जाएं … हम स्वतंत्रता के हामी हैं, मुक्ति के उपासक हैं। राजनीति या समाज में साहित्य में या धर्म में, जहां भी स्वतंत्रता का पथ रोका जाये, ठोकर मारने वाले का पहला प्रहार और घातक के शस्त्र का पहला वार आदर से लेकर मुक्त होने के लिए हम प्रस्तुत रहेंगे, दासता से हमारा मतभेद रहेगा फिर चाहे वह शरीर की हो या मन की, व्यक्तियों की हो या परिस्थितियों की।’’

          व्यापक परिधि का यह कवि व्यक्तित्व जितना दूरदर्शी था उतना ही बलिष्ठ भी। स्वाधीनता अभियान पर इस कवि की उसके साहित्य की, उसकी सृजनात्मकता की तथा पत्र पत्रिकाओं की समग्र शक्ति केन्द्रित थी। उसकी आजादी की संकल्पना मधु मिठास सी थी किन्तु उस मिठास का घोल कुर्बानी से तैयार होता था। गुलामी के उपकारणों को उतार फेंकने के लिए कृत संकल्प यह संघर्षरत कर्मवीर निर्भय होकर खतरों से खेलता रहा और पदलोलुपों, शोषकों तथा रूढ़िवादियों से भी जमकर लोहा लेता रहा-

‘‘पापी शासन पर अप्रियता उपजाना श्रुति-सम्मत है’’

          डॉ. रामविलास शर्मा ने ‘माखनलाल चतुर्वेदी: यात्रा पुरुष’ में लिखा है- ‘‘माखनलालजी के काव्य ने साधारण युवकों को नहीं तरुण क्रांतिकारियों को भी प्रभावित किया। साम्राज्यवादी दमन से निडर होकर संघर्ष करने वाली नौजवानों की एक पुरी पीढ़ी माखनलालजी की कविताएं गुनगुनाती हुई अपने अनुशासन और आत्मबल को दृढ़ कर चुकी हैं। ऐसी सफलता बिरले ही कवियों को मिलती है।’’6

          स्पष्ट है कि माखनलालजी की कविताएं समग्र भारतीय इतिहास की आवाज थीं, हैं और सदैव रहेंगी। पूरे देश के हृदय को झकझोर देने वाली इन कविताओं का जादू रह-रह कर स्वयं बोलता है। उत्साह, ओजस्विता तथा मनस्विता की विलक्षण अभिव्यक्ति उसे सांस्कृतिक संस्कार देती है तो भाव, संकल्प और विश्वास की शक्ति उनकी कलम को अद्भुत जादू प्रदान करती है। ‘‘ऊँची काली दीवारों के घेरे में, डाकू चोरों, बदमाशों के ढेरे में’’ घिरा रह कर भी जो हार नहीं मानता और निरंतर ‘‘खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कुआँ’’ कहकर अपना संकल्प दोहराता रहता है, वह कवि निश्चित ही धरती और स्वर्ग के नैसर्गिक स्वर को साकार करता है-

धड़ से घड़ को जोड़ बना तू भारत एक अखिण्डत

तेरे यश का गान करेंगे प्रलय नाद के पंडित।

          देश को, आत्मा का भीतरी ठहराव और आत्म दीप्ति का वरदान बलिदान का गौरव तथा दर्प जगाने वाली इन्हीं कविताओं से मिलता है। आत्मोत्सर्ग का बल, राष्ट्र देवता की आराधना तथा राष्ट्र मन्दिर की उपासना जिस कविता में कूट-कूट कर भर दी गई हो, उस चिरंतन देदीप्यमान कविता की पहचान भला और वन भी क्या सकती है? जेल की बन्द दीवारों में कैद हुई कोकिला के स्वरों से भी जो कवि प्रलयकारी-जागृति के स्वर की अपेक्षा रखता है उस आलादमयी अग्नि के ज्वालामुखी बन जाने वाले स्फुल्लिंगों की भला और पहचान क्या होगी? निःसंदेह स्वतन्त्रता संग्राम के इस सक्रिय सैनिक ने समग्र हिन्दी साहित्य में ही नहीं भारतीय साहित्य एवं राजनीति में एक खलबली मचा दी। ‘सूली के पथ’ पर बलि का अंगारा बन जाने वाला यह गांधी भक्त भुजदण्डों की रक्त वाहिनी के प्रति भी पूर्णतः आश्वस्त था। इसीलिए ‘‘प्राण अन्तर के लिए, पागल जवानी। कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी’’ जैसी अमर जागरण की महाप्राण ध्वनि से युवा आकाश में गुंजन पैदा करते हुए ‘‘चढ़ा दे स्वातन्त्त्रय प्रभु पर अमर पानी’’ की आकांक्षा जाहिर करता है।

          ‘‘युग और तुम’’, ‘‘तिलक’’, ‘‘रोने दो लुट गया आज’’, तथा ‘‘राष्ट्रीय झण्डे की भेंट’’ जैसी कविताएँ भी कवि के वीरोन्मेष से परिपूर्ण व्यक्तित्व की मार्मिक व्याख्या करती हैं। सेवाव्रत और रचनात्मक गंतव्य को प्राप्ति के लिए किया गया कवि का विद्रोह धवंस का नहीं, कल्याण का पोषक है। गुलामी की जंजीरें काट फेकने का मंत्र कानों कान फूंक देने वाला यह कवि जो हिमालय की दीवारों को ‘‘कारागृह’’ सा, गंगा-जमुना को ‘‘गले के तौक’’, सागर की लहरों की ‘‘हथकड़िया’’ तथा रामेश्वर पर चढ़ी तरंगों को ‘‘पैरों की कड़ियां या बेड़ियां’’ कहकर तीस करोड़ भारतीय जनता के बंदी होने की घोषणा करता था, जो उन्हें निमंत्रित करते हुए आत्मदान, शीपदान और सर्वदान का संदेश भी देता था-

चलो सजाओ सैन्य, समय की भरपाई के दिन आये हैं,

आज प्राण देने, युग की तरुणाई के दिन आये हैं।

ग                     ग                     ग

हिमगिरि मुकुट कहाता अपना, अरे मुकुट पर वार सहोगे,

गंगा जमना मांग रही है बलियाँ क्या इन्कार करोगे?

ग                     ग                     ग

गंगा मांग रही है मस्तक, जमना माँग रही है सपने,

आज जवानी स्वयं टटोलते सिर हथेलियां अपने अपने।

          और एक समय ऐसा आता है कि कारागृह का अंधकार घटने लगता है। आजादी का मदमाता और स्फूर्तिभरा प्रकाश पुंज उदित होकर चारों ओर विकीर्ण होने लगता है। ‘जवानी की बलि’ अपने ध्येय तक पहुंचती है। कैदी कोकिला का स्वर परतंत्रता को जड़ को काट फेंकता है। झोपड़ियाँ अमर सुहागिन बनने लगती हैं। सूना साकेत फिर से आबाद होने लगता है और कवि उत्साह तथा अह्लाद में विजय की ‘स्मरण वेला’ का उत्सव मनाते हुए कहता है-

हो गया आबाद फिर साकेत सूना,

जातियाँ घुल-मिल गई कह नेह दूना।

साम्राज्य मिटा कटी कड़ियां पुरानी,

राम राज्य हुआ रचो जाग्रत कहानी।

ग                     ग                     ग

आज वे मजबूरियां बड़भागिनी हैं,

आज झोंपड़ियाँ अनन्त सुहागिनी हैं।

          निश्चित ही प्रेम, रहस्य तथा प्रकृति में भी राष्ट्रीयता का साक्षात दर्शन करने और कराने की क्षमता और सामथ्र्य रखने वाला यह देश-प्रेमी – क्रांति-पुत्र अतीत के ऐतिहासिक गौरव का सांस्कृतिक-आख्याता भी है तो पराधीनता से जनमें असंतोष को आक्रोश की ज्वाला में भस्म कर राष्ट्र देव की उपासना में दत्तचित्त रहने वाला पुजारी भी। क्रांति यज्ञ में समिधा बनकर निरन्तर स्वयं को होम करने का धैर्य तथा पथरीली धरती का सा स्थैर्य जिस कवि के पास हो, दुर्घर्ष चट्टानों का प्रतिध्वनित विद्रोही स्वर और अन्याय के सामने घनघोर गर्जन करने वाले बादलों की तरह सीना तान कर अड़ जाने का हठ जिस कवि का धर्म बन गया हो, निश्चित ही वह कवि समुद्री तूफान में भी अडिग तथा अविचलित खड़ी रहने वाली चट्टान का प्रतीक है। युग की अन्र्तध्वनि को सुनने की शक्ति तथा उस अन्र्तध्वनि के घनघोर नाद को जन-जन तक पहुंचाने का साहस रखने वाला यह महाकवि शत शत नमन के योग्य है। शक्ति, साहस, धैर्य तथा ऊर्जा के इस कवि को, कवि की ही पंक्तियों में स्मरण करते हुए प्रणाम किया जा सकता है-

क्या जले बारूद?

हिम के प्राण पाये।

क्या मिला? जो प्रलय

के सपने न भाये।

धरा? यह तरबूज

है दो फाँक कर दे

चढ़ा दे स्वातन्त्रय प्रभु पर अमर पानी।

विश्व माने तू जवानी है जवानी। 

संदर्भ –

  1. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली भाग 6, पृ. 296.
  2. पुष्प की अभिलाषा, माखनलाल चतुर्वेदी।
  3. हृदय, माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, भाग-6, पृ. 38.
  4. वही, पृ. 24.
  5. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली भाग 6.
  6. माखनलाल चतुर्वेदी: यात्रा पुरुष, डाॅ. रामविलास शर्मा, पृ. 258.

डाॅ. ममता सिंगला
एसोसिएट प्रोफेसर
भगिनी निवेदिता काॅलेज

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