समस्त मानव-समाज को एक सूत्र में बाँधने वाली, मानव जाति को सहस्रों पीढ़ियों की ज्ञान-मंजूषा को अन्य भाषी-भाषी समुदाय के प्रबुद्ध जनों के चिंतन की भाव-भूमि पर स्थापित करने वाली; शताब्दियों के अनुभव, श्रम, रीति, नीति एवं विचार के वाक्-मोतियों को समस्त भाषाओं के कंठहार में पिरोने वाली, ‘अनुवाद-कला’ के महत्व को व्याख्यायित करने की आवश्यकता नहीं है। सर्वविदित है कि अनुवाद मूलतः सृजन का पुनर्सृजन है। इसी कला के माध्यम से मानव-समाज, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आज इतना आगे बढ़ गया है। एक भाषा-विशेष की किसी गतिविधि के प्रकाश में आने के कुछ समय पश्चात् ही अखिल विश्व के मनीषियों को उसका बोध हो जाना अनुवाद की त्वरित गति को ही रेखांकित करता है। आज के युग में जहाँ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के कारण वैश्विक दृष्टि ही पूर्णतः बदलती जा रही है, वहाँ मात्र निज भाषा के साहित्य अथवा विज्ञान की चर्चा करना हास्यास्पद ही माना जाएगा। भूमंडलीकरण के विचार को रचनात्मक रूप देने के लिए एक ऐसी सृजनात्मक विद्या की आवश्यकता है जो द्वैत को अद्वैत में परिणत कर दे। तथा यह स्पष्ट है कि इस अद्वितीय कार्य को पूर्ण करने में अनुवाद ही समर्थ सिद्ध होगा। किंतु इस तथ्य से भली-भाँति परिचित होते हुए भी भारतीय भाषाओं के अनुवाद की विडम्बना यह है कि वे विदेशी भाषाओं के समक्ष घुटने टेकती हुई दृष्टिगत होती हैं। भाषायी उत्थान के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ संस्थाएँ, भाषाविद् एवं समाज-सेवी अपने दायित्व को या तो विस्मृत कर चुके हैं या एक बोझ की भाँति वे इस कार्य को मात्र ढोते चले जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी भाषा समुदाय स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात् भी परतंत्रता की किसी ग्रंथि से पीड़ित हैं। अपनी भाषा हिंदी, जो कि समस्त भावों को व्यक्त करने में पूर्णतः समर्थ है, को वे अंग्रेज़ी के वर्चस्व के कारण हीन ही मानते चले आ रहे हैं। अतः आज आवश्यकता है एक ऐसी भाषायी क्रांति की जो मनुष्य को मात्र हिंदी में सोचने के लिए ही विवश न करे अपितु उसकी प्रत्येक अभिव्यक्ति का माध्यम हिंदी को ही बना दे। इस क्रांति को सफलता के शिखर पर पहुँचाने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। अनुवाद के ही माध्यम से विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ एवं नवीन विचार हिंदी भाषी समुदाय की ज्ञान-पिपासा को शांत कर सकते हैं तथा दूसरी और हिंदी की पुष्पित-पल्लवित रचनाएँ भी अनुवाद के द्वारा ही समस्त संसार को अपनी उज्जवल विचारधारा से प्रभावित कर सकती हैं।

                अनुवाद के महत्व को प्रभावित करने एवं अनुवाद से जुड़े समस्त आयामों को सर्वसाधारण के लिए ग्राह्य बनाने का स्तुत्य प्रयास ‘अनुवाद बोध’ में स्पष्ट रूप से द्रष्टव्य है। यद्यपि भारतीय अनुवाद परिषद की संस्थापिका डॉ. गार्गी गुप्त ने हिंदी भाषा की अस्मिता को सुरक्षित रखने तथा विश्व में भाषायी मंच पर हिंदी को स्थापित करने के लिए अनुवाद की उपादेयता को बहुत पहले ही आंक कर ‘अनुवाद बोध’ के प्रथम संस्करण को सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था तथापि उस पूर्व सिद्ध प्रयास को और अधिक पुष्ट करने तथा अनुवाद से जुड़ी प्रत्येक गुत्थी को परत-दर-परत सुलझाने की दिशा में डॉ. टण्डन ने इस पुस्तक को परिशोधित करके पुनः जो रूप प्रदान किया है, उसकी सार्थकता असंदिग्ध है।

                इस पुस्तक के अंतर्गत अनुवाद क्या है? अनुवादक का क्या दायित्व है? अनुवाद एक शिल्प है या सृजनात्मक कला है? साहित्यिक अनुवाद का क्या स्वरूप होना चाहिा? अनुवाद में पर्यायवाची शब्दों के साथ क्या समस्या है? विधि साहित्य के अनुवाद का क्या स्वरूप होना चाहिए? सरकारी कार्यालयों में अनुवाद किस प्रकार उपयोगी है? मीडिया में अनुवादक की क्या भूमिका है? शब्दानुवाद एवं भावानुवाद में से मूल पाठक की आत्मा को कौन सार्थक ढंग से व्यक्त कर पाता है? बिंबानुवाद की क्या समस्याएँ हैं तथा उनका समाधान किस प्रकार किया जा सकता है? वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक साहित्य के अनुवाद में पारिभाषिक शब्दावली का क्या महत्व है? जैसे अनेक सैद्धांतिक विषयों की तो सविस्तार चर्चा की ही गई है साथ ही अनुवाद के आदर्श, अनुवाद के भविष्य, अनुवाद की दुश्वार और आनंददायक स्थिति, अनुवाद-समीक्षा और अनुवाद-मूल्यांकन, अनुवाद के चमत्कार, अनुवाद से संबंधित प्रसिद्ध सूक्तियों को भी चर्चा का विषय बनाया गया है। संक्षेप में कहें तो अनुवाद शब्द के विचार से जितने भी प्रश्न एवं जिज्ञासाएँ मुनष्य के मन-मस्तिष्क को आंदोलित कर सकती हैं उन सबका उत्तर इस पुस्तक में सहज ही देखा जा सकता है।

                अनुवाद से संबंधित विभिन्न विचारकों में यह मतभेद आरंभ से ही विद्यमान है कि अनुवाद शिल्प है या सृजनात्मक कला। इस मतभेद को डॉ. रणजीत साहा ने अपने लेख ‘अनुवाद एक सृजनात्मक कला है’ के माध्यम से एक सीमा तक समाप्त करने का प्रयास किया है। उनका मत है ‘अनुवाद के प्रयोजन पक्ष को, अनुवाद के शिल्प (भाषा-प्रयोग, संरचनात्मक बोध और विन्यास संबंधी अनुषंग) और कला (लालित्य बोध, अन्विति और सांस्कृतिक संप्रेषण) – दोनों के ही समानुपातिक तालमेल की आवश्यकता होती है। शिल्प भाषा के स्थूल स्तर पर कला उसके सूक्ष्म (भाव) स्तर पर अपने-अपने निकाय को स्पष्ट और प्रकट करते हैं। वस्तुनिष्ठता और आत्मनिष्ठा का यह सामंजस्य ‘शरीर और आत्मा’ के चिरपरिचित रूपक द्वारा सहज ही समझा जा सकता है।’ स्पष्ट है कि अनुवाद शिल्प और कला दोनों के संतुलित समन्वय की स्थिति है।

                ‘अनुवाद’ शब्द सुनने में भले ही अत्यंत सहज प्रतीत हो किंतु जब इसकी बारीकियों से साक्षात्कार होता है तब मूल समस्याएँ उभरकर अनुवादक को चहुँ ओर से घेर लेती हैं, जैसे – अनुवाद के पाठक भिन्न-भिन्न वर्गों से संबंधित हो सकते हैं, अतः अनुवादक से उनकी अपेक्षाएँ भी भिन्न-भिन्न होंगी। अनूद्य सामग्री को प्रस्तुत करने का उद्देश्य तथा अनूद्य सामग्री को पढ़ने का उद्देश्य भी अलग-अलग हो सकता है। अनुवाद की शैली और मूल पाठ की शैली भी अनुवादक के समक्ष व्यवधान उत्पन्न कर सकती है। मूल लेख की स्वाभाविकता अनुवाद में आ रही है या नहीं – इस बात को नज़रअंदाज़ करके अनुवादक अनुवाद का आदर्श रूप प्रस्तुत करने में समर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। अनुवादक को इन विकट परिस्थितियों में किस प्रकार अपने कर्तव्य-कर्म का निर्वाह करना चाहिए – इन महत्वपूर्ण पहलुओं को ‘अनुवाद-बोध’ में यथास्थान बखूबी उजागर किया गया है। डॉ. टण्डन द्वारा संपादित इस पुस्तक की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें न केवल हिंदी-भाषी लेखकों के विचारों को समाहित किया गया है वरन् अहिंदी-भाषी विद्वानों के विद्वतापूर्ण लेखों को अनुदित करके पाठक-वर्ग तक पहुँचाने का सफल प्रयास भी किया गया है। इस दिशा में रैनेटो पोगिओली तथा फ्रेडिरिक ऐंगेल्स के लेख विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं।

                यह तो स्पष्ट है कि अनुवाद की स्वयंसिद्ध अनिवार्यता एवं उपयोगिता ने अनुवाद के सैद्धांतिक पक्षों को व्याख्यायित करने के लिए एक पृष्ठभूमि का कार्य किया है। मनुष्य के अनुवाद को रचनात्मक कार्य तक सीमित न रखकर उसके क्षेत्र एवं परिधि को व्यापकता प्रदान कर दी है। वास्तविकता तो यह है कि बीसवीं शताब्दी में आरंभ हुई इस सृजनात्मक कला की मांग आज इतनी अधिक बढ़ गई है कि विभिन्न संस्थाओं ने अनुवाद-प्रशिक्षण देना भी आरंभ कर दिया है। प्रशिक्षण के समय अनुवाद-सिद्धांत से संबंधित सामग्री के अभाव को समय-समय पर भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपनी लेखनी के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया है। इन सैद्धांतिक पुस्तकों की शृंखला में डॉ. पूरनचन्द टण्डन ने ‘अनुवाद-बोध’ के संपादन द्वारा अनुवाद विषय को अधिकाधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास किया है। अनुवाद विषयक समस्त बिंदुओं को अपने भीतर समाहित करने वाली इस पुस्तक को अनुवाद सिद्धांत का एनसाइक्लोपीडिया कहना अनुचित न होगा। अनुवाद-सिद्धांत को अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत आदि विभिन्न भाषाओं के उदाहरण द्वारा समझाने का जो उद्योग इस पुस्तक में किया गया है, वह सहज ही अन्यत्र दृष्टिगत नहीं होता।

                अनुवाद का दायित्व मात्र किसी एक भाषा-विशेष की भावभूमि को विस्तार प्रदान करना नहीं होता, वरन् यह तो एक ऐसी कला है जिसके द्वारा राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं की ज्ञान-राशि अपने भीतर अन्य सभी भाषाओं की ज्ञान-संपदा को समाहित करके जन-समाज को विकसित करने एवं उनकी जीवन-शैली को उज्ज्वल बनाने में निमित्त कार्य करती आई है। अनुवाद जो आज सहस्रों मनुष्यों की जीविका का भी साधन बन गया है, उसके विषय में गूढ़ गुत्थियों को सुलझाना प्रत्येक भाषाविद् का सामाजिक दायित्व भी बन गया है। डॉ. टण्डन ने सहज एंव बोधगम्य शैली में अनुवाद-लोक के बाल एवं आंतरिक आयामों को इस पुस्तक में समेटकर एक ओर अपने सामाजिक दायित्व को पूर्ण किया है तथा दूसरी ओर, समाचार, मीडिया, कंप्यूटर जैसी नवीन प्रक्रिया में अनुवाद की भूमिका को रेखांकित करके जन-मानस के ज्ञान-चक्षुओं को नई दिशा भी प्रदान की है। पुस्तक के अंत में परिशिष्ट के अंतर्गत रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महादेवी वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, एडवर्ड फिट्जेराल्ड, थियोडोर सेवरी, जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, अलेक्सांद्र सकेविच जैसे विश्व-विख्यात व्यक्तियों के अनुवाद संबंधी विचारों को रखकर संपादक ने आज के युवावर्ग को अनुवाद की दिशा में प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। इस पुस्तक का आद्योपांत अध्ययन करने के उपरांत हम पाते हैं कि इसमें अनुवाद की प्रयोजनपरक सार्थकता को उसके समस्त सैद्धांतिक आयामों के द्वारा आलोकित किया गया है। यह पुस्तक निश्चित रूप से अनुवाद को समझने-समझाने का आधार-स्तंभ सिद्ध होगी।

डॉ. ममता सिंगला
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
भगिनी निवेदिता कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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