ब्रज भाषा साहित्य के अक्षय कोश में मानव जीवन से संबंधित विविध विषय वैभवशाली ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं। कहीं उसकी रसमयी कविता में  शृंगार, अनुराग, भक्ति, प्रेम, वात्सल्य आदि मानवीय भावों का अद्भुत विलास विद्यमान है, तो कहीं उसके लोकगीतों में प्रकृति के मनोरम दृश्य, पशु-पक्षियों की मधुर गूँज तथा भारतीय संस्कृति के पोषक तत्त्व अपने उत्कृष्ट रूप में अभिव्यंजित हुए हैं। इन सब विषयों के अतिरिक्त ब्रज भाषा साहित्य में एक ऐसा पक्ष भी उद्घाटित हुआ है, जो उसके रचनाकारों की युगीन परिवेश से संबंधित जानकारी को तो प्रकट करता ही है, साथ ही प्रकृति के नाना परिवर्तनों के पीछे छुपे हुए वैज्ञानिक रहस्यों के गंभीर ज्ञान को भी सूचित करता है। यह महत्वपूर्ण पक्ष है – पर्यावरण चेतना । मानव जीवन सदैव पर्यावरण से प्रभावित होता है। अतः जीवन के सुचारू रूप से संचलन के लिए यह अवश्य है कि उसे संतुलित पर्यावरण प्राप्त हो। वस्तुतः पर्यावरण से अभिप्राय है जलवायु या भूमि के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में उचित संतुलन। जब यह संतुलन किन्हीं अवांछनीय परिवर्तनों से प्रभावित होकर मानव-जीवन के लिए हानिकारक बन जाता है, तब विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ब्रज भाषा साहित्यकार केवल ईश्वरानुराग अथवा नायक नायिकाओं के मधुर प्रेम की क्रिडाओं को व्यक्त करने में ही अपने कवि-कर्म का निर्वाह पूर्ण नहीं कर रहा था, वरण वह पर्यावरण के प्रति भी अत्यन्त जागरूक था। सम्भवतः यही कारण है कि उसने अपनी रचनाओं में भौगोलिक वातावरण को प्रकृति चित्रण, ऋतु-वर्णन आदि के माध्यम से वाणी प्रदान की है।

          पर्यावरण को स्वच्छ रखने में पेड़-पौधों की विशेष भूमिका है। जिस प्रकार नदी मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तुओं को अपना सदृश जल प्रदान करके उनके जीवन की रक्षा करती है, उसी प्रकार पेड़-पौधे भी कार्बन डाइऑक्साइड को उदरस्थ करके तथा ऑक्सीजन प्रदान करके सृष्टि पर जीवन को बनाए रखने अपना सहयोग देते हैं। ब्रज भाषा साहित्य में पेड़-पौधों का वर्णन विशेष मनोयोग के साथ किया गया है। बसंत ऋतु के आगमन पर लताओं के फूलने, डालियों के झूलने, फलों के भार से वृक्षों के झुक जाने तथा गुलाब, चमेली आदि पुष्पों के खिल जाने के वर्णन में कवियों ने जिस सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया है उससे यही ज्ञात होता है कि वे वातावरण को स्वस्थ बनाए रखने के विशेष पक्षधर थे। उन्होंने स्पष्ट लिखा है –

          ‘‘फूलि उठीं लतिका लबंगन की लौनी,

                     झूलि उठीं डालियाँ कदंब सुख पावने।

          चटकि गुलाब उठे, लटकि सरोज पुंज,

                     खटकि मराल रितुराज सुनि आवने।।’’

          आज के तथाकथित आधुनिक वातावरण में सिगरेट तथा यातायात के नव-निर्मित साधनों से फैलते हुए दमघोटु धुएँ तथा कारखानों की चिमनियों से निकलती विषैली गैसों से जहाँ वायु-प्रदूषण की भीषण समस्या उत्पन्न हो गई है, वहाँ ब्रजभाषा साहित्य के ये स्वस्थ चित्र प्रदूषण नियंत्रण का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करके मानव चेतना को पर्यावरण के प्रति जागृत करने का प्रयास करते हुए प्रतीत होते हैं। पेड़-पौधे जब पुष्पों-फलों से लदकर सुगंधित वायु से वातावरण को पवित्र कर देते हैं तब पर्यावरण स्वयं ही शुद्ध हो जाता है। मादक महकती बसंती बयार में, हरे-भर पौधे की मधुर, बहार में, फूलों के पराग में, फूलों की मनोहारी सुगंध में पर्यावरण के दोषों के प्रक्षालन की शक्ति विद्यमान है। रीतिकाल के रससिद्ध कवि बिहारी में इसी बासंतिक शोभा का वर्णन करते हुए लिखा है –

          ‘‘छुकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध।

                     ठौर-ठौर झूमत झपत, झौर-झौर मधु अंध।।’’

          स्वस्थ पर्यावरण में पशु-पक्षियों के कलरव का विशेष महत्व है। भारत की महानगरीय व्यवस्था में ध्वनि-प्रदूपण एक आम समस्या बन गई है। कल-कल करती हुई मशीनों का शोर, इधर से उधर भागती गाड़ियों के कर्ण-भेदी स्वर, लाउडस्पीकर की तेज आवाज निरन्तर पर्यावरण को प्रदूषित कर रही हैं। ऐसी विनाशकारी स्थिति में कोयल की मधुर कूक, चिड़िया की चहचहाट, गऊओं के गले में लटकी हुई घण्टियाँ, चातक की चकित पुकार अनायास ही श्रोता को मंत्र-मुग्ध कर देती है। ब्रज लोकगीतों में पशु-पक्षियों की इस मधुर ध्वनि के साथ उनकी प्रत्येक गतिविधि और आचरण का भी मार्मिक अंकन हुआ है। गायों का चराना, मोरों का नाचना, कोयल का कूकना, शुक-पिक का बतियाना ब्रज भाषा साहित्य का अभिन्न अंग बन गया है। दिनभर की भाग-दौड़ के पश्चात् यदि ब्रजभाषा के इन गीतों का आनन्द लिया जाए तो सारी थकान स्वयं ही परिश्रान्त हो जाती है। वस्तुतः ब्रजभाषा कवियों ने पशु-पक्षियों के कलरव का चित्रण उद्दीपन रूप में अधिक किया है, किन्तु यहाँ पर भी ये स्वर पर्यावरण के पोषक बनकर ही अधिक प्रकट हुए हैं। पिक भृंग की गूँज, कोकिल-चकोर-मोर के आनन्ददायक स्वर निश्चित रूप से ध्वनि-प्रदूषण का परिहार करने में सहायक हैं। पंछियों की किलोल को वाणी देते हुए कहा गया है –

          ‘‘कुंजन किलोल सों लगे हैं कुल पंछिन के,

                     पूरन समीरन सुगंध कौ पसारों है।

                     ग                 ग                 ग      

          सुमन-निकुंजन में, कुंजन के पुंजन में,

                     गुंजत मलिंदन कौ वृंद मतवारौ है।’’

इसी प्रकार अन्यत्र भी कहा गया है –

          ‘‘कूँकि उठीं कोकिलान, गूँजि उठी भौंर-भीर,

                     डोलि उठे सौरभ समीर सरसावने।

          चँहकि चकेर उठे, कीर कर सोर उठे,

                     टेर उठीं सारिका बिनोद उपजावने।।’’1

          प्रकृति के प्रत्येक व्यापार का अनुकूल एवं प्रतिकूल प्रभाव प्राणी मात्र पर पड़ना स्वाभाविक है। सर्वाधिक चेतन एवं संवेदनशील प्राणी होने के कारण मानव-जीवन पर प्रकृति की गतिविधि का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। ऋतुओं में परिवर्तन प्रकृति का एक निश्चित नियम है। यदि केवल एक ऋतु सदैव विद्यमान रहे तो यह निश्चिम है कि पर्यावरण का रूप विशृखलित हो जाएगा।2 मनुष्य का जीवन पूर्णतः अस्त-व्यस्त हो जाएगा, पुष्पों की मुस्कान रूक जाएगी, पक्षियों का चहचहाना बन्द हो आएगा, वर्षा की मधुर फुहार लुप्त हो जाएगी, नदियों का जल सूख जाएगा, कोमल कोपलों का जन्म ही नहीं होगा, शीतल-मंद-सुगंध बयार एक बन्द गुफा में कैद हो जाएगी। अतः पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने के लिए ऋतु-परिवर्तन होना आवश्यक है। ब्रज भाषा साहित्य में बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हमर हेमंत, शिशिर छः ऋतुओं का मनोहारी वर्णन हुआ है। कवियों ने बसंत ऋतु के आगमन का वर्णन करते हुए लिखा है –

          ‘‘औरें भाँति कोकिल-चकोर ठौर ठौर बोलें,

                     औरें भाँति सबद पपीहन के बै गए।

          औरें भाँति पल्लव लिए हैं वृंद-वृंद तरु,

                     औरें छवि-पुंज कुंज-कुंजन उनै गए।

          औरें भाँति सीतल सुगंध-मंद डोलै दौन,

                     द्विजदेव देखत न ऐसे पल द्वै गए।

          औरें रति, औरें रंग, औरें साज, औरें संग,

                     औरें बन, औरें छन, औरें मन ह्नै गए।।’’3

          इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में भी ब्रजभाषा कवियों के काव्य-कौशल को देखा जा सकता है।4 इस ऋतु में प्रकृति अपना मनोहर रूप छोड़कर रौद्र रूप धारण करती है और अपनी विकरालता से अखिल ब्रह्माण्ड के चराचर को व्याकुल कर देती है। सूर्य की तप्त किरणों से संतप्त होने के पश्चात् वर्षा-ऋतु का आगमन मानव-जाति के लिए वरदान सिद्ध होता है। नभ-मण्डल में मेघ मालाएँ छा जाती हैं। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमचमाहट से ऐसा मालूम होता है कि आकाश-रूपी रंगभूमि में नगाड़ों की ताल पर कोई चंचला नर्तकी नृत्य कर रही है। वर्षा की फुहार से धरती की शोभा अद्भुत हो जाती है। ग्रीष्म के प्रभाव से सूखी हुई सरिताओं में पुनः जल का संचार हो जाता है। इस प्रकार वर्षा ऋतु पर्यावरण को संतुलित करके मानव जीवन को रस सिक्त कर देती है। इन्हीं भावों को ब्रज भाषा के कवियों ने शब्दों का परिधान प्रदान करके ऋतु संबंधी अपने सूक्ष्म ज्ञान का परिचय दिया है। वे कहते हैं –

          ‘‘दमकि दिमाक तें दुरित दुति दामिनी की,

                     मुदित मयूर मन मौन बरगै लगे।

          घरी-घरी घेरि-घेरि घुमड़ घमंड भरे,

                     घाघ से घनेरे घन घोर गरजै लगे।।’’

          वर्षा-ऋतु निःसंदेह अत्यंत सुहावनी ऋतु है, किन्तु दिन-रात की झड़ी के फलस्वरूप बाढ़, कीचड़ तथा बिमारियों का साम्राज्य बढ़ जाता है। ऐसे में शरद ऋतु पर्यावरण में संतुलन स्थापित करती है। घनघोर वर्षा के कारण स्थान-स्थान पर एकत्रित कीचड़ और पानी शरद के आगमन होते ही सूखने लगता है। मेघाच्छादित आकाश निर्मल हो जाता है। ब्रजभाषा कवियों ने शरद ऋतु के मोहक प्रभाव के अतिरिक्त उसके प्रकाशमान चन्द्र और उसकी उज्ज्वल चन्द्रिका का विशेष रूप से वर्णन किया है। वे कहते हैं –

          ‘‘छिती पर देखो महा सौरभ सस्स सुभ,

                     सौरभ सरस पर, सुरस सरद की।

          रस पर कहै स्यामसुंदर झलक छवि,

                     छवि पर मारुत, जो जलद सरद की।

          मारुत पै राजत गगन, सु गगन पर,

                     चाँदनी बिराजत, त्यो सारद सरद की।

          चाँदनी पै चंद की मुसाहिबी दुचंदफबी,

                     चंद की मुसाहिबी पै, साहिबी सरद की।’’

          हेमन्त एवं शिशिर ऋतुओं का वर्णन भी ब्रजभाषा साहित्य में विस्तार से मिलता है।5 ये दोनों ऋतुएँ शीत प्रधान हैं। तुषार के आधिक्य एवं शीत की कठोरता के कारण इन ऋतुओं में प्रकृति देवी की मनोरम छटा उजड़ने लगती है, बगीचों के खिले हुए पुष्प एवं पत्ते सूख कर झड़ने लगते हैं। पल्लवहीन वृक्ष भयावना दृश्य प्रस्तुत करने लगते हैं। इसके बाद पुनः बसन्त ऋतु का आगमन होता है और पर्यावरण पुनः संतुलित हो जाता है। स्पष्ट है कि ऋतु-परिवर्तन का पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। ब्रजभाषा कवियों ने समस्त ऋतुओं के प्रभाव एवं विलास का चित्रण करके अपनी पर्यावरण चेतना का ही परिचय दिया है। पर्यावरण हमारा रक्षा कवच है, जो हमें प्रकृति से विरासत के रूप में प्राप्त हुआ है। यह न केवल मानव-जाति का वरन् सम्पूर्ण प्राणि-जगत का जीवनाधार है, इसलिए इसकी रक्षा का दायित्व भी हम सबका है और चूँकि कवि का मुख्य उद्देश्य समाज को सही दिशा प्रदान करके उसमें नवीन चेतना को जागृत करना होता है, अतः उसका दायित्व इस क्षेत्र में कुछ अधिक हो जाता है। ब्रज भाषा के कवियों ने अपने इस दायित्व को भली-भाँति समझकर जन-समाज में पर्यावरण-चेतना को जागृत करने का सफल प्रयास किया है।

 

संदर्भ – 

  1. द्विजदेव की रचनाएँ, पृ. 13.
  2. कवि प्रिया-केशव, छंद संख्या-28.
  3. मान मयंक, छंद संख्या-153.
  4. यमुना लहरी, छंद संख्या-98,
  5. यमुना लहरी, छंद संख्या-100.
डॉ. ममता सिंगला
एसोसिएट प्रोफेसर
भगिनी निवेदिता कॉलेज

 

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