शताब्दियों से नृशंस एवं क्रूर शासकों के अमानुषिक अत्याचारों से पीडित भारतीय जनमानस से आत्मिक बल तथा दुर्दमनीय शौर्य का संचार करने तथा उनके भग्नहृदयों का विस्मृत प्रायः प्राचीन एवं गौरवशाली आध्यात्मिक तथा धार्मिक भावना से पुनः साक्षात्कार कराने के लिए इतिहास प्रसिद्ध पाटलिपुत्र नगरी में एक युगपुरुष का अवतरण हुआ, जो अपनी चारित्रिक विशेषताओं और प्रतिभा के कारण सिक्खों के दशम गुरु के रूप में विख्यात हुए। गुरु गोविंद सिंह का जीवन एक संत पुरुष की भांति पूर्णतया धार्मिक भावना से युक्त था। लौकिक संघर्षों से जूझते रहने के बावजूद भी उनकी ईश्वर की शक्ति पर दृढ़ आस्था थी। लौकिक संघर्षों से जुझते रहने के बावजूद भी इनकी ईश्वर की शक्ति पर दृढ़ आस्था थी। लौकिक संघर्षों से जूझते रहने के बावजूद भी इनकी ईश्वर की शक्ति पर दृढ़ आस्था थी। प्रायः एक सच्चे निष्ठावान आस्तिक का चिरकाल से यही विश्वास रहा है कि इस सृष्टि का संचालन करने वाला एक परम पुरुष है, उसकी इच्छा के अनुरूप ही सभी देवी-देवता अपने कार्यों को पूर्ण करते हैं, उसकी प्रेरणा पाकर ही ब्रह्मा जीवों की सृष्टि करते हैं, विष्णु उनका पालन करते हैं तथा शिव उनका संहार करते हैं, जड़ तथा चेतना सभी पदार्थों में उसी का विलास प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहता है, सामान्य मनुष्यों एवं जीवों से लेकर देवता भी उसी के संकेत से सुख-दुःख का भोग करते हैं। इस सृष्टि का प्रत्येक कण उसी के प्रकाश से प्रकाशित होता है, उसके भीतर किसी अन्य का प्रकाश नहीं है, वह स्वयं प्रकाशमय है, सत् चित्त एवं आनंद से युक्त होने के कारण वह सच्चिदानंद है तथा विकट से विकट परिस्थिति में भी वह अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए तत्पर रहता है। गुरु गोविंद सिंह का लालन-पालन हिन्दू संस्कृति के स्वच्छ वातावरण में हुआ था। अतः उपर्युक्त सभी मान्यताएं उनके मन-मस्तिष्क में बचपन से ही घर कर चुकी थीं, तथा दूसरी ओर सिक्ख गुरु परम्परा की भक्ति संबंधी मान्यताएं उन्हें विरासत के रूप में प्राप्त हुई थीं, जिसके फलस्वरूप उनका जीवन स्वतः ही धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्हें विरासत का पुंज बन गया।

                हिंदी साहित्य समय-समय पर अनेक संत-कवियों की निर्मल वाणी से गौरवान्वित होता रहा है। संतों, विचारकों एवं विद्वज्जनों ने भारतीय चिंतन धारा अलौकिक पक्ष के साथ लौकिक पक्ष की कभी आलोचना नहीं की। वे जीवन कर्म में संलग्न रहते हुए ईश्वर-शक्ति में तल्लीन रहना अधिक श्रेयस्कर समझते थ। कबीर, दादू, गुरु नानक आदि सभी विचारकों ने लोकपक्ष को भारतीय दर्शन का अभिन्न अंग स्वीकार किया है। वे कीचड़ में रहते हुए भी कमल की भांति जीवनयापन करने की अमर शिक्षा प्रदान करते थे। इन संत कवियों की कथनी और करनी में एकरूपता विद्यमान थी। कबीर जुलाहे का कार्य करते हुए भी प्रत्येक क्षण ब्रह्म साक्षात्कार का आनंद लेते रहते थे। एक ओर गृहस्थ जीवन का पालन करना उनका धर्म था तो दूसरी ओर अजपाजाप में निरत रहना उनके जीवन का लक्ष्य था। इसी प्रकार अन्य सभी संत पुरुषों ने भी सांसारिक मनुष्यों एवं उलझनों के बीच रहते हुए भी मनुष्य जीवन का आदर्श प्रस्तुत कर शुद्ध व्यावहारिक धर्म को ग्रहण करने पर बल दिया। इन लोगों ने जाति एवं सम्प्रदाय के संबंध में लम्बी-लम्बी चर्चाएँ करने के स्थान पर व्यक्ति के चारित्रिक गुणों पर विशेष बल दिया। इनका विश्वास था कि संसार के सभी मतों का मूलभूत एक ही परमतत्व है, जिसकी सत्ता को झुठलाया नहीं जा सकता। धार्मिक ग्रंथों में व्यक्त विभिन्न व्याख्याएं मनुष्य को मनुष्य के समीप लाने की प्रेरणा प्रदान करती हैं, किंतु मनुष्य इनके वास्तविक अर्थ को समझे बिना ही सिद्धांतवाद एवं आदर्शवाद के मिथ्या जालों में उलझ कर ईश्वर से और अधिक दूर चले जाते हैं। अपनी स्वार्थ-पूर्ति एवं समाज में अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वह बाह्य-आडम्बरों में अपने आप को लिप्त कर माया-मोह के बंधनों में आबद्ध हो जाता है। इसीलिए संत-पुरुषों ने इन सब पाखण्डों का विरोध कर हृदय से ईश्वर शक्ति में अनुरक्त रहने का आग्रह किया।

                गुरु नानक ने ईश्वर संबंधी विचारों के आधार पर जिस पंथ की स्थापना की थी, गुरु गोविंद सिंह ने उसे ही अंतिम रूप देते हुए अपनी धार्मिक भावना को व्यक्त किया। परशुराम चतुर्वेदी सभी सिक्ख गुरुओं को गुरु नानक से अभिन्न मानते हुए कहते हैं, ‘सिक्ख गुरुओं के संबंध में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि गुरु नानक देव की गद्दी पर बैठने वाले किसी भी गुरु ने अपने को उनसे भिन्न नहीं माना। इसी कारण गुरु नानक देव के पीछे आने वाले शेष नौ गुरु एक ही दीपक से जलाये गये। अन्य नव दीपकों की भांति अपने आदि गुरु के पूर्ण प्रतिरूप समझे जा सकते हैं और उनके संग्रहित व सुरक्षित सद्वचन रूपी मणियों की माला में भी इसी भांति उस एक ही भावना का सूत्र निस्यूत माना जायेगा जिससे कभी गुरु नानक देव ने पहले पहल प्रेरणा प्राप्त की थी। निःसंदेह गुरु गोविंद सिंह ने भी गुरु नानक देव द्वारा प्रस्तुत मान्यताओं को ही अपने जीवन की प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया था। किंतु उन्होंने युगीन परिस्थितियों एवं समय की मांग को समझकर भक्ति की चली आ रही परंपरा में शक्ति का भी समावेश कर दिया। उन्होंने ईश्वर के नाम स्मरण के साथ अत्याचारियों तथा अन्यायियों को दमित करना भी अपना धर्म समझा।

                गुरु गोविंद सिंह को आरंभ से ही विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। नौ वर्ष की अल्पायु में गुरु पदवी पर आसीन होते ही आंतरिक एवं बाह्य कठिनाइयों ने उन्हें चारों ओर से आच्छादित कर दिया था, परंतु उनका मन नैराश्य के सागर में कभी नहीं डूबा। कायिक दृष्टि से तो वे लौह-पुरुष थे ही, साथ ही धैर्य-धारण करने की असीम मनस्विता उन्हें प्रकृति से वरदान रूप में प्राप्त हुई थी। प्रभु की इच्छा एवं आज्ञा समझकर वह भक्त-पुरुष एक के बाद एक समस्या का समाधान कर निरंतर अग्रसर होता रहा। इतिहास प्रसिद्ध शक्तिशाली एवं बर्बर मुगल साम्राज्य को नष्ट करने का दृढ़ संकल्प ले वे अपनी कर्म-भूमि में प्रविष्ट हुए। यद्यपि वे किसी जातिविशेष के पक्षपाती नहीं थे, उनकी दृष्टि में मनुष्य की केवल एक ही जाति थी-मानव जाति। इसी के चतुर्दिक विकास के लिए उन्होंने मुगल साम्राज्य से टक्कर ली। अगर उस समय अत्याचार या अन्याय हिंदुओं के द्वारा किया जा रहा होता तो वे निश्चित ही हिंदुओं का विरोध करते। मुगलों की असंख्य वाहिनी का सामना करना सोते शेर को जगाने के समान था। किंतु गुरु गोविंद सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मुट्ठी भर सिक्ख सैनिकों को शस्त्र और शास्त्र की दिशा देकर मुगलों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अपने इस संकल्प को अंतिम रूप देने के लिए उन्होंने अपने चारों पुत्रों के बलिदान पर भी जरा-सी ‘उफ’ नहीं की। वस्तुतः वे एक सच्चे संत पुरुष थे। उन्हांेने धर्म के दोनों पहलुओं निश्रेयस और अभ्युदय को समान महत्व देते हुए दोनों की सिद्धि पर बल दिया। एक ओर तलवार की शक्ति के बल पर वे शत्रुओं का विनाश कर अपने लौकिक धर्म का निर्वाह करते हैं तथा दूसरी ओर अपनी काव्य-रचनाओं के माध्यम से धर्म एवं अध्यात्म के वास्तविक रूप की चर्चा कर धार्मिक नेता के उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक पूर्ण करते हैं। वे ‘धर्म’ को सामाजिक न्याय के रूप में देखते थे, संभवतः इसीलिए वे अपने धर्म का उल्लेख करते हुए कहते हैं –

                हम इह काज जगत मो आए। धरम हेत गुरुदेव पठाए।

                जहां तहां तुम धरम बियारौ। दृष्ट दोखियत पकरि पछारो।।

(विचित्र नाटक)

                गुरु गोविंद सिंह की समस्त काव्य-रचनाएं ‘दशम’ ग्रंथ में संग्रहित हैं। इनका अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि गुरु साहब अपने सभी कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हुए आगे बढ़े थे। ईश्वर के विविध रूपों का शौर्य एवं भक्ति पूर्ण गान करके ही उन्होंने अपने अनुयायियों में अदम्य साहस का संचार किया, जिसके फलस्वरूप उनकी छोटी सी-टुकड़ी शक्तिशाली मुगल साम्राज्य का मानमर्दन करने के लिए तत्पर की गई। गुरु गोविंद सिंह इस रहस्य को भली-भांति समझ गए थे कि यदि हिंदुओं को जागृत करना है तो उनके समक्ष उन देवी-देवताओं के पराक्रम का वर्णन करना आवश्यक है, जिनकी उपासना वे अपने ईष्ट-देव के रूप में चिरकाल से करते आए हैं। इसीलिए उन्होंने एक ओर शक्ति की प्रतीक चंडी-देवी की अमर गाथा का यशस्वी वर्णन किया तो दूसरी ओर विष्णु के चैबीस अवतारों की वीर गाथाओं का उल्लेख कर सुप्तावस्था में पड़ी हिंदु जाति को उनकी शक्ति से अवगत कराया। लेकिन इन वर्णनों को देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि गोविंद सिंह सिक्ख धर्म की भक्ति परंपरा के विपरीत सगुण ब्रह्म के उपासक थे। वे कृष्ण, राम आदि अवतारों की गाथाओं का वर्णन करते हुए यह भी सिद्ध कर देते हैं कि काल पुरुष के समक्ष इन अवतारों को भी झुकना पड़ता है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी अंत में काल-पुरुष की शरण में चले जाते हैं –

                काल सभन का करता पसारा। अंत काल सोई खापनहारा।।

                आपन रूप अनंतन धरही। आपहि मध लीनपुन करही।।

(चौबीस अवतार)

                इसी तथ्य को प्रकाशित करते हुए वे आगे कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी बेचारे तुम्हारा रहस्य जानने की प्रक्रिया में थक चुके हैं। चांद और सूर्य भी तुम्हारा ही विचार करते हैं और इसीलिए तुमको इन सबका कर्ता जाना जाता है –

                ब्रह्मादिक सभ ही पचहारे। बिशन महेश्वर कउन बिचारे।

                चंद सूर जिन करे बिचारा। ता ते जनियत है करतारा।।

                गुरु गोविंद सिंह के परब्रह्म विषयक भावों को समझने के लिए उनकी मूल्यवान एवं प्रामाणिक कृति ‘जापु’ को देखा जा सकता है। सिक्ख-सम्प्रदाय में गुरु नानक देव प्रणीत ‘जपु साहिब’ के पश्चात् ‘जापु’ ही एकमात्र ऐसी रचना है जिसका पाठ प्रतिदिन सिक्ख अनुयायियों द्वारा किया जाता है। इसके प्रवचन के अनंतर ही व्यक्ति सिक्ख धर्म में दीक्षित हुआ माना जाता है। इस महत्वपूर्ण रचना को ‘दशम-ग्रंथ’ में वही स्थान है जो स्थान ‘आदि ग्रंथ’ में ‘जपु साहिब’ का है। ‘जापु’ वास्तव में एक स्रोत है जिससे वेदों में वर्णित ब्रह्म के ‘नेति’ स्वरूप का अनुकरण करते हुए ब्रह्म के निर्गुण को वर्णित करने का प्रयत्न किया गया है –

                चक्र चिह्न अरु बरन जाति अरु पाति नहिन जिह।

                रूप रंग अरु रेख भेरव कोऊ कहि न सकति किह।

                अचल मूरति अनुभव प्रकाश अमितोज कहिज्जै।

                कोटि इंद्र इंद्राणि साहि साहिणी गणिज्जै।

                त्रिभवण महीप सुर नर असुर नेति नेति बन त्रिण कहत।

                तब सरब नाम कत्थै कवन करम नाम बरनत सुमति।। (जापु)

                गुरु नानक ने अपनी कृति ‘जापु साहिब’ में स्पष्ट कहा है कि उनका ओंकार निष्क्रिय या मात्र कोरा पारमार्थिक सत्य नहीं है, वह सब कुछ करने में समर्थ है। न वह संसार में पृथक है और न ही सृष्टि की कोई वस्तु उससे बिलग है। प्रत्येक वस्तु उसी करता पुरुष के भीतर समाहित है, उसकी आज्ञा के बिना कुछ नहीं हो सकता। जो व्यक्ति अहंकार को नष्ट कर ईश्वर-आज्ञा को सर्वोपरि समझ लेता है, उसके हृदय से निकृष्ट भाव स्वतः ही तिरोहित हो जाते हैं। गुरु गोविंद सिंह ने भी परब्रह्म की इन्हीं विशेषताओं का विस्तृत वर्णन किया है। हे सर्वमान्य समस्त गुणों के भंडार, देवों के भी देव, रहस्यों और वेशों से भी परे प्रभु, तुम्हें प्रणाम है। तुम काल के भी काल हो, सब जीवों के पालनकर्ता हो। सर्वव्यापक एवं समस्त भुवनों में गमन कर सकने वाले प्रभु, तुम्हें मेरा प्रणाम है। हे निराकार, स्वयं स्वामी, तेरी बराबरी वाला कोई नहीं है। तू सर्वसंहारक है, तुम्हें मेरा प्रणाम है। गुरु साहब ने निर्गुण ब्रह्म को ‘अकाल’ की उपाधि से विभूषित कर नानक-चिंतन रीति की पुनःस्थापना की है। गुरु नानक के मूलमंत्र में प्रयुक्त ‘एक ओं’ अकाल-मूरति का पर्याय है। उससे जिस भावराशि का बोध होता है, गुरु गोविंद सिंह ने भी उसे ही अपना ध्येय बनाकर अभिप्रेत धारणाओं को व्यक्त किया है। यह नाम मात्र ‘जापु’ में ही प्रयुक्त नहीं हुआ वरन् अकाल स्तुति चंडी-चरित्र, ज्ञान-प्रबोध तथा जफरनामा में भी निर्गुण ब्रह्म को अकाल शब्द से अभिहित किया गया है।

                जापु के प्रतिपाद्य देव की विशिष्टता यह है कि वह निर्गुण, निराकार अखंड, अज्ञेय होते हुए भी मनुष्य को सांसारिक विभीषिकाओं और जागतिक चिंताओं से मुक्त करने में समर्थ है। गुरु साहब ने उसकी सत्ता को अनिवर्चनीय कहते हुए भी उसकी सुखद सत्ता एवं शक्ति को नकारा नहीं है। युग की विषम परिस्थितियों एवं मनुष्य की नैतिक दुर्बलताओं का परिहार करने के लिए उन्होंने ऐसे ब्रह्म की उपासना का संदेश दिया है। जिसकी शरण में जाकर मानव का निराशा के अंधकार में डूबा मन धैर्य धारण कर संतप्त हो जाता है। साथ ही उन्होंने ऐसे अकाल पुरुष को भी प्रणाम किया है जो शस्त्रधारी है, अस्त्रों का स्वामी है, रौद्र स्वरूप है तथा जिसके कर्म क्रूर हैं –

नमो जूद्ध जुद्धे नमो ज्ञान ज्ञाने। नमो भोजे भोजे नमो पान पाने।

नमो कलह करता नमो शांत रूपे। नमो इंद्र इंद्रे अनादं बिभूते।। (जापु)

                विभिन्न स्थलों पर परब्रह्म को सखकाल, छत्रछटी, सत्र प्रणासी, असिपान, असिधारी, असिधुज, असिकेतु खड्गकेतु, सस्त्रपाने जस्त्रपाने अस्त्रपाने, सखलोभ आदि नामों से संबोधित करने के पीछे भी उनके रौद्र रूप को व्याख्यायित करने का उद्देश्य दृष्टिगत होता है। गुरु गोविंद सिंह का समय राजनैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से घोर अशांति का युग था। विदेशी एवं विधर्मी शासकों के अमानुषिक अत्याचार दिन-प्रतिदिन असह्य होते जा रहे थे। ऐसे समय में गुरु साहब ने विभिन्न अस्त्रों की स्तुति भी ईश्वर के रूप में की थी। अपनी आत्मकथा ‘विचित्र नाटक’ में तेग की उपासना करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘शत्रुओं के दल के टुकड़े-टुकड़े करके भीषण युद्ध करने वाले अखण्ड और प्रचण्ड तेज, भानु के सदृश प्रकाशमान, संतों के सुखदायक, कुमति के विनाशक, पापों के विदारक, जग के कारण, सृष्टिकर्ता मेरे पालक तेज तुम्हारी जय हो।’’ शस्त्रनाममाला में अस्त्र शस्त्रों को परमेश्वर की पर्याय-नामावली में गिनाते हुए स्तुति-परक छंदों की रचना की गई है –

                तीर तुही सैयी तुही तुही तबर तरवार।

                नाम तिहारो जो जपै भवै सिन्धु भयपार।

                काल तुही काली तुही तेग अस तीर।

                तुही निसानी जीत की आजु तुही जगवीर।। (शस्त्रनाममाला)

                गुरु गोविंद सिंह का अकाल पुरुष शक्ति सम्पन्न होते हुए भी क्षमाशील है, सुर असुरों का वध करने में समर्थ होते हुए भी दयावान है। यही उसका विरोधी धर्म है और यही उसकी विशिष्टता है। दशम ग्रंथ की अनेक कृतियों में करुणा सागर परम पुरुष की भी अनेक झलकियाँ अपने पूर्ण वैभव के साथ दिखाई देती हैं। कहीं उसे रहीम, कहीं करीम, कहीं सब दयाले, कहीं सरब पाले, कहीं दानियों का भी दानी है और कहीं सरब दाता कहकर उसकी स्तुति की गई है। जापु में उसके करुणामय रूप को उजागर करते हुए वे लिखते हैं –

                कि साहिब दिमाग है। कि हुसनुल चराग है।

                कि कामल करीमत हैं। कि राजक रहीम हैं।

                कि रोज़ी दहिंद है। कि राज़क रहिंद हैं।

                करीमुल कमाल हैं। कि हुसनुल जमाल हैं।’’ (जापु)

                मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपने आसपास उस प्रभु को देखना चाहता है, जो प्रत्येक परिस्थिति में उसकी सहायता करे, हृदय से एक बार पुकारने पर ही वह सहायतार्थ पहुंच जाए, विषम से विषम समस्या का समाधान ढूँढने एवं प्रगति की ओर बढ़ने में वह उसकी प्रेरणा बने। जन साधारण की इसी आस्था की दृष्टि में रखकर गुरु गोविंद सिंह ने ऐसे ईश्वर की वंदना की है, जो सर्वव्यापक है। विश्व में संतों की रक्षा करने तथा अधर्म का नाश करने के लिए वह अवतारी रूप धारण करता है, राम और कृष्ण के रूप में आसुरी शक्तियों का विनाश करता है तथा भक्त को उसकी इच्छा के अनुरूप वरदान प्रदान करता है। किंतु जिस प्रकार एक बाजीगर तमाशा दिखाकर अपने चमत्कारों को समाप्त कर देता है उसी प्रकार अकाल पुरुष भी सृष्टि की रचना करके स्वयं उसे अपने में समाहित करके पुनः एक हो जाता है। भगवद्गीता में 11वें अध्याय में ईश्वर के विराट स्वरूप का जिस प्रकार दिग्दर्शन कराया गया है, गुरु गोविंद सिंह ने भी इसी प्रकार परब्रह्म के रूप में झांकी प्रस्तुत की है –

                आदि रूप अनादि मूरत अजोनि पुरख अपार।

                सर व मान त्रिमान देव अभेद आदि उदार।।’’ (जापु)

                इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि गुरु साहब की परब्रह्म विषयक धारणा संत परंपरा के अनुरूप हैं। जिस प्रकार कबीर के राम बिना पैरेां के सर्वत्र चलते रहते हैं, बिना हाथों के सृष्टि की रचना कर देते हैं, उसी प्रकार गोविंद का कालपुरुष भी निराकार होते हुए सर्वशक्ति सम्पन्न है। उनका ब्रह्म अनुभूति का विषय है, अतः उसके लिए उन्होंने वैधी भक्ति के समस्त विधि-विधानों-तिलक, माला, मूर्तिपूजा, आसन आदि की निस्सारता स्थान-स्थान पर व्यक्त की है। उनका मत था कि इस प्रकार के प्रयत्नों से जीव इन्द्रिय निग्रह करने की अपेक्षा परम तत्व से और अधिक दूर चला जाता है। ब्रह्म तो सर्वत्र व्याप्त है, अतः उसकी प्राप्ति के लिए किसी बाह्य साधन की आवश्यकता नहीं होती, विशुद्ध हृदय से प्रभु का स्मरण करने मात्र से ही भक्त ब्रह्मानंद का आस्वादन करने लगता है। वैधी भक्ति का स्पष्ट विरोध करते हुए वे कहते हैं –

जो जुग तै करिहै तपसा, कछु तोहि प्रसन्न न पाहन कै हैं।

हाथ उठाइ भलि विधि सो जड़, तोहि कछु वरदान न दे हैं।

कउन भरोस भयो इह को कहु, भीर पैर नहिं आनि बचेहै।

जानु रे जान अजानु हठी, इह फोकट धर्म सु भर्म गवै है। (सवैये)

                बाह्य प्रदर्शन अपने आप को धोखा देने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। परमात्मा की प्राप्ति निश्छल तथा निःस्वार्थ प्रेम के द्वारा ही संभव है। आँख मूंदकर, केश बढ़ाकर, लिंग गले में लटकाकर, गंगा स्नान आदि औपचारिकताओं का निर्वाह करने से विशुद्ध भक्ति भाव उत्पन्न नहीं होता और भाव उत्पन्न हुए बिना ईश्वर से साक्षात्कार संभव नहीं है। इस प्रकार के पाखंड मनुष्य को विषय वासनाओं में उलझा कर दम्भी बना देते हैं। दम्भी व्यक्ति ब्रह्म उपासना में हृदय से तल्लीन नहीं हो सकता। शारीरिक कष्टमयी साधना करने से मानव-हृदय भ्रमित हो इधर-उधर भटकता रहता है। भक्त को भगवान को ढूंढने की आवश्यकता नहीं होती, वह तो सदैव उसके निर्मल हृदय में वास करता है –

                कहां भयो दोऊ लोचन मूंंद के बैठि रह्यो बक ध्यान लगायो।

                न्हात फिरयो लिए सातसमुद्रन लोक गयो परलोक गंवायो।।

                बास कियो बिखियान सो बैठ के ऐसे ही सु बेस बितायो।

                सांच कहो सुन लेहु सबै जिन प्रेम कियो तिनहीं प्रभु पायो।।

(अकाल-स्तुति)

                ब्रह्म उपासना के मिथ्या साधनों की निरर्थकता सिद्ध करते हुए गुरु गोविंद सिंह लिखते हैं कि उल्लू और गिद्ध शमशान में रहते हैं, मृग उदासीनों की तरह वन में घूमा करते हैं, पेड सदा मौन-साधना में लीन चुपचाप खड़े रहते हैं, बिन्दु की साधना करने वाले नपुंसक कई हैं और नंगे पांव घूमने वाले बंदर संख्या में अनेक हैं। अंगो को वश में करने पर, परंतु काम-क्रोध को मन में धारण किए रहने पर अज्ञानी मनुष्य भवसागर को कैसे पार कर सकते हैं। भूत सदा वनों में निवास करते हैं, धरती के जीवों के बच्चे माँ के दूध द्वारा पोषित होते हैं और सांप केवल पवन का आहार करते हैं। तृण खाने वाले और लोभ को त्यागने वाले जीव भी हैं और गौ-पुत्र वृक्षों को ही भाई-बहिन मानते हैं। पक्षी नभ में उड़ने वाले हैं तथा बगुला, बिलाव आदि ध्यान लगाने में सिद्धहस्त हैं। जो जितना बड़ा ज्ञानी है उसने जितना जाना उसका वर्णन कर दिया, परंतु इन सब प्रपंचों से भी मन का निग्रह नहीं होता। संसारी अज्ञानी जीवन परमात्मा के गूढ़ रहस्य को समझे बिना ही रूढ़ियों का पालन करने में ही धर्म मानते हैं और उसकी पूजा नहीं करते जो परमात्मा सबका रक्षक है। वह परमात्मा विश्व का पालक, जगत का काल, दीनों का बंधु, शत्रुओं का नाश करने वाला युग-जाल से रहित है। योगी, जटाधारी तपस्वी, सतियाँ तथा अनेकों ब्रह्मचारी, भूख-प्यास को अपने शरीर पर सहते हैं। कई प्राणी अनेक प्रकार की क्रियाएं करते हैं, जल, वायु, अग्नि से संबंधित हवन करते हुए अधोमुख होकर रहते हैं और कभी एक पाँव पर वर्षों तक खड़े रहते हैं। योगी ऊपर मुंह उठाकर तो ईश्वर को देखने का बहाना बनाया करते हैं, परंतु उन्होंने मन को मूंदकर ईश्वर को जानने की कोशिश नहीं की। कामनाओं के अधीन रहने वाले भाव-विहीन मनुष्य परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकते हैं –

सिजदे करे अेनक तोपची कपट भेस पोसती अनेक दा निवाक्त है सीस कौ।

कहा भयो मल्ल जो पै काढत अनेक डंड सो तौ न डंडौत अशटांग अथतीस कौ।।

कहा भयो रोगी जो पै डार्यो रह्यो उरध मुख तन ते न मूड निहाराया आद ईस को

कामना अधीन सदा दामना प्रबीन एक भावना बिहीन कैसे पावै जगदीस कौ।

(अकाल स्तुति)

                गुरु गोविंद सिंह अपने मन को संबोधित करते हुए ऐसा संन्यास धारण करने की शिक्षा देते हैं जिसमें घर को ही वन समझा जाए और मन ही मन उदासीन रहा जाये। यतीत्व की जटाएं परमात्मा से मन जोड़ने का स्नान और नियम के नाखून हों। ज्ञान गुरु हो जो परमात्मा नाम की भभूत लगाकर आत्मा को उपदेश देता हो। आहार अल्प हो और निद्रा बहुत ही कम हो। दया, क्षमा, शील, प्रेम, संतुष्टि का सदैव निर्वाह किया जाय तथा तीनों गुणों से परे जाया जाये। ऐसा संन्यासी काम-क्रोध, अहंकार, लोभ, हठ मोह आदि निकृष्ट भावों को मन में नहीं आने देता। यही संन्यासी आत्मतत्व को प्राप्त कर परमात्म तत्व का साक्षात्कार कर लेता है। इसी प्रकार वास्तविक योग-साधना का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि हे मन! तू इस प्रकार की योगसाधना करो जिसमें सत्य का वास हो, निष्कपटता की माला तथा ध्यान की भभूत धरण की जाये। आत्मा को वशीभूत करना तंत्रनाद हो और नाम की भिक्षा मांगी जाए। ऐसे वाद्य से परमतत्व का रसीला राग निकले। ज्ञान के गीतों की तान हो जिसे देखकर देव-दानव चकित हो जाएं और तृप्त होकर अपने विमानों में बैठकर उसे सुनने आएं। इस प्रकार के योग में केवल आत्मा का उपदेश हो, अजापजाप हो और वेश के नाम पर मात्र संयम हो, तब इस प्रकार के योगी की काया सदैव की भांति उज्ज्वल रहेगी तथा उसे काल का कभी भय नहीं कहेगा –

                रे मन इहि बिधि जोगु कमाओ।

                सिड़ी साच अकपट कंठला ध्यान बिभूत चढ़ाओ।

                ताती गहु आतम बसि कर भिच्छा नाम अधारं।

                बाजे परम तार ततु हरि को उपजै राग रसारं।

                उघटै तान तरंग रंगि अति ग्यान गीत बंधानं।

                चकि चकि रहे देव दानव मुनि छकि छकि ब्योम बिवानं।

                आतम उपदेश भेसु संजम को जापु सु अजपा जापे।

                रहा रहै कंचन सी काया काल न कबहू ब्यापे।। (शब्द हजारे)

                वस्तुतः गुरु गोविंद सिंह ने अपनी वाणी के माध्यम से गीता, वैदिक धर्म तथा वेदों का सार प्रस्तुत करते हुए ‘निवृत्ति परक प्रवृत्ति’ की भावना को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। सांसारिक उत्तरदायित्वों को विस्मृत कर जंगल में जाकर ध्यान साधना उन्हें कभी उचित प्रतीत नहीं हुआ। उनका मत था कि मनुष्य को अपने आदर्शोचित कर्म को पूर्ण करने के साथ-साथ ईश्वर भक्ति में तल्लीन रहना चाहिए। मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म अपने कत्र्तव्य का पालन करना होता है, भले ही इसके लिए उसे अपनी समस्त इच्छाओं का दमन करना पड़े, सांसारिक सुखों को त्यागना पड़े, भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़े या अपनी प्रिय वस्तु के साथ अपने भी प्राण त्यागने पड़े। गुरु साहब ने इन उपदेशों को अपने व्यावहारिक जीवन में ग्रहण भी किया था। यही कारण है कि धर्म-युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए वे ईश्वर से वरदान मांगते हुए दिखाई देते हैं –

देहि शिव वर मोहि इहै शुभ कर मन ते कबहूं न टरों।

न डरों अरि सों जब जाइ लरों निसचै कर अपनी जीत करों।

अरु सिक्ख हो आपने ही मन को इह लालच हउ गुन तउ उच्चरो।

जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों।

(चण्डी-चरित्र उक्ति विलास)

                गुरु गोविंद सिंह अवतारवाद और पीर पैगंबरवाद में आस्था रखने वाले मनुष्यों को समझाते हुए कहते हैं कि अकाल पुरुष के समक्ष इन अवतारों का महत्व नगण्य है। समय-समय पर पृथ्वी पर कितने ही पैगम्बर हुए, परंतु सभी अंत में कालवश होकर मृत्यु को प्राप्त हो गए। संसार में जितने भी ऋषि, मुनि एवं औलिया हुए, सबको काल ने जीत लिया परंतु वे काल को नहीं जीत पाए। जितने भी राम-कृष्ण विष्णु रूप होकर आए सबको काल ने खपा दिया, परंतु ये सब काल का कुछ भी नहीं कर पाएं। जितने इन्द्र, चन्द्र आदि के समान हुए, काल ने सबका नाश कर दिया, परंतु वे काल का कुछ नहीं कर पाए। जितने औलिया, ऋषि, मुनि एवं विभिन्न प्रकार के जीव हैं, सबको अंत में काल की दाढ़ के नीचे जाना होता है –

जिते इंद्र से चंद्र से हो आए। तिथ्यों काल खापा न ते काल घाए।

जिते अउलीआ अंबीआ गउस है हैं। सभै काल के अंत दाड़ा तलै हैं। (विचित्र नाटक)

                गुरु गोविंद सिंह ने यह अनुभव किया है कि तद्युगीन समाज में मत-मतान्तरों के प्रवर्तकों तथा आचार्यों को लोग अवतार मानकर उनकी पूजा करने लगे थे। उन्होंने सोचा कि कहीं आगे चलकर सिक्ख अनुयायी या अन्य लोग उन्हें भी अवतारी पुरुष मानकर पूजना न आरंभ कर दें। अतः अपनी इस आशंका से प्रेरित हो वे कहते हैं – ‘‘जो मुझे परमेश्वर के नाम से जानेंगे वे सब नरककुंड में पड़ेंगे। मुझे मात्र उस प्रभु का दास समझो और इसमें अन्य कोई भी रहस्यमयी अलग बात नहीं है। मैं तो परम पुरुष का सेवक हूँ जो जगत प्रपंच को देखने आया है। प्रभु ने जगत् के प्रति जो निर्देश दिए हैं, उन्हें अवश्य कहूंगा और मृत्युलोक के कर्मकांड, शोषण, अत्याचार आदि को देखकर चुप नहीं बैठूंगा। मैं पत्थर पूजा और वेश में रत रहने वाला नहीं हूँ। उस प्रभु के अनन्त नामों का गायन करूँगा और परमपुरुष को प्राप्त करूँगा –

                जे हम को परमेशर उचरि है।

                ते सभ नरकि कुंड महि परिहै।

                मो को दासु तवन का जानो।

                या मैं भेदु न रंच पछानो।।’’ (विचित्र नाटक)

                वस्तुतः गुरु गोविंद सिंह का जीवन आद्यंत भक्ति-भाव से पूर्ण था। उनका विश्वास था कि परमात्मा को रिझाने का सबसे सरल मार्ग विनयपूर्ण भक्ति करना ही है। निर्गुण, निराकार ब्रह्म से साक्षात्कार अलौकिक शक्ति सम्पन्न महापुरुष भी नहीं कर पाते परंतु एक अल्पमति परमात्मा का भक्त सीधी-सरल भक्ति द्वारा उसे प्राप्त करके सफल हो जाता है। कंठ में कंठी धारण करने से या शीश पर जटा-जूट बढ़ा लेने से प्राप्त नहीं किया जा सकता। परमात्मा को केवल प्रेम से पाया जा सकता है। सारे द्वीपों को कागज का बनाकर सातों समुद्रों की स्याही बना ली जाय, सारी वनस्प्ति को काटकर लेखनी बना ली जाए, विद्या की देवी सरस्वती स्वयं वक्ता हो और करोड़ों युगों तक लिखने वाला लेखक गणेश हो, तब भी काल-कृपाण प्रभु के सामने विनीत हुए बिना ये सारे प्रपंच परब्रह्म को रिझाने में असमर्थ हैं –

                कागद दीप सभै करि कै अरु सात समुंद्रन की यसु कै हो।

                काट बनासपती सगरी लिखवै हू के लेखन काज बनै हो।

                सारसुती बकता करि कै जुगि कोटि गनेशि के हाथ लिखै हो।

                काल क्रिपान बिना बिनती न तऊ तुम को प्रभु नैक रिझै हो।।

(विचित्र नाटक)

                अपनी बात को स्पष्ट करते हुए वे अन्यत्र कहते हैं कि इस क्षण-भंगुर संसार में विषय वासनाओं के लिए भाग-दौड़ करना व्यर्थ है। मानव जीवन सब योनियों में दुर्लभ है और उसमें भी परमात्मा के प्रति अनुरक्ति और भी दुर्लभ है। अतः मनुष्य का एकमात्र उद्देश्य विश्व में व्याप्त सत्य एवं शाश्वत तत्व को प्राप्त करना होना चाहिए। जो अपने को प्रभु भक्ति में अनुरक्त कर लेता है। वही परमपद का अधिकारी होता है। परमात्मा को सर्वस्व मान लेने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है –

                धन्य जीयो तिह को जग में मुख ते हरि चित्त में जुद्ध विचारे।

                देह अनित न नित्त रहे जसु नाव चढै भव सागर तारे।

                धीरज धाम बनाइ इहै तन बुद्धि सु दीपक जिऊं उजियारै।

                ज्ञानहि की बढ़नी मनहु हाथ लै कातरता कुतवार बुहारै।।’’

(कृष्णावतार)

                गुरु गोविंद सिंह जाति-पांति, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर आदि के भेदभाव के भी कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। अतः उनमें जाति, धन, सम्पत्ति अथवा अन्य किसी प्रकार से छोट-बड़ाई करना उचित नहीं है। खालसा पंथ में उन्होंने जिन ‘पंच प्यारों’ का निर्माण किया था, उनमें केवल एक ही खत्री था, शेष चार निम्न जाति के थे। मोहकम चन्द्र एक धोबी था, हिम्मतराय रसोइया था, साहब चंद्र नाई तथा तथा धर्मदास जाट था। जाति भेद को दूर करने का यह प्रयास उन्हें एक महामानव का रूप प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी सेना मंे सैनिकों का सेवा कार्य करने वाले लोगों को भी यह आदेश दे रखा था कि घायल सैनिक किसी भी जाति एवं पक्ष का हो, उसकी समान सेवा की जाए। मित्र और शत्रु के भेद को भुलाकर चाहतों का उपचार किया जाए। युद्ध में प्रत्येक व्यक्ति को जल पिलाया जाए चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। गुरु जी ने जाति-पांति, रीति-रिवाज के बंधन तोड़कर जनवाद की स्थापना की। उन दिनों विभिन्न जातियों ने अपने-अपने नियम बनाए हुए थे, जो उन नियमों का उल्लंघन करता था, उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। गुरु जी ने इन रूढ़िगत बंधनों को तोड़ने के लिए ‘लंगर’ की प्रथा का प्रचलन किया। जिसमें सभी वर्गों के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे। यह प्रथा अभी भी सभी गुरुद्वारों में विद्यमान है। गुरु गोविंद सिंह मनुष्य की सेवा करने को ही ईश्वर की सेवा करना समझते थे। क्योंकि ईश्वर का निवास मुनष्य के निर्मल हृदय में ही होता है। काम, क्रोध, लोभ मोह, द्वेष, मोह तथा अहं को त्याग कर जो मनुष्य पवित्र हृदय से ईश्वर का स्मरण करता है वह मृत्यु की अपेक्षा मुक्ति का अधिकारी बन जाता है यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा है। समग्रतः कहा जा सकता है कि गुरु गोविंद सिंह ने जिस विरोधाभासी परमतत्व का प्रस्तुतीकरण किया है वह एक साधारण पाठक को संशय में डाल कसता है किन्तु जैसे-जैसे गहरे में पैठकर उसके रहस्य को समझा जाता है, वैसे-वैसे इस संशय का निराकरण स्वयंमेव होता जाता है। उनका अकाल-पुरुष इतना विराट और असीम है कि उसमें सर्व धर्मों में प्रतिपादित परब्रह्म की दिव्य विभूतियों का पर्यवसान हो जाता है। उनकी वाणी का प्रत्येक शब्द ईश्वरीय स्वरूप का बोध कराने में सक्षम है। वास्तव में उनका स्वच्छ काव्य एवं निर्मल व्यक्तित्व उनकी धार्मिक भावना का ही प्रतिफल है।

डॉ. ममता सिंगला
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
भगिनी निवेदिता कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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