कबीर क्रान्ति के अग्रदूत हैं जिन्होंने कुव्यवस्था में भूचाल ला दिया और एक नए युग का सूत्रपात किया। कबीर ने अंधविश्वास पाखण्ड और आडंबर को जड़ से हिलाते हुए समाज में नवीन दिशा एवं चेतना का संचार किया। कबीर एक समस्त युग द्रष्टा थे। वे उच्च कोटि के दार्शनिक भी थे। कबीर सामाजिक परिवर्तन के मजे हुए खिलाड़ी और गूढ़ चिन्तक थे। कबीर की रचनाओं में हृदय की सच्चाई भावों की गहराई और विचारों की मौलिकता झलकती है। लोक भावना उनकी लेखनी में गहरे से समाहित है। वे हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। सारे संसार को एक धागा में पिरोने की इच्छा रखते थे। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना उनके अन्दर थी। डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार हिन्दी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई उत्पन्न नहीं हुआ। कबीर सूर्य की भांति खड़े होकर दुर्लभ सत्य को सामने ही प्रस्तुत कर देने की पूर्ण क्षमता रखते थे। कबीर उपनिषद और शंकराचार्य से भी काफी प्रभावित थे। कबीर की सौन्दर्य भावना अद्भुत थी। संसार के कण कण में एक आलौकिक सत्ता विद्यमान है जिसे ब्रह्म कहते हैं जहां कबीर की सौन्दर्य भावना झंकृत होती है। कबीर सामंतवादी व्यवस्था के सभी मूल्यों के विरोधी थे। उन्होंने ब्रह्म का दर्शन अपने भीतर आत्मसात कर रखा था। कबीर एक प्रगतिशील और बुद्धिमान विचारक होने के साथ ही साथ एक संवेदनशील और भावुक कवि भी थे इसी कारण उनकी रचनाओं में तानाशाही का स्वर और फकीरों की फक्कड़ मस्ती समान रूप से परिलक्षित होती है तो कहीं कहीं समर्पणमयी विनम्रता भी देखने को मिलती है। कबीर ने समस्त मानव जाति को एक गंभीर चुनौती देते हुए एक आदर्श और उत्तम कोटि की व्यवस्था को स्थापित किया। अपने आंतारिक बोध के आधार पर आलौकिक ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त किया। कबीर ने सिर्फ ने समस्याओं को ही नहीं उजागर किया अपितु समाधान के ठोस तरीके को भी बताते थे। जब वे स्वयं प्रयोग द्वारा संतुष्ट हो जाते थे तभी दूसरों को दिशा निर्देश देते थे। उन्होंने ब्रह्म के सौन्दर्य के साथ-साथ जीवन के सौन्दर्य को भी देखा। वे काव्य मूल्य को नहीं मानते थे, जीवन मूल्यों को मानते थे। यही कारण है कि उन्हें जीवन जीने की कला का गूढ़ रहस्य मालूम था। कबीर अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से रखते हैं, इसलिए वह समष्टि तक अपनी सम्पूर्णता में पहुंच चुके हैं। वे वास्तविक क्रान्ति के अग्रदूत थे। कबीर के साहित्य का प्रभाव भारत के इतिहास पर अमिट रहेगा। कबीर चाहते थे कि सम्पूर्ण मानव की साइंटिफिक दृष्टि नवीन हो जहां एक ओर कबीर भक्ति पर बल देते हैं वहीं दूसरी ओर उन्होंने ध्यान साधना के मार्ग को भी अपनाया है। कबीर जिस आन्तरिक अनुभूति को प्राप्त करना चाहते थे वह ध्यान साधना से ही संभव हुआ। कबीर ने जिन मूल्यों का अन्वेषण साहित्य मानव समाज के समन्वय और उसे सुन्दरतम रूप में देखने के लिए किया था उनका उनके युग और परवर्ती युग पर भी उन मूल्यों का जीवन और कला के मानदंडोंपर अमिट प्रभाव पड़ा। अपने युग को मानव के अन्तःजगत को उदारत्तम बनाने उसे नवीन दृष्टि का उद्बोधन देना ही उनका उद्देश्य था। कबीर में सच्चे पारदर्शी कलाकार की जीवन्तता अनुभवात्मकता के गुण थे। कबीर का मार्ग अन्य कलाकारों से अलग था क्योंकि उनकी अन्तःप्रज्ञा इतनी बेगवान थी जिसके आलोक का अनुमान लगाना सहज नहीं हैं। वास्तव में वे वैसे वास्तविक और आध्यात्मिक पुरुष थे जिन्होंने मानव में निहित आन्तरिक आत्मिक सौन्दर्य का सर्वांगीण उद्घाटन करने का प्रयास किया है। कबीर हिन्दू और मुसलमान दोनों का भंडाफोड़ करके सच्चे मानवीय धर्म को स्थापित करना चाहते थे। समाज सुधारक के रूप में उनका संदेश मानवतावादी मूल्यों पर केन्द्रित है। धर्म के नाम पर हिन्दू मुसलमान जो बंट गये थे उसे वे ध्वस्त कर देना चाहते थे। उन्होंने मूर्तिपूजा के खिलाफ लिखा है कि –

              ‘पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजूं पहार।‘

हिन्दुओं के साथ ही कबीर ने मुसलमानों की धर्म साधना पर भी कटाक्ष किया-

              कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय।

              ता चढ़ि मुल्ला बांग दे बहरा हुआ खुदाय।।

साथ ही दोनों धर्मावलम्बियों को रास्ता भी दिखाया-

              मोको कहां ढूढ़ै बन्दे मैं तो तेरे पास में।

              ना मैं देवल, ना मा मस्जिद न काबै कैलाश में।।

कबीर जी ने लिखा है कि परम पिता का अंश प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है किसी को मन्दिर मस्जिद जाने की कोई आवश्यकता नहीं। अगर सच में भगवान से साक्षात्कार करना चाहते हो तो अपने अप्तर्मन में झांको अपने आत्मा की आवाज को सुनो-

              आतम ज्ञान बिना सब सूना

              क्या मथुरा क्या काशी।

                     या

              पानी बिच मीन पियासी

              मोहि सुनि सुनि आवे हासी।

यहां कबीर का नैतिकतावादी भाव और सामाजिक दायित्व स्पष्ट नजर आता है। कबीर केवल व्यंग्य ही नहीं करते अपितु सद्मार्ग भी दिखाते हैं। उन्होंने मौलवियों एवं पण्डितों को धूर्त और अविवेकी तक कह डाला-

              अन को त्यागे मन नहीं हटकै

              पारन करै सगोती।

              तुरक रोजा नीमाज गुजारै

              बिसमिल बांग पुकारै।

              इनकी मिस्त कहां तक होइहैं

              सांझै मुरगी मारै।

              हिन्दू की दया मेहर तुरुकन की

              दोनों घट सौ त्यागी।

              वे हलाल वे झटकै मारैं

              ओग दोनों घर लागी।

यही कारण रहा कि कबीर सदैव मानव को पतन के मार्ग से बचाकर उत्थान के पथ पर चलने की सीख देते थे। कबीर ने अपने अनुभवों को संवेदना के तुलादण्ड पर परखा जो उनकी सौन्दर्य भावना के रूप में अभिव्यक्त हुई। कबीर का मानना था कि कोई जन्म से हिन्दू मुस्लिम ब्राहमण या शूद्र नहीं होता अपितु कर्म से जाति का निर्धारण होता है। इसे कबीर बहुत ही तीखे टिप्पणी के जरिए समझाते हैं-

              ज्यों तू बांभन बंभनी जाया

              तौ आन बाट काहे नहीं आया।

              ज्यों तू तुरक तुरकनी जाया

              तो भीतर खतना क्यों न कराया।

समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए कबीर ने भरसक प्रयास भी किया इसकी बानकी उनकी रचनाओं में दृष्टिगत होती है-

              एक बूंद एक मल मूतर एक चाम एक गूदा।

              एक जाति के सब उपजा कौन ब्राहमण कौन सूदा।।

कबीर के काव्य में हिन्दू मुस्लिम दोनों धर्मों की रूढ़ियों आडम्बरों तथा कट्टरताओं के विरुद्ध खड़े होने की असीम शक्ति थी। उन्होंने कहा कि-

              पहिरि जनेऊ जो ब्राहमण होना मेहरि क्या पहिराया

              वो तो जनम की सूद्रिन परसै तुम पांडे क्यों खाया।

तथा

              सुनति कराई तुरूक जौ होना तो और ती कौका,

              अरध सरीरी नारी न छुटे आधा हिन्दू रहिये।

कबीर ने ढ़ोंगी साधुओं और मौलवियों को भी नहीं बक्शा-

              मन न रंगाये रंगायो जोगी कपरा।

              दढ़िया बढ़ाय जोगी बन गइले बकरा।।

कबीर एकेश्वर वाद में विश्वास रखते थे वे जाति पात मूर्ति पूजा एवं धार्मिक संकीर्णता के विरोधी भक्त कवि थे। इस्लाम धर्म में धार्मिक स्तर पर समानता थी प्रेम की पीर का संदेश देने वाले सूफी संत भी थे किन्तु हिन्दुओं की भांति ही अनेक ऐसे कर्म कांड उनमें भी मौजूद थे जिसमें सामान्य जन का दम घुट रहा था। कट्टरता की चक्की में सामान्य जनता पिस रही थी। कबीर ने इस विषय में भी लिखा-

              चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय।

              दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।

भारतीय संस्कृति यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता में विश्वास करता है। कबीर दास जी ने भी नारी की प्रशंसा कम नहीं की है। वे नारी को रतन की खान कहते हैं। दृष्टव्य है-

              नारी नरक न जानिए सब संतन की खान।

              जामें हरिजन ऊपजै सोई रतन की खान।।

कबीर ने नारी की सुन्दरता और मोह माया में फंसने से बचने के तरीके को भी बताया है। उनका कहना है कि अपने से बड़ों को माँ एवं छोटी को बहन कह देने मात्र से भावना में आमूल चूल परिवर्तन होना तय है। उनके सम्पर्क से दूर रहना ज्यादा अच्छा है। उनका मानना था कि-

              जो कबहूँ के देखिए बीर बहिन के माय।

              आठ पहर अलगार है ता को काल न खाय।।

कबीर संसार के प्राणी भाव पर समभाव रखने के समर्थक थे। वे मानते थे कि-

              जहाँ दया वहाँ धर्म है जहाँ लोभ तँह पाप।

              जहाँ क्रोध वहाँ काल है जहाँ क्षमा तँह आप।।

कबीरदास पाखण्डी एवं गुणहीन ब्राहमण के सख्त् विरोधी थे। इस संदर्भ में उनका कथन दृष्टव्य है-

              कलि का ब्राहमण मसखरा ताहि न दीजै दान।

              कुटुम्ब सहित नरकै चला साथ लिया यजमान।।

भले ही समाज में लोग निन्दा करने वालों से खुद को अलग रखते हों लेकिन कबीर दास जी ऐसे लोगों का सत्कार करने को कहते हैं-

              निन्दक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय।

              बिन पानी साबुन बिना निरमल करै सुभाय।।

उन्होंने इंसान को कत्र्तव्यनिष्ठ दयावान परोपकारी आदर्श आचरण वाला और आस्तिक रहने की सीख दी है। उनका मानना था कि इस संसार में जिन्हें कोई सहारा नहीं देता उनका सहारा ईश्वर खुद बनते हैं-

              जाको राखै साइयां मार सकै न कोय।

              बाल न बांका करि सकै जो जग बैरी होय।।

कबीर जी का मानना था कि दूसरों के साथ कदापि ऐसा व्यवहार नहीं करना करना चाहिए जो खुद को न पसंद हो-

              ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय।

              औरन को शीतल करै आपहू शीतल होय।।

कबीर दास ने सच्चाई के पथ की तुलना तप से भी बढ़कर की है जबकि झूठ की संज्ञा पाप से की है-

              साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।

              जाकै हिरदै साँच है ताकै हिरदै आप।।

कहा जाता है कि सुख के सब साथी दुख में न कोय इस बात को कबीर दास ने अपनी फक्कड़ी शैली में कहा था कि-

              दुख में सुमिरन सब करै सुख में करै न कोय।

              जो सुख में सुमिरन करै दुख काहे को होय।।

कबीर का सम्पूर्ण साहित्य मानवता मात्र के सुख-दुख हर्ष-विषाद उसके स्वाभाविक क्रियाकलाप आध्यात्मिक चिन्तन पारस्परिक व्यवहार पर आधारित था तथा मानवता के संरक्षण को संचारित करता था। कबीर के साहित्य को काल की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। कबीर का सम्पूर्ण साहित्य प्राणी जगत के कल्याण को संकल्पित है।

 

डा. चन्देश्वर यादव

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