भारतीय संस्कृति में अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म स्वीकार किया गया । मानवीय सभ्यता के मूल में अहिंसा की भूमिका सबसे अहम है । वैसे तो वैदिक ग्रंथों में अहिंसा की भावना और उसके बोधात्मक व्यवहार की चर्चा बहुत ही गंभीरता के साथ की गई है लेकिन महाभारत के अनुशासन पर्व में इस तथ्य को मनुष्य की केंद्रीय भूमिका के रूप प्रस्तुत किया गया है । बाद में मानवीय सभ्यता और संस्कृति के सम्यक विकास के लिए बुद्ध और महावीर स्वामी ने अहिंसा के सिद्धान्त को या यूं कहें की उसकी भावना को अपने दार्शनिक चिंतन का आधार बनाया। इन दोनों महापुरुषों की दार्शनिक चेतना यह थी कि मनुष्य तभी महान हो सकता है जब वह अपनी आत्मा और विचारों से अहिंसक हो। अहिंसा व्यक्ति को करुणा और प्रेम के लिए पात्रता प्रदान करती है। बिना अहिंसा के इसकी कल्पना नहीं की जा सकती ।
यह तो कहा जाता है कि गांधी का भारतीय राजनीति में आगमन विशुद्ध राजनीतिक चेतना के साथ हुआ था लेकिन यह भी है कि गांधी ने राजनीति की आत्मा तक पहुँचकर यह महसूस किया कि बिना मानवीय धर्म के राष्ट्र के विकास की कामना नहीं की जा सकती है और इसकी जड़ में है अहिंसा की भावना। यदि व्यक्ति का नैतिक बल मजबूत होता है तो वह अपने समाज, परिवार और राष्ट्र के साथ न्याय कर पाता है। अतः गांधी ने संक्रमण की स्थिति में फंसे भारत को बाहर निकालने के लिए जिस प्रकार सत्याग्रह, स्वाबलंबन और सत्य की बात कही ठीक वैसे ही अहिंसा की भावना को बहुत ही महत्वपूर्ण या यूं कहें कि सर्वोपरि माना ।
गांधी सत्याग्रह के पुजारी थे। साबरमती आश्रम को सत्याग्रह आश्रम भी कहा जाता है। गांधी ने भारतीय समाज या ऐसा कहा जाए कि वैश्विक समाज के लिए सत्याग्रह आश्रम को एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। इसके लिए उस आश्रम में रहने वाले लोगों के लिए नैतिक सिद्धांतों का प्रावधान किया जिसमें अहिंसा बोध महत्वपूर्ण भूमिका में था। नैतिक सिद्धांतों में आए “अधिकतर सिद्धांत ऐसे हैं जिनका उल्लेख और जिनकी विवेचना की हिंदू शास्त्रों में हजारों वर्ष पहले हो चुकी है, परंतु गांधी ने सिद्धांतों की व्याख्या और निरूपण ऐसे नवीन ढंग से किया है कि इनका संपूर्ण स्वरूप ही बदल गया है।”1 कहने का अभिप्राय यह है कि गांधी ने अपनी परंपरा से प्राप्त मूल्यबोध और नैतिक बोध को ठीक वैसे ही नहीं स्वीकार किया बल्कि उनको अपने युग के अनुरूप परिवर्तित और परिवर्धित किया। कोई भी सिद्धांत अपने समय के साथ मूल्यवान होता है और समय के साथ अपने अर्थ खो देता है। इसलिए समयानुसार परिवर्तन होना आवश्यक होता है। गांधी ने अहिंसा के सिद्धांत को प्राचीन संकुचित दायरे से निकालकर आधुनिक और विस्तृत दायरे में विवेचित किया। कहा कि अहिंसा वैचारिक और आंतरिक रूप से होनी चाहिए। अभिप्राय यह है कि अहिंसा का जब तक आभ्यंतरिक स्वरूप निर्मित नहीं होगा, कोई भी समाज तब तक पूर्णत: अहिंसक नहीं हो सकता। यह तभी संभव हो पाएगा कि दूसरे व्यक्ति के प्रति अनुकूल आचरण किया जाए। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि ‘आत्मानः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत’ अर्थात प्रतिकूल आचरण की कल्पना नहीं करनी चाहिए। गांधी ने इस धारणा को तत्कालीन परिस्थिति के संदर्भ में उपयोग किया ।
सत्य और अहिंसा दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। “अहिंसा के बिना सर्वोच्च सत्य की सिद्धि असंभव है।”2 तो बिना अहिंसा के सत्य का प्रतिफलन संभव नहीं है और सत्य यदि प्रतिफलित नहीं होगा तो सच्ची राजनीति का विकास नहीं होगा। और अगर सच्ची राजनीति नहीं होगी तो लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं होगी। अत: इससे स्पष्ट हो जाता है कि न्याय और अन्याय का फासला कभी भी खत्म नहीं हो सकता तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि अहिंसा का बोध न्याय, अन्याय तथा शोषण और मुक्ति का विवेक प्रदान करता है ।
गांधी ने अहिंसा के व्यापक अर्थ को स्वीकार किया। गांधी पहली बार दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर जब गए तो वहाँ की परिस्थिति को देखकर उनके मन में यह विचार कि जो परिस्थितियां यहां बनी है उनका सामना हम प्रेम और अहिंसा के बल पर ही कर सकते हैं। “अहिंसा वह सिद्धान्त या नीति है जिसमे अपने विरोधी को प्रेम से जीता जाता है, घृणा या लड़ाई से नहीं।”3 इसलिए नेटाल में गांधी ने ‘इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना किया जिसका ध्येय सत्य अहिंसा और प्रेम की स्थापना। यहां किसी भी प्रकार के अत्याचार के लिए कोई स्थान नहीं था । आज वैश्विक स्तर पर जिस प्रकार की आतंकवादी गतिविधियां चल रही हैं उससे निपटने का एक ही तरीका है अहिंसा का व्रत लेना। गांधी के लिए अहिंसा का व्रत एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति का संपूर्ण परिष्कार होता है। वह राग द्वेष से मुक्त होकर सच्चा बनता है और एक आदर्श राष्ट्र की नींव रखता है ।
गांधी का यह विशद चिंतन एक ओर गीता की दार्शनिक शक्ति से निःसृत होता है तो दूसरी ओर राम के रामराज्य से । कृष्ण जहां एक और सब कुछ त्याग कर अपनी शरण में आने की बात करते हैं जो कि अहिंसा के बिना संभव नहीं है। रामराज्य की समूची परिकल्पना ही अहिंसा पर आधारित है-
रामराज्य बैठे त्रैलोका । हर्षित भये गए सब शोका ।।
वयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई ।।4
गांधी ने अहिंसा के सिद्धांत को सामाजिक परिवर्तन और एक ऐसे समाज का निर्माण के लिए उपयोग किया जिससे एक सच्चे राष्ट्र का निर्माण किया जा सके और एक सच्चे व्यक्ति के निर्माण में भी सहयोग मिल सके। इसलिए उन्होंने कहा कि “अहिंसा व्यापक वस्तु है हम हिंसा की होली के बीच घिरे हुए पामर लोग हैं। यह वाक्य गलत नहीं है कि जीव-जीव पर जीता है। मनुष्य एक क्षण के लिए भी बाह्य हिंसा के बिना नहीं जी सकता। खाते- पीते, उठते-बैठते सभी क्रियाओं में इच्छा-अनिच्छा से वह कुछ ना कुछ तो हिंसा करता ही रहता है। यदि वह इस हिंसा से छूटने के लिए महाप्रयत्न करता है तो उसकी भावना में अनुकंपा होती है, वह सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव का भी नाश नहीं चाहता और यथाशक्ति उसे बचाने का प्रयत्न करता है तो वह अहिंसा का पुजारी है। उसके कार्यों में निरंतर संयम की वृद्धि होगी, उसमें निरंतर करुणा बढ़ती रहेगी।”5 अपने इस विचार में गांधी ने अहिंसक होने की प्रक्रिया क्या है? पर गहन चिंतन किया है अहिंसक होना एक साधनात्मक प्रक्रिया है जिसमें शामिल होकर आत्मा की शुद्धता को प्राप्त किया जा सकता है। अत: अहिंसक होना निरंतर साधना की प्रक्रिया में रहकर लगातार व्यक्ति का निर्माण होता है। गांधी ने कहा कि अहिंसक होना आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया से गुजरना है इसके लिए उन्होंने कबीर के एक दोहे को प्रमाण स्वरूप उद्धृत किया है-
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ।।
गांधी ने कबीर के हवाले से यह बात प्रमाणित किया कि उसे ही कुछ मिल सकता है जो व्यक्ति साधना की गहन प्रक्रिया से गुजरता है।
गांधी ने पुन: यह विचार किया कि अहिंसा के मूल में एकत्व की भावना समाहित रहती है। जो व्यक्ति अहिंसा का साधक होता है वह एकत्व की भावना को भी बढ़ाने वाला होता है। उसके भीतर रागद्वेष और स्व, पर की भावना का निषेध होता है अतः “अहिंसा की तह में अद्वैत की भावना निहित होती है।”6 इसलिए उसकी दृष्टि में अभेद का भाव आ जाता है। गांधी के इस भाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि अहिंसा का सिद्धांत बहुजातिय और बहुभाषिक राष्ट्र के लिए बहुत ही आवश्यक है। अत: भारतीय परिवेश मे अनेक प्रकार के सीमाओं से मुक्ति के लिए अहिंसा ही एकमात्र ऐसा साधन है जो कारगर साबित होगा ।
गांधी के सामने जितना बड़ा सवाल स्वाधीनता का था उससे कहीं बड़ा सवाल व्यक्ति के निर्माण का था। वे सोचते थे कि आजादी तो हमें मिल ही जाएगी लेकिन यह व्यक्ति का निर्माण सच्चे अर्थों में नहीं होगा तो भारत का क्या होगा। इसलिए उनका जोर व्यक्ति के आत्मिक विकास की ओर अधिक था । गांधी कहते थे अहिंसा की भावना व्यक्ति को कमजोर नहीं बल्कि उसे बल प्रदान करती है, उसके अनुसार “अहिंसा भीरु और कायर लोगों का काम नहीं है, यह तो उन वीरों का तरीका है जो मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार हैं।”7 इसलिए सच्चे अर्थों में अहिंसा वीरता और आत्मा के उच्चावस्था का पर्याय है जो कि मनुष्य को मृत्यु के भय से बाहर धकेलती है। जो व्यक्ति मृत्यु के भय से मुक्त है वही स्वाधीन है अतः यह कहना असंगत नहीं है कि अहिंसा में स्वाधीन होने का भाव छिपा होता है ।
सत्य, सत्याग्रह, स्वाधीनता, स्वावलंबन और अहिंसा सब आपस में सम्बद्ध दिखते हैं। अहिंसा की भावना का प्रसार इन सभी रूपों में दिखता है। गांधी की निगाह में समाज, शास्त्र की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण था। इसलिए वे समाज को अधिक महत्व देते थे। गांधी ने अहिंसा को भी धर्म से जोड़कर कहा कि “अहिंसा सामाजिक धर्म है। सामाजिक धर्म के रूप में उसे विकसित किया जा सकता है।”8 गांधी ने स्वयं यह कहा कि यह मेरा एक प्रयोग है। मैं लोगों को यह मनवाने पर विचार कर रहा हूं। गांधी ने अहिंसा को नए अर्थों में प्रयुक्त किया क्योंकि उनकी निगाह में अहिंसा के माध्यम से ही भारत की संप्रभुता को सच्चे स्वरूप में प्राप्त किया जा सकता है। इनके लिए अहिंसा स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए एक तरीका था जिसका प्रभाव व्यक्ति से होकर राष्ट्र तक पर व्याप्त रहता है। अत: यह व्यष्टि से समष्टि की ओर संचरित होने वाला मूल्य और अनुशासन है ।
गांधी की सबसे महत्वपूर्ण संकल्पना है स्वराज्य की संकल्पना। स्वराज्य की अवधारणा में गांधी ने आत्मा की स्वाधीनता के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया की व्यवस्था का समर्थन किया। लेकिन यह बहुत ही स्पष्ट तरीके से कहा कि अहिंसा की भावना को धारण किए बगैर स्वराज्य की संकल्पना को साकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकार देखा जाए तो गांधी ने अहिंसा को सभी प्रकार की संकल्पनाओं का मूल माना है। अतः निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि अहिंसा अपने विस्तृत स्वरूप में अनेकानेक मूल्यवत्ताओं को धारण किए हुए है ।
सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि हिंसा और अहिंसा एक व्यक्तिगत गुण है। गांधी की मान्यता थी कि अहिंसा व्यक्तिगत गुण नहीं है। वह एक सामाजिक गुण भी है और अन्य गुणों की तरह उसका भी विकास किया जाना चाहिए।”9 गांधी द्वारा अहिंसा को सामाजिक धर्म और गुण स्वीकार करना और उसका निरंतर पालन करने की निष्ठा निश्चित रूप से सामाजिक व्यवहारों में एक ऐसी मूल्य व्यवस्था को लागू करने की वकालत है जिसमें व्यक्ति और व्यक्ति के बीच संबंधों को मजबूती मिलती है ।
वास्तव में अहिंसा की भावना में औचित्य का भी सरोकार मौजूद रहता है। अहिंसा की भावना औचित्य को प्रस्तावित करती है जो राष्ट्र के निर्माण मे बहुत ही आवश्यक दिखती है। आज समूचा विश्व छोटे-छोटे स्वार्थों से युक्त होकर हिंसात्मक स्थितियों मे फंसा नज़र आ रहा है। यदि गांधी के अहिंसा सिद्धान्त को व्यापक तरीके से अपनाया जाए तो सच्चे और स्वाधीन राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। अत: अहिंसा सच्चे राष्ट्र के निर्माण में मील का पत्थर है। इसलिए गांधी ने बहुत ही बेबाकी के साथ कहा था कि “मैं केवल एक मार्ग जानता हूं- अहिंसा का मार्ग मेरी प्रकृति के विरुद्ध है। मैं हिंसा का पाठ पढ़ाने वाली शक्ति को बढ़ाना नहीं चाहता, मेरी आस्था मुझे आश्वस्त करती है कि ईश्वर बेसहारों का सहारा है और वह संकट में सहायता तभी करता है जब व्यक्ति स्वयं को उसकी दया पर छोड़ देता है। इसी आस्था के कारण मैं यह आशा लगाए बैठा हूं कि एक ना एक दिन मुझे एक ऐसा मार्ग दिखाएगा जिस पर चलने का आग्रह में अपने देशवासियों से विश्वास पूर्वक कर सकूँगा।”10 गांधी का यह उपरोक्त विचार निश्चित रूप से आज के वर्तमान समय में बहुत ही उपयोगी है अतः इस संक्रमण कालीन स्थिति में अहिंसा संबंधी विचार निश्चित रूप से अनुकरणीय है ।
गांधी की निगाह में सत्य सर्वोपरि है क्योंकि उनका मानना था कि सत्य से ही व्यक्ति बाह्य और आंतरिक स्थिति में अपने विकास को सुनिश्चित करता है । इसलिए उन्होंने इसके लिए सत्याग्रह की संकल्पना को अनेक नैतिक मूल्यों के साथ विकसित किया। यह कहा कि सत्याग्रह तभी पूर्ण हो सकता है जब वह अहिंसा की पृष्ठभूमि पर कार्य करे । अतः यह मानना संगत है कि सत्य और सत्याग्रह को प्राप्त करने का साधन अहिंसा है । इसलिए गांधी को “अहिंसा की अमोघ शक्ति और सत्य की अंतिम विजय पर चिरस्थाई विश्वास था ।”11
गांधी ने अहिंसा के भाव को मानव प्रेम ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र के प्रेम के रूप में विकसित किया । अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में उन्होंने यह लिखा कि कलकत्ता के काली मंदिर में होने वाली बली को रोकने का उन्होने बहुत प्रयास किया था । यह गांधी की अहिंसावादी दृष्टि थी जिसने सार्वभौमिक प्रेम को संकल्पित किया । अतः अहिंसा वह भावबोध है जिसमें व्यक्ति उदात्त प्रेम को प्राप्त करता है । गांधी ने जिस प्रकार अहिंसा के सिद्धांत को अपने विचार के केंद्र में रखा उसका अभिप्राय यह था कि उन्होंने इसे राजनीतिक सिद्धांत के रूप में परिवर्तित कर दिया उन्होंने इसकी संकल्पना को बदलते हुए कहा कि “नागरिकता के सारे आदर्श और सदाचार के सारे नियम अहिंसा के विचार क्षेत्र में आ जाते हैं ।”12
गांधी के सामने स्वाधीन भारत का संकल्प मौजूद था इसलिए उनकी निगाह में स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन सभी संकल्पनाओं की महत्ता थी जो प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में मूल्यवान साबित हों । अतः गांधी ने अहिंसा को साधन के रूप में साध्य की प्राप्ति के लिए अपनाया । इसलिए कहा कि “अहिंसा निर्बल व्यक्ति का आश्रय नहीं बल्कि शक्तिशाली का अस्त्र है ।”13
हमारी भारतीय चिंतन परंपरा में अहिंसा को हृदय परिवर्तन का साधन माना जाता रहा है । अनेक ऐसी कहानियां मौजूद हैं जिनके द्वारा बड़े से बड़े योद्धा का हृदय परिवर्तन हो गया । गांधी की मान्यता भी यही थी कि व्यक्ति में भौतिक परिवर्तन करने की अपेक्षा उसके हृदय में परिवर्तन करना आवश्यक है । परिवर्तित हृदय वाला व्यक्ति नए भारत का इतिहास लिखने वाला होगा । गांधी ने अहिंसा के सिद्धांत का अंग्रेज अधिकारियों के सामने भी प्रयोग किया और सफल रहे । इसलिए गांधी ने अहिंसा का केवल सैद्धांतिक विवेचन नहीं किया बल्कि उसका अपने जीवन में व्यवहारिक उपयोग भी किया । जो आज वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर पालन करने योग्य है ।
आज जब चारों तरफ हिंसा, आतंक का तांडव खेला जा रहा है । आतंकवाद, नक्सलवाद और अतिवाद ने कई नए रूप धारण कर लिए हैं ऐसे में भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, महात्मा गांधी के द्वारा बताए गए अहिंसा के मार्ग अत्यंत हीं प्रासंगिक हैं । इस एटमी युग और राष्ट्रों की परस्पर प्रतिद्वंद्विता में मानव जाति के समूल नष्ट की संभावना के अटकल भी लगाए जा रहें है ऐसे में अहिंसा और महात्मा गांधी के बताए सिद्धांत अनिवार्य प्रतीत होते हैं । विश्व शांति की स्थापना और परस्पर सौहार्द के आधार पर ही लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा की जा सकती है । ऐसे में भारतीय संस्कृति का सिद्धांत “अहिंसा परमो धर्म:” अत्यंत ही महत्वपूर्ण और अनुकरणीय हो जाता है ।

संदर्भ:-
1. रवीन्द्रनाथ मुखर्जी, सामाजिक विचारधारा, पृ.सं॰-469, विवेक प्रकाशन, दिल्ली-प्र॰सं॰1961
२. वही,  पृ.सं॰-469
3. ओमप्रकाश गाबा, भारतीय राजनीति विचारक, पृ.सं॰-183, मयूर पेपर बेक्स, दिल्ली- प्र॰सं॰1991
4. गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस- उत्तरकाण्ड, पृ.सं॰-914, गीता प्रेस,गोरखपुर, आवृत्ति-1990
5. रवीन्द्रनाथ मुखर्जी, सामाजिक विचार धन, पृ.सं॰-470, विवेक प्रकाशन, दिल्ली, प्र॰सं॰1961
6. वही, पृ.सं॰-470
7. वही, पृ.सं॰-470
8. वही, पृ.सं॰-471
9. वही, पृ.सं॰-471
10. यंग इंडिया, पृ.सं॰-342, 1920
11. थॉमस पंथम, केनेथ एल डॉयच्च, ‘आधुनिक भारत में राजनीतिक विचार’, “गांधी का सत्याग्रह और 12. हिन्दू विचार”, पृ.सं॰-297, सेज पब्लिकेशन, नई दिल्ली, प्र॰सं॰1986
13. ओमप्रकाश गाबा, भारतीय राजनीति विचारक, पृ.सं॰-184, मयूर पेपर बेक्स, दिल्ली- प्र॰सं॰1991
14. ओमप्रकाश गाबा, भारतीय राजनीति विचारक, पृ.सं॰-183, मयूर पेपर बेक्स, दिल्ली- प्र॰सं॰1991

डॉ. संजीव कुमार तिवारी
एसोसिएट प्रोफेसर
राजनीति विज्ञान विभाग
महाराजा अग्रसेन कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय

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