भारत में न्यू मीडिया अपने विकासमान दौर में है। इसके फैलाव की गति बहुत तेज है। इसके बहाव के आगे पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ मुख्यधारा की मीडिया भी विस्मित है। दुनिया भर में पढ़ना, सुनना, देखना बढ़ रहा है, पर पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं के पास सबसे पहले नई सूचना, जानकारी, समाचार या विचार पहुंचाने में आज न्यू मीडिया ही सबसे आगे है। इंटर नेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन का ताजा आकलन है — ‘मोबाइल फस्र्ट, डिजिटल सैकेंड एंड प्रिंट इज डाइंग।’

दरअसल भारत में प्रिंट मीडिया फिलहाल मौत के कगार पर कतई नहीं है। 2006 से 2016 की अवधि मंे देश में समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की बिक्री प्रतिवर्ष 4.87 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। इन दस वर्षाें में हिंदी के समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की वृद्धि 8.76 फीसदी दर्ज की गई है। आज दुनिया में 126 हजार करोड़ रुपए के कुल कारोबार वाले मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग का सर्वाधिक लाभदायक हिस्सा प्रिंट मीडिया ही है। देश में प्रिंट मीडिया का बाजार 30,300 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

आंकड़ों के अनुसार भारत में 30 करोड़ से भी अधिक लोग समाचार-पत्र पढ़ते हैं, 90 करोड़ से अधिक लोग टेलीविजन देखते हैं और 34 करोड़ से भी अधिक लोग आॅनलाइन मीडिया का प्रयोग करते हैं। इस तरह, मीडिया का हर माध्यम वृद्धि की ओर गतिमान है। इसके बावजूद भारतीय मीडिया के क्षेत्र में निवेश के लाले क्यों पड़े हैं, इस प्रश्न का जवाब देना आसान नहीं है।

भारत में टेलीविजन कंपनियां ब्राजील की तुलना में आधा लाभ ही हासिल कर पा रही हैं, दूसरी ओर यहां कोई भी फिल्म प्रोडक्शन हाउस मुनाफा कमाने की स्थिति में नहीं है। भारतीय उद्योग परिसंघ के अनुसार अप्रैल 2000 से लेकर सितंबर 2015 तक भारत में हुए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में से मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का हिस्सा केवल 1.61 फीसदी है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब टेलीविजन और फिल्म जैसे बड़े माध्यम अपने आधारभूत ढांचे की कमी को झेल रहे हों और वे पैसा जुटाने में खुद को असमर्थ मान रहे हों तो डिजिटल और अन्य नए माध्यमों की हालत क्या होगी।

आॅक्सफोर्ड स्थित राइटर्स पत्रकारिता अध्ययन संस्थान ने मई 2016 में जारी रिपोर्ट में भारत में डिजिटल पत्रकारिता के इरादे से शुरू की गई छह कंपनियों के कामकाज की जो विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट जारी की है, उससे कुछ हद तक यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आखिर देश में डिजिटल पत्रकारिता का भविष्य क्या है? आर.आई.एस.जे. की यह रिपोर्ट बताती है कि इन नई मीडिया कंपनियों में से दो ‘इनशाॅर्टस’ (अंग्रेजी) और ‘डेलीहंट’ (हिंदी और अन्य भाषाएं) लाभ के मकसद से निजी शेयरधारकों से प्राप्त फंड के द्वारा संचालित हैं। ‘द वायर’ और ‘खबर लहरिया’ नामक डिजिटल प्लेटफार्म का गठन गैर-लाभकारी संस्था के रूप में किया गया है, जबकि ‘द क्विंट’ और ‘स्क्राॅल’ नामक समाचार, सामग्री मुहैया कराने वाली वेबसाइट मुनाफे के मकसद से संचालित है। यह रिपोर्ट बताती है कि समाचार-सामग्री तैयार करने वाले और सामग्री पेश करने वाली वेबसाइटों के बीच क्या अंतर है और इनके कारोबारी हित और नुकसान क्या-क्या हैं? ‘द टाइम्स आॅफ इंडिया’, ‘एनडीटीवी’, ‘दैनिक भास्कर’ आने वाले वक्त मंे समाचार सामग्री आधारित कंपनियांे को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में होंगी। जबकि ऐप आधारित वेबसाइट को सीधे मुकाबले का सामना नहीं करना पड़ेगा।

वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री के जरिए पत्रकारिता के मानक और पाठक के स्वरूप को भी अध्ययन का विषय बनाया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक केवल डिजिटल हो जाने से ही मुख्य धारा की मीडिया को ये कंपनियां चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ जातीं। अधिकतर भारतीय मीडिया संगठन अपने डिजिटल कारोबार के लिए विज्ञापन पर ही निर्भर करती हैं। लेकिन दुनिया के किसी भी बाजार में इनका कारोबारी माॅडल पूरी तरह से कारगर साबित नहीं हुआ है। डिजिटल पत्रकारिता की फंडिंग के बारे में भारतीय मीडिया कंपनियों को सचमुच नए सिरे से सोचना होगा। इसके बावजूद सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत से न्यू मीडिया के भविष्य को कुछ-कुछ पढ़ा जा सकता है। शेखर गुप्ता के अनुसार ‘‘सोशल मीडिया अब केवल संचार, बहस और गाली-गलौच का जरिया नहीं रहा, बल्कि वह प्रशासन, राजनीति और कूटनीति का औजार बन गया है। दूसरी बात, इसने अब प्रशासन से धैर्य और परोक्ष माध्यमों तथा पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत की शक्ति तथा सार्वजनिक राजनीति से जवाबदेही छीन ली है।’’ (बिजनेस स्टैंडर्ड, 28 जनवरी, 2017)

जगदीश उपासने के अनुसार, ‘‘आज देश का 90 प्रतिशत युवा आज इंटरनेट से न्यूज ले रहा है और 85 प्रतिशत से अधिक युवा सोशल नेटवर्किंग साइटों पर खबरों और विचारांे को शेयर कर रहे हैं। सवाल यही है कि पाठक और दर्शक कहां से लाए जाएं। देश की आबादी में से 65 फीसदी हिस्से वाले 35 वर्ष से कम आयु के कितने युवा अखबार-पत्रिकाएं पढ़े हैं या न्यूज चैनलों का न्यूज हाइप ग्रहण करते हैं? फिर किसी बड़े समाचार-पत्र या न्यूज चैनल के मालिक से पूछिए, जो अपने वेब पोर्टलों तथा मोबाइल-स्मार्टफोन प्लेटफार्म को विकसित करने में भारी निवेश कर रहे हैंे और वेब पोर्टलों पर नौकरियां दे रहे हैं। प्रसार, पाठक, दर्शक और विज्ञापनदाता बचाए रखने की जद्दोजहद मुख्यधारा के हरेक मीडिया घराने के बोर्ड रूम में महसूस की जा सकती है। क्या करें कि स्मार्टफोनों के जरिए आॅडियंस की हथेलियों मंे जा पहुंची यह बला टल जाए। दिशाहीनता गजब की है। पिं्रट के पत्रकार और मालिक खोजी पत्रकारिता के अगले चरण यानी डाटा जर्नलिज्म को परवान चढ़ा रहे हैं।’’ (‘साहित्य अमृत’, अगस्त, 2015, पृ. 83) इस तरह, नए मीडिया की आहट आॅनलाइन मीडिया के भविष्य को नए सिरे से गढ़ रही है। नए मीडिया के आशा की किरण बहुत से युवा पत्रकार हैं, जो नई सोच और नई रचनात्मकता के साथ यूट्यूब जैसी वेबसाइट की लोकतांत्रिकता का आधार लेकर कुछ अच्छा और नया करने का मौका खोजने में सफल भी हो पा रहे हैं।

नया मीडिया: नए दौर में नया मनोरंजन

वेंचर केपिटलिस्ट मैरी मीकर की इंटरनेट रिपोर्ट टेक्नोलाॅजी के बड़े रुझान की व्याख्या के लिए आंकड़ों के अंबार को टटोलती है। 2016 के प्रमुख रुझानों के अनुसार दुनिया भर में तीन अरब लोग इंटरनेट का प्रयोग करते हैं और इसमें हर वर्ष 9 प्रतिशत की बढोत्तरी हो रही है। 80 प्रतिशत मोबाइल प्रयोग करने वालों ने अपना समय फेसबुक, व्हाट्सएप और क्रोम पर गुजारा। अमेरिका में इंटरनेट पर 3992 अरब का विज्ञापन का कारोबार है।

दरअसल, उपर्युक्त आंकड़े प्रमाण हैं कि नए मीडिया की बढ़त का ठोस आधार दुनियाभर में इंटरनेट का बढ़ता हुआ चलन है। समाचार मीडिया के साथ-साथ आज स्मार्ट फोन ने टीवी द्वारा प्रस्तुत मनोरंजन के ढर्रे को पूरी तरह बदल दिया है। अब भारत में भी छोटे से स्क्रीन पर कंटेंट हाथ में आ गया है। फेसबुक, यूट्यूब ने देश के युवाओं की मनोरंजन की धारणा और व्याख्या को बदल दिया है।

खबर है कि फेसबुक इसी महीने से टीवी सीरियल और कार्यक्रम की शुरूआत कर रहा है। करीब 24 छोटे-बड़े टीवी सीरियल और कार्यक्रम बन चुके हैं। पांच से दस मिनट के कई शो भी हैं, जिन्हें फेसबुक के मोबाइल एप के वीडियो सेक्शन में भी देखा जा सकेगा। जाहिर है, यह खबर बदलाव के पूरे बयार के पुख्ता आधार के परिदृश्य का बयान करती है। वस्तुतः भागम-भाग के वर्तमान दौर में अब ढ़ाई-तीन घंटे किसी फिल्म के साथ या आधे-एक घंटे धारावाहिक देखते स्क्रीन से जुड़ना सजा की तरह लगने लगा है, जबकि वेब सीरिज 10 से 20 मिनट में नए कंटेंट, नई सोच और नई मस्ती से भरपूर मनोरंजन कर रहे हैं और यहां विकल्पों की भी बहुतायत है। दूसरा, यहां नई तकनीक, नए तरीकांे और परस्पर संवाद की इतनी अधिक मौजूदगी है कि वहां तक दूसरे माध्यम कतई नहीं पहुंच सकते। यहां जिस तरह से तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है, वह अन्य पारंपरिक माध्यमों से नहीं मिल सकती।

विश्वपति सरकार मानते हैं कि बतौर शो निर्माता और लेखक, यूट्यूब के जरिए लोगों की नब्ज समझने का ज्यादा अच्छा मौका मिल पाता है। वे यहां तक कहते हैं कि ‘‘टेªडिशनल मीडिया आपको कभी ठीक से जज नहीं कर सकता। यूट्यूब पर आप वीडियो डालिए, आपको तुरंत अच्छे-बुरे का पता चला जाता है। लोग कमेंट्स करते हैं, आंकड़े सामने होते हैं। कितने लोगों ने देखा, कितनोें ने शेयर किया, किस-किस जगह देखा गया, कितने लोगों ने सब्सक्राइब किया। जबकि टीवी से आपको कभी भी दर्शकों की पसंद-नापसंद के बारे में सही जानकारी नहीं मिल सकती, जिस वजह से या तो आप एक ही चीज परोसते रहेंगे या फिर बाहर निकल चुके होंगे।

वेब सीरिज के बाजार में इन दिनों बड़ी बहार है। लगभग सभी बड़े प्रोडक्शन हाउस इस मैदान में बाजी मारने की तैयारी में हैं। हाल ही में टीवी मलिका एकता कपूर ने भी एएलटी बालाजी एप शुरू किया है। वेब सीरिज का लक्ष्य आज का युवा है और वे युवाओं की भाषा में युवाओं की बात करते हैं। अधिकांश लोकप्रिय वेब सीरिज जैसे — बैंग बाजा बारात, द ट्रिप, गर्ल इन द सिटी, परमानेंट रूममेट, बेक्ड, टू बी सिंगल, हैप्पी टू बी सिंगल, नाॅट फिट आदि इसके उदाहरण हैं।

गूगल द्वारा अध्ययन बताता है कि भारत में यूट्यूब को देखने वाले दो तिइाई दर्शक 35 साल से कम उम्र के हैं और भारतीय यूजर 30 प्रतिशत यूट्यूब वीडियो अपने मोबाइल पर देखते हैं। ऐसे में यह सवाल सहज उठता है कि क्या यह चैनल इन युवाओं की पसंद के अनुरूप कंटेंट बनाकर यूट्यूब पर जमे रहना चाहेंगे या फिर टीवी या बड़ा पर्दा ही इनकी अगली या आखिरी मंजिल है। वेब सीरिज या वीडियो के अर्थशास्त्र के व्यवस्थित होने की स्थिति भले ही न हो, पर प्रायः यहां कलाकारों और सहयोगियों को टीवी के स्तरीय पारिश्रमिक से 50 फीसदी ज्यादा भुगतान की सूचना है। पिछले वर्ष यह खबर आई थी कि फरहान अख्तर अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए एक वेब सीरिज बना रहे हैं, जिसमें काम करने के लिए वह नायिका रिया चड्ढा को 85 करोड़ रुपए दे रहे हैं। मोबाइल में परोसे गए मनोरंजन का यह दौर न केवल सफलता का नया इतिहास गढ़ रहा है बल्कि यह दौर सचमुच नई रंगत, नई सोच और नई चाहत का संसार भी चुपके से रच पाने में सफलता पा चुका है।

वेब सीरिज या वीडियो का कंटेंट वस्तुतः एकदम नई तरह का है। नए तरह की भंगिमा, काॅमेडी, स्पू्रफ और प्रैंक… जैसे कि ऐब या वायरल फीवर की तरफ से पेस्ट कंटेंट। अर्णब गोस्वामी और अरविंद केजरीवाल की नकल करते हुए द वायरल फीवर की तरफ से बनाया गया अर्नब्स क्यूटीपा नामक वीडियो यूट्यूब पर लगभग 50 लाख बार देखा जा चुका है। इसी तरह स्टार समूह द्वारा इंटरनेट पर अपलोड किया गया विश्व कप क्रिकेट 2015 के भारत और पाकिस्तान के मैच का वीडियो 21.4 लाख लोगों द्वारा देखा गया। एआईबी के कुल वीडियो व्यूज भी पिछले साल की शुरूआती महीने में 6.3 करोड़ तक जा पहुंचे थे और उसे दस लाख से अधिक इंटरनेट प्रयोग करने वालों ने सबस्क्राइब कर रखा है। यानी एआईबी का हर वीडियो, जो यूट्यूब पर डाला जाता है उसे कम से कम दस लाख लोगों द्वारा देखे जाने की गारंटी है।

वेब सीरिज और वीडियो कंटेंट का यह उभार क्या सचमुच पारंपरिक मीडिया के लिए खतरा है। क्या टेलीविजन शीघ्र ही इसकी चपेट में आने वाला है? क्या वीडियो, वेब सीरिज का व्यूइंग आॅवर्स टेलीविजन और इंटरनेट के बीच विभाजित हो रहा है और टेलीविजन अपना दर्शक खोता जा रहा है? इस बात का अहसास तो वेब सीरिज और वीडियो के निर्माताओं को है ही कि वे टेलीविजन के दर्शकों को अपनी ओर खिंचने में सक्षम है, इसलिए वे नए रुझान के साथ प्राणप्रण से अपनी रचनात्मकता को बिना घालमेल के सीधे दिखाने में संलग्न हैं। क्या हम नई किस्म की वीडियो क्रांति के मुहाने पर नहीं खड़े हैं?

 

डाॅ. सुनील कुमार तिवारी
शहीद भगतसिंह काॅलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय

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