पर्यावरण शब्द ‘परि’ एवं ‘आवरण’ इन दो शब्दों के संयोग से बना है। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो चारों ओर के आवरण के अंदर जो कुछ भी शामिल होता है, पर्यावरण कहलाता है। भूमि के अनेक घटक, जल, मृदा, पर्वत, मरूस्थल, वायु मंडल इत्यादि पर्यावरण के अंग हैं। ताप, नमी, पदार्थो के संघटक पर्यावरण के भौतिक प्रभाव हैं। पादप तथा प्राणी पर्यावरण के जैविक प्रभाव के रूप मेें अंकित किए जाते है। अस्तु, पर्यावरण अपने आप में एक व्यापक परिकल्पना है, जिसका संबंध समूचे भौतिक एवं जैविक विश्व से है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘पर्यावरण’  जीवधारियों के समस्त क्रियाओं को प्रभावित करने वाला भौतिक एवं जैविक परिस्थितियों का सम्मिलित योग है। जलमंडल, स्थलमंडल तथा वायुमंडल के जीवनयुक्त भागों का योग, जिससे कि जीवमंडल प्रभावित होता है, पर्यावरण कहलाता है। ‘डगलस एवं रोमन हालैण्ड’ ने पर्यावरण को परिभाषित करते हुए कहा है कि पर्यावरण उन सभी बाहरी शक्तियों एवं प्रभावों की व्याख्या करता है, जो जीव जगत के जीवन, व्यवहार, स्वभाव, विकास तथा परिपक्वता को विभिन्न स्तरों में निर्धारित करता है।

यहाँ विकास की अवधारणा को समझना भी आवश्यक है। विकास एक शाश्वत एवं निरंतर गतिशील प्रक्रिया है। आंतरिक एवं बाह्य कारणों से होने वाला परिवर्तन विकास की श्रेणी में रखा जा सकता है। सभी विकास के अपने कुछ सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम होते हैं। प्रायः वृद्धि एवं विकास को एक-दूसरे का पर्याय समझ लिया जाता है। किंतु, अवधाराणात्मक रूप से दोनों में बड़ा विभेद है। वृद्धि परिमाणात्मक परिवर्तन है, जबकि विकास परिणामात्मक परिवर्तन को दर्शाता है। वृद्धि, विकास के क्रम में एक चरण है, जो एक निश्चित समय के पश्चात ठहर जाती है। दूसरी तरफ, विकास सतत चलने अथवा घटने वाली प्रक्रिया है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने विकास की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसकी परिभाषा इस तरह दिया है, उसके अनुसार-विकास का अर्थ है, सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, विभिन्न संस्थाओं तथा सेवाओं की बढ़ती क्षमता जो संसाधनों का प्रयोग इस प्रकार करे जिससे कि जीवन-स्तर में अनुकूल परिवर्तन आये। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार विकास की प्रक्रिया बहुआयामी तथा बहुस्तरीय होती है।

        पर्यावरण और विकास परस्परावलंबित हैं। पर्यावरण और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं, ये खिलाफ नहीं हो सकते। पर्यावरण एक व्यापक अवधारणा है, जिसका अर्थ वायु, जल तथा मृदा से है और इन सभी घटकों का मनुष्य के साथ अंतर्संबंध है। पर्यावरण किसी देश की उन्नति विषेशकर आर्थिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक देष के विकास का एक वृहद् हिस्सा अनेक क्षेत्रों में उत्पादन से जुड़ा होता है। जल, ईधन, मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उत्पादन के अनेक क्षेत्रों में महत्व एवं आवश्यकता है। उत्पादन के परिणामस्वरूप होने वाला प्रदूषण पर्यावरण द्वारा अवशोशित कर लिया जाता है, किंतु दूसरी तरफ उत्पादन के लिए संसाधनों के अधिकाधिक दोहन के कारण पर्यावरण में संसाधनों की कमी हो जाना भी चिंता का विशय है। पर्यावरण एवं विकास से जुड़े मुद्दे वर्तमान समय में सर्वाधिक चर्चित मुद्दों मेें से एक है। वस्तुतः विकास का सीधा संबंध मनुष्य के भौतिक सुखों की प्राप्ति से है। अपने सुख की खातिर मानव ने पर्यावरण के विभिन्न घटकों या संसाधनों का उनकी क्षमता से अधिक दोहन किया और करता चला जा रहा है। मनुष्य पर्यावरण संरक्षण के सभी मापदंडों की उपेक्षा कर विकास की ओर अग्रसर हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण का विनाष हो रहा है।

        आज प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन मनुश्य के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर रहा है। ऐसी स्थिति में आवश्यकता है- आदर्श विकास की। अर्थात, विकास का वह तरीका जिससे हमारी आवश्यकताएँ भी पूरी हो जाएँ और पर्यावरण को भी बचाया जा सके। विकास के दुष्परिणामों को रोकने के लिए हमें कुछ ऐसे ठोस कदम उठाने होंगे जिसे पर्यावरण और विकास के मध्य संतुलन स्थापित हो सके।

विभिन्न शोधों पर आधारित नतीजों के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग बारह लाख लोग जहरीली हवा से मर रहे हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 15 सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में से 14 भारतीय शहर हैं। वर्ष दर वर्ष सड़कों पर बढ़ते वाहनों की संख्या और उनसे निकलने वाला धुआँ, कारखानों से निकलने वाली विशैली गैसें वायुमंडल में बेतहाशा बढ़ रही हैं। इससे साँस से संबंधित बीमारियों में तेजी-से बढ़ोत्तरी हो रही है। बढ़ता तापमान और बढ़ता कचरा पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस रफ्तार से तापमान बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से पृथ्वी पर बर्फ भी पिघलेगी। परिणामतः समुद्रों का जलस्तर ऊपर उठेगा। जलस्तर के बढ़ने से समुद्रों के किनारे बसे छोटे देश एवं टापू जलमग्न हो जाएंगे। समुद्रों के किनारे की भूमि में लवण की मात्रा बढ़ेगी, इससे कृषि-भूमि का नुकसान होगा तथा समुद्री किनारों पर पीने योग्य पानी का संकट भी गहराएगा। समुद्रों से प्राप्त होने वाले खाद्य उत्पाद के रूप में उपलब्ध जीव कम होते जाएंगे। वायुमंडल में उपस्थित जल की मात्रा भी प्रभावित होगा, इससे मौसम असमय और असंतुलित होंगे। बदलते मौसम के दुष्परिणामस्वरूप बाढ़, सूखा और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि होगी। हेमंत और बसंत जैसी मनभावन ऋतुएँ लुप्त ही हो जाएंगी। प्रकृति में होने वाले इन परिवर्तनों से मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में अन्न के उत्पादन में वृद्धि होगी तो दूसरी ओर दक्षिण एशिया के कुछ देषों में खाद्यान्न उत्पादन कम होगा। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में अन्न आयात करना पड़ेगा। पीने योग्य जल की भी कमी हो जाएगी। पानी का यह संकट भूमंडल पर रहने वाले सभी प्राणियों के जीवन को दुरूह बनाएगा। मौसम में होने वाले परिवर्तनों की वजह से नवीन बाढ़-क्षेत्र और सूखा-क्षेत्र निर्मित होंगें। इन सबका प्रभाव आर्थिक ढाँचे को हिला देगा। मंहगाई बेकाबू हो जाएगी।

        मौसम में आने वाले बदलाव के कारण पौधों और प्राणियों के पारंपरिक स्वभाव में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। पक्षी अपनी प्रकृति के अनुकूल स्थानों की ओर प्रवास कर जाएंगे, वे अपना मूल ठिकाना बदल लेंगें। कई प्रजातियाँ जो इस बदलाव में अपने आप को ढाल नहीं पाएंगी, वे सहज ही लुप्त हो जाएंगी। मनुष्य  भी तरह-तरह की बीमारियों और महामारियों की चपेट में आता रहेगा।

दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिक तथा पर्यावरणविद् इन सभी समस्याओं के लिए मनुष्य की अतिवादी भोग की गतिविधियों को उत्तरदायी मानते हैं। तापमान वृद्धि के लिए जिम्मेदार कारकों में अकेले 90 प्रतिशत योगदान तो ग्रीन हाउस से उत्सर्जित होने वाली गैसों का है। हमें अतिवादी उपभोग की प्रवृत्ति को त्यागना होगा।

सतत विकास की अवधारणा 1987 में ‘बु्रन्डलैंड कमीषन’ में उल्लिखित परिभाषा के आधार पर विश्लेषित की गई। इस परिभाशा के अनुसार- सतत विकास का अर्थ, उस विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और साथ ही भविष्य की पीढ़ी को उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त पर्याप्त संसाधनों को संरक्षित भी करता है।

वैश्विक स्तर पर पर्यावरण एवं विकास के संबंध में चर्चा 1992 में, रियो डी जेनिरों में आयोजित United Nations Conference on Environment and Development (UNCED) सम्मेलन के माध्यम से प्रकाश में आया। इसे रियो घोषणापत्र या पृथ्वी सम्मेलन-1 के नाम से भी जाना जाता है। इस सभा में राज्यों तथा मनुष्य के आर्थिक और पर्यावरणीय व्यवहार को निर्देशित करते हुए कुछ सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया। इसमें विकास को शाश्वत बनए रखने के लिए मुख्य रूप से तीन स्थितियों का उल्लेख किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-

  1. विकास की प्रक्रिया इस तरह गतिशील होनी चाहिए कि भविश्य की पीढ़ियों पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़ें। मानव को वर्तमान में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए जिससे कि वे न सिर्फ आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहें बल्कि उनके नकारात्मक प्रभावों से भी बच सकें।
  2. सभा में सतत विकास को पुष्ट करने के लिए समाज के विभिन्न वर्गो के मध्य आर्थिक विषमता को दूर करना महत्वपूर्ण माना गया। विश्व, राज्य अथवा समाज के विभिन्न वर्गों में अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को समाप्त करके सतत विकास के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इस बात को स्वीकार किया गया कि सतत विकास को प्राप्त करने के लिए धनी एवं गरीब देशों को कुशलतापूर्वक विकास के मार्ग पर बढ़ना होगा क्योंकि पर्यावरण-क्षय के लिए सभी देश जिम्मेदार हैं। धनी देशों ने जहाँ आधुनिक तकनीकी से पर्यावरण को दूषित किया है, वहीं गरीबदेष भी पर्यावरण-क्षय के लिए उत्तरदायी हैं।
  3. सतत विकास की एक अन्य दशा के अनुसार विकसित देशों से विकासशील देशों की ओर संसाधन उपभोग की तकनीकी ज्ञान का प्रसार किया जाना चाहिए। विकासशील देशों के पास संसाधन तो हैं, किंतु उनके प्रयोग करने की उन्नत तकनीक का अभाव है। जबकि विकसित देष तकनीक के मामले में समृद्ध हैं। शुष्क जनवायु में अधिक समय तक जीवित रहने वाली कृषि-प्रजाति, कुशल औद्योगिक तकनीक, ऊर्जा संसाधनों के लिए नकनीक इत्यादि विकासशील देशों को उपलब्ध होना चाहिए, जिससे वह अपना विकास कर सकें।

पृथ्वी सम्मेलन-1 (1992) में, सतत विकास का मुद्दा विचार का मुख्य बिन्दु रहा। इस सम्मेलन का उद्देष्य 21वीं सदी में पर्यावरण-संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण नियमों का एक दस्तावेज तैयार करना था, जिसे एजेंडा-21 के नाम से घोशित किया गया। सम्मेलन में सतत विकास से संबद्ध कुल 27 सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया गया, जो निम्नवत हैं-

  1. मनुष्य सतत विकास का केन्द्र बिन्दु है। वह प्रकृति के साथ अन्तर्संबंध जोड़कर स्वस्थ जीवन प्राप्त कर सकता है।
  2. संयुक्त राष्ट्र अभिलेख तथा अन्तर्राश्ट्रीय कानून के अनुसार मनुष्य अपने राजनैतिक सीमा के अन्तर्गत आने वाले संसाधनों का प्रयोग कर सकता है। किन्तु ऐसा करते समय उसे यह ध्यान रखना होगा कि उसकी संसाधन प्रयोग नीति किसी अन्य राजैतिक सीमा के पर्यावरण-क्षय का कारण न बनें।
  3. विकास तथा संसाधन प्रयोग का अधिकार न्यायपूर्ण तरीके से आबंटित हो, जिससे कि भविश्य की पीढ़ियाँ भी संसाधनों से लाभान्वित हो सके।
  4. विकास नीतियों के अन्तर्गत पर्यावरण-सुरक्षा एक मुख्य मुद्दा होना चाहिए तथा इसे पर्यावरण से पृथक नहीं रखा जाना चाहिए।
  5. सतत विकास का प्रमुख अंग गरीबी-उन्मूलन से जुड़ा है । अतः अमीर-गरीब के बीच की दूरी समाप्त किया जाना चाहिए। इसके लिए राज्य तथा इसके नागरिकों को सम्मिलित प्रयास करना चाहिए।
  6. सभी देशों की जरूरत के हिसाब से अन्तरराष्ट्रीय  पर्यावरण सुरक्षा एवं विकास का कार्यक्रम निर्धारित किया जाना चाहिए। विकासशील राष्ट्रों, विशेषकर अल्प विकसित राष्ट्र तथा वे सभी राष्ट्र जो पर्यावरणीय समस्याओं से अधिक प्रभावित हैं, उनको प्राथमिकता दिया जाना चाहिए।
  7. सभी देशों को पृथ्वी के पर्यावरण को बचाने, संरक्षित रखने तथा क्षय हो चुके संसाधनों की पुनः प्राप्ति के लिए कटिबद्ध होना चाहिये। विकसित देश पर्यावरणीय-क्षय के लिए अधिक जिम्मेदार हैं, अस्तु उन्हें पर्यावरण सरंक्षण के लिए ठोस नियम बनाना तथा उसका पालन करना चाहिए।
  8. सतत विकास के लक्ष्य को पाने के लिए देशों की जनसंख्या-विस्फोट, संसाधनों के उत्पादन एवं प्रयोग को संतुलित रखना चाहिए।
  9. सतत विकास नीति को सफल बनाने के लिए राज्य को सामान्य जनता के बीच वैज्ञानिक समझ को बढ़ाना होगा। तकनीकी आदान-प्रदान तथा नवीन तकनीकी के विकास पर बल देना होगा।
  10. सामान्य जनता की भागीदारी पर्यावरणीय मुद्दों को सुलझााने में अत्यन्त आवश्यक है। अतः प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण के विषय का ज्ञान होना चाहिए। सूचनाओं की सहभगिता और जागरूकता अभियान के माध्यम से सभी को पर्यावरण के महत्त्व की जानकारी देनी चाहिए।
  11. राज्य को सतत विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखकर पर्यावरण प्रबन्धन के ठोस नियम बनाने चाहिए।
  12. राज्य को ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक तन्त्र को समर्थन देना चाहिए जो सभी देशों में आर्थिक मजबूती एवं सतत विकास के लिए मार्ग खोलता हो। यह पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में सहायक होगा।
  13. राज्यों को पर्यावरण-क्षरण से होने वाले दुष्प्रभावों से पीड़ित लोगों की सुरक्षा के लिए नियम बनाने चाहिए।
  14. राज्य को शक्तिशाली तरीके से उन सभी कार्यों को रोकना चाहिए, जो पर्यावरण-क्षय के जिम्मेदार कारण हैं।
  15. राज्य को पूरे सामर्थ्य के साथ पर्यावरण-क्षरण के पूर्व-उपायों को अपनाना चाहिए।
  16. पर्यावरण को प्रदूशित करने वालों को दण्डित किए जाने का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रों को विशेष कानून बनाना चाहिए।
  17. राश्ट्रीय विकास के आकलन के लिए निर्धारित अंगों के अन्तर्गत पर्यावरण अधिप्रभाव आकलन को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  18. राज्यों को प्राकृतिक आपदा से संबंधित समाचार अतिशीघ्र अन्य राज्यों को प्रेषित करना चाहिए, जिससे कि प्रभावित राज्यों को शीघ्रता से सहायता पहुँच सके।
  19. राज्यों को दूसरे राज्यों के राजनैतिक सीमा क्षेत्रों के पर्यावरणीय समस्याओं के विषय में सूचित किया जाना चाहिए।
  20. सतत विकास में महिलाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः महिला सशक्तिकरण एक प्रमुख बिंदु  है।
  21. सतत विकास की सफलता एवं सुखद भविष्य के लिए युवा-वर्ग को आगे बढ़ना चाहिए। राज्य को पर्यावरण प्रबंधन की नीतियों में युवा-वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
  22. स्वदेशी अथवा स्थानीय समुदायों की पर्यावरण प्रबंधन में उल्लेखनीय भूमिका होती है। अतः राज्य को सतत विकास के कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी को दर्ज करना चाहिए।
  23. स्थानीय निवासियों के संसाधन अधिकार को उनकी आवश्यकता के अनुसार संरक्षित किया जाना चाहिए।
  24. सतत विकास की सफलता में युद्ध अवरोध उपस्थित करते हैं। अतः राज्यों के अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा सीमाओं का उल्लंघन वर्जित होना चाहिए।
  25. विकास, पर्यावरण तथा शांति एक-दूसरे के पूरक हैं। सतत विकास में गैर-सरकारी निकायों तथा अन्यान्य निकायों की साझेदारी महत्त्वपूर्ण है।
  26. राज्यों को सभी पर्यावरणीय विवादों को शांतिपूर्वक निपटाना चाहिए। सभी समस्याओं एवं संघर्षों का समाधान संयुक्त राष्ट्र के नियमानुसार होना चाहिए।
  27. जनसाधारण की भागीदारी पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास का महत्त्वपूर्ण अंग है। अतः जनसाधारण को पर्यावरण-संरक्षण में अपना पूर्ण सहयोग करना चाहिए, जिससे कि भविष्य में विकास प्रक्रिया के दुष्प्रभाव से पर्यावरण-क्षय को बचाया जा सके।

एजेंडा-21 का उद्देश्य 21वीं शताब्दी में मानव विकास के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों के भागीदारी की सार्थकता पर बल देना था। यह योजना चार चरणों में विभाजित किया गया था-

  1. आर्थिक तथा सामाजिक आयाम।
  2. सतत विकास हेतु उपलब्ध संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन।
  3. बड़े संगठनों की भूमिका में वृद्धि या विस्तार।
  4. विकास की नीतियों को लागू करने के माध्यम।

इसके पश्चात सन् 2002 में, दक्षिणी अफ्रीका के जोहान्सबर्ग नामक शहर में पृथ्वी सम्मेलन-2 का आयोजन किया गया। इसमें पिछले पृथ्वी सम्मेलन-1 के कार्यों की समीक्षा की गई। निष्कर्ष रूप में यह पाया गया कि सतत विकास की प्रक्रिया में आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं पर्यावरणीय आयाम को एक साथ जोड़कर चलने पर विकास के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इससे पूर्व उपरोक्त क्षेत्रों को अलग-अलग रखकर उन पर कार्य किया गया जो कि सतत विकास की सफलता में बाधा साबित हुआ। पृथ्वी सम्मेलन-1 में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे उनको पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सका। सम्मेलन में समाज के सभी वर्गों को विकास-प्रक्रिया से संयुक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में निम्नलिखित मुद्दे निकलकर सामने आए-

  1. सतत विकास के लक्ष्य को पाने के लिए उत्तरी एवं दक्षिणी देशों, सरकारों, समाज तथा गैर-सरकारी संगठनों के बीच विश्व स्तरीय एकता स्थापित करना।
  2. विकसित तथा विकासशील राष्ट्रों पर अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण नीतियों को लागू किया जाना चाहिए।
  3. प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए प्रत्एक व्यक्ति के उत्तरदायित्व को निर्धारित करना होगा।
  4. दक्षिणी देशों में सतत विकास लक्ष्य की सफलता के लिए उत्तरी देशों की सहभागिता को बढ़ाना चाहिए।
  5. सतत विकास में आर्थिक, सामाजिक तथा पर्यावरण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विकास का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।
  6. सतत विकास कार्यक्रमों की सफलता के लिए पर्यावरण सहयोगी तकनीकी के प्रयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  7. सतत विकास तथा व्यापार की नीतियों में सामंजस्य होना चाहिए।
  8. कचरा के निस्तारण के लिए उच्चस्तरीय प्रबंधन करना जिससे कि पर्यावरण स्वच्छ एवं हानिरहित हो सके।

सतत विकास संबंधित एक और सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र संघ के रियो डी जेनिरो ब्राजील में जून 2012 में, सम्पन्न हुआ। जेनिरो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन के 20 वर्षों के बाद होने के कारण इसका नाम रियो-प्लस 20 रखा गया। रियो-प्लस 20 सम्मेलन विश्व के समक्ष मंडरा रहे गंभीर चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित है। मानव के चारों और बढ़ता पर्यावरण संकट, विश्व स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन, असमय हो रहे मौसम परिवर्तन, ऊर्जा स्त्रोतों की चिंतनीय स्थिति, खाद्य उत्पादों का अनिश्चित भविष्य और पीने योग्य जल की गंभीर कमी सम्मेलन के विचार-विमर्श का प्रमुख मुद्दा रहा। इस सम्मेलन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  1. सतत विकास को केन्द्र में रखकर राजनैतिक प्रतिबद्धता का निर्धारण करना।
  2. पूर्व सम्मेलनों के पश्चात हुई प्रगति तथा सफलता में बाधक कारणों का विश्लेषण करना।
  3. नवीन चुनौतियों के समाधान के लिए नीति निर्धारित करना।

रियो-प्लस 20 सम्मेलन में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों को सम्मिलित किया गया-

  1. सतत विकास तथा गरीबी उपशमन हेतु ‘हरित अर्थव्यवस्था’ को बढ़ावा।
  2. सतत विकास को मद्देनज़र रखते हुए वैश्विक संस्थागत रूपरेखा को सुदृढ़ बनाना ताकि विभिन्न बहुपक्षी पर्यावरणीय समझौतों में बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।

सम्पूर्ण विकास एकांगी या परजीवी नहीं होता है। वह सदैव समग्र, सर्वोदयी और कालजयी होता है। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक, प्राकृतिक, लोकतांत्रिक मूल्यों का संतुलन उसे समग्रता प्रदान करता है। इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि पर्यावरण विकास को प्रभावित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई है। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जितनी कम होगी, विकास की राह उतनी ही दर्लभ होती जाएगी। प्रकृति एवं मनुष्य के मध्य संतुलन साधना ही इसका एकमात्र समाधान है। उपभोग घटाना, विवेकपूर्ण सदुपयोग करना तथा प्राकृतिक संसाधनों को समृद्ध करना, पर्यावरण-संरक्षण के कारगर चरण है। ‘प्रकृति के साथ और प्रकृति का विकास’ की संकल्पना के द्वारा ही समग्र विकास का स्वप्न साकार हो सकता है।

संदर्भः-

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  6. अरूण कुमार मौर्य एवं अन्य (2015), र्प्यावरण अध्ययन एक परिचय, बुक एज़ पब्लिकेषनस्, दिल्ली।
डॉ० राजेश उपाध्याय
एसोसिएट प्रोफेसर
राजनीति शास्त्र विभाग
डॉ० भीम राव अम्बेडकर महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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