मानव-समाज पर छाए हुए विपत्ति के बादलों को विच्छिन्न करने एवं अन्याय और अत्याचार के साम्राज्य का अन्त करने के लिए ईसा की सत्रहवीं शताब्दी में भारतवर्ष में एक महान् राष्ट्रनायक का जन्म हुआ, जिसने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से न केवल सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रभावित किया, वरन् करुणा, मैत्री तथा विश्व बन्धुत्व का अमर सन्देश देकर मानवमात्र की एकता एवं सभी में एक ज्योति की प्रतिष्ठा की। यह महान् नायक अन्य कोई नहीं, सिक्खों के अन्तिम सशरीर गुरु, गुरु गोविन्द सिंह थे। गुरु गोविन्द सिंह सांस्कृतिक जागरण के अग्रदूत थे। आर्य संस्कृति के प्रति उनकी दृढ़ आस्था थी। उनका सम्पूर्ण काव्य भारतीय संस्कृति के विभिन्न तत्वों का विशाल संग्रह है। अतः यहाँ पर सर्वप्रथम ‘संस्कृति’ शब्द के वास्तविक अर्थ को समझ लेना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

                ‘संस्कृति’ संस्कृत भाषा का शब्द है, जो ‘सम’ उपसर्गपूर्वक ‘कृत’ धातु से ‘क्तिन्’ प्रत्यय होने पर बना है। इसका अर्थ है – उत्तम कृति अर्थात् देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि आदि की उत्तम चेष्टाएँ। इनमें लौकिक, पारलौकिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि सभी प्रकार की उन्नति के अनुकूल चेष्टाएँ आ जाती हैं। विद्वानों के अनुसार ‘शुद्ध’ करने की क्रिया को’ संस्कृति कहा जाता है। मनुष्य को अपने जीवन को परिष्कृत करने के लिए विभिन्न प्रकार के संस्कारों को करना पड़ता है। ‘‘इस जन्म से मृत्यु पर्यन्त मानव की शुद्धि के लिए आवश्यक क्रिया-कलापों या संस्कारों की योजना को ‘संस्कृति’ कहते हैं।’’ ई.बी. टायलर के अनुसार – ‘‘संस्कृति वह जटिल समग्रता है, जिमसें ज्ञान, विश्वास, कला, आचार, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य क्षमताओं और आदतों का समावेश रहता है जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है।’’ सभी देशों एवं समाजों की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति होती है, जो उस मानव-समूह के उदात्त गुणों को सूचित करती है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है, जो विभिन्न संघर्षों से गुजरने के बाद भी अपनी विशिष्टता तथा जीवन्तता को बनाये रखने में सफल रही है। हजारों वर्षों की यात्रा करने के बावजूद भी उसकी चमक धूमिल नहीं है। प्रत्येक परिस्थिति तथा आघात की झलक को अपने में समेटे हुए वह एक रत्न की भाँति आज भी दीप्तिमान है।

                भारतीय संस्कृति में धर्म एवं अध्यात्मवाद का अपना एक विशिष्ट उच्च स्थान है। उसके अनुसार धर्म में ‘निःश्रेयस’ और ‘अभ्युदय’ दोनों की सिद्धि होती है, अर्थात् मनुष्य को अपने जीवन में आत्मिक एवं भौतिक दोनों के विकास का प्रावधान मिलता है। यही कारण है कि हमारे यहाँ के ऋषि, मुनियों ने आत्मिक विकास को महत्ता प्रदान करते हुए भी आवश्यक पड़ने पर शस्त्र धारण करने का भी उपदेश दिया है। हिन्दुओं के विभिन्न इष्टदेव-शिव, राम, कृष्ण, परशुराम, विश्वामित्र-जहाँ एक ओर मानव की आध्यात्मिक भावनाओं का परिपूर्ण करते हुए प्रतीत होते हैं, वहीं दूसरी ओर मानव-समाज पर संकट आया देख सशस्त्र संघर्ष करते हुए भी दृष्टिगोचर होते हैं। गुरु गोविन्द सिंह का संत-सिपाही रूप भारतीय संस्कृति की इसी विशिष्टता की एक कड़ी है।

                गुरु गोविन्द सिंह का युग अत्याचार, अनाचार, धर्मान्धता, अनीति, क्रूरता और दमन की कहानी कहता हुआ प्रतीत होता है। मुगल सम्राट औरगंजेब धर्मान्धतापूर्ण नीति को अपनाकर हिन्दू जनता को विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित कर रहा था। हिन्दुओं के समक्ष ही उनकी देवमूर्तियाँ तोड़ी जा रही थीं, मंदिर गिराये जा रहे थे। उन्हें बलात् इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया जा रहा था। जजिया तथा अन्य कई कर लगाकर हिन्दुओं का जीना दूभर कर दिया गया था। इन परिस्थितियों में साधु-सन्यासी तो निर्लिप्त भाव से अत्याचार सहन कर ही रहे थे, साथ ही हिन्दू राजा भी मुगल शासक के आतंक से भयभीत हो चुपचाप उनकी अधीनता स्वीकारने के लिए विवश थे। ऐसे समय में गुरु गोविन्द सिंह मानवता के मुक्तिदाता बनकर सामने आये। उन्होंने हिन्दुओं की आत्र्त वाणी सुनकर, अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया –

                ‘‘हम इह काज जगत मो आए, धरम हेतु गुरुदेव पठाए।

                जहाँ वहाँ तुम धरम बिथारो, दुष्ट दोरवीअन पकरि पछारो।

                धरम चलावन संत उबारन, दुष्ट सभन को मूल उपारन।।’’

                अत्याचारी मुगल सत्ता से टक्कर लेने के लिए उन्होंंने सैन्य संगठन करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने अपने एक-एक योद्धा को सवा-सवा लाख शत्रुओं का सामना करने के लिए शस्त्र-विद्या देना आरम्भ कर, उन्हें सिंह के समान शक्तिशाली बना दिया। अन्याय और अत्याचारों को सीमा पार करते देख उन्होंने ‘खालसा-पंथ’ की स्थापना की तथा ‘मीरी’ और ‘पीरी’ की दो तलवारें धारण कर अपने शिष्यों का मार्ग प्रशस्त किया। दशम गुरु मूलतः आध्यात्मिक व्यक्ति थे, परिस्थितियों से विवश होकर ही उन्हें शस्त्र धारण करने पड़े थे। यही कारण है कि निरन्तर लौकिक संघर्षों में व्यस्त रहते हुए भी उन्होंने पल-भर के लिए भी आलौकिक सत्ता से सम्बन्ध नहीं तोड़ा। अन्याय का विरोध करते हुए भी वे ब्रह्म की शक्ति से सदैव उपकृत रहना चाहते थे। इसीलिए धर्म-युद्ध में विजय पाने के लिए उन्होंने चण्डी-देवी से वरदान माँगा था:

‘‘वर देहि शिवा नित मोहि इहै शुभ करमन ते कबहूँ न टरों।

न डरों अरि सों जब जाइ लरों निसचै कर अपनी जीत करांे।

यह ‘सिक्ख हों आपने ही मन को इहि लालच हौं गुन तौं उचरों।

जब आयु की औधि निदान बनै अंत ही रन मैं तब जूझि मरों।।’’

                भारतीय संस्कृति के अनुरूप उन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्म के निर्गुण रूप का वर्णन ‘जापु’ एवं ‘अकाल स्तुति’ में किया है। वेदों में वर्णित ब्रह्म के ‘नीति’ स्वरूप को स्वीकारते हुए, उन्होंने ब्रह्म को रूप-रेख विहीन, अनादि, अजन्मा, अनन्त, अलेख अभेख आदि कहकर इस प्रकार सम्बोधित किया है –

                ‘‘चक्र चिन्ह अरु बरन जाति अरु पाति नहिन जिह।

                रूपरंग अरु रेख भेख कोऊ कहि न सकति किह।।’’

                इसके उपरान्त उन्होंने उसी ‘ब्रह्म’ के दयालु, कृपालु, सर्वव्यापक, शत्रुसंहारक, कुकर्मों के नाशक, दुष्टों के दमनकत्र्ता के रूप को स्मरण किया है। मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपने आस-पास उस ब्रह्म को देखना चाहता है, जो विपत्ति के समय उसकी रक्षा कर सके। दुष्टों से उसको मुक्ति दिला सके तथा उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं को पूरा कर सके, अतः वह उसके निर्गुण रूप के साथ-साथ उसके सगुण रूप में भी पूर्ण आस्था रखता है। गुरु गोविन्द सिंह ने भी ब्रह्म के निर्गुण रूप का वर्णन करने के उपरान्त उसके सगुण रूप के प्रति भी अपनी आस्था व्यक्त की है। एक ओर उन्होंने विष्णु के प्रमुख दो अवतारों – राम एवं कृष्ण के साथ-साथ अन्य अनेक अवतारों की पौराणिक गाथाओं को अपने साहित्य का मुख्य विषय बनाया है, तो दूसरी ओर ब्रह्म की शक्ति ‘चण्डी’ का वर्णन भी विस्तारपूर्वक किया है। वास्तव में रामायण, महाभारत, वेद, पुराण तथा गीता भारतीय संस्कृति के मूल धार्मिक ग्रंथ हैं। अतः इन्हीं की कथाओं और गाथाओं को अपने काव्य का मुख्य माध्यम बनाकर दशम गुरु ने भारतीय संस्कृति के ही विभिन्न तत्वों को पतनोन्मुख हिन्दू जनता में पुनः स्थापित करने की चेष्टा की। उनके जीवन एवं साहित्य-सृजन का मुख्य उद्देश्य अत्याचारी एवं दुराचारी शासकों का अन्त करके एक शान्तिप्रिय समाज की स्थापना करना था। सुप्तावस्था में पड़ी हुई हिन्दू जनता, जो अपनी शक्ति को विस्मृत कर चुकी थी, उनमें पुनः शक्ति का संचार करने तथा अपने देश एवं धर्म के रक्षार्थ शस्त्र धारण कराने के लिए गुरु गोविन्द सिंह ने उन्हीं के इष्टदेवों के असुरसंहारक रूप का वर्णन अपनी कृतियों में किया। शक्ति की प्रतीक ‘चण्डी-देवी’ के वीर रूप का उल्लेख कवि ने अपनी तीन कृतियों-‘चण्डी-चरित्र उक्ति विलास’, ‘चण्डी-चरित्र द्वितीय’ तथा ‘चण्डी दो वार’- में मुख्य रूप से किया है। उनके असुरसंहारक रूप का वर्णन करते हुए वे कहते हैं –

‘‘कान सुनि धुनि देवन की सब दावन मारन को प्रन कीनौ।

है कै प्रतच्छ महावर-चण्डि सु क्रुद्ध है जुद्ध विषै मन दीनौ।

भाल कौ फोरि कै काली भई लखि ता छवि कौं कवि को मन मीनौ।

दैत समूह विनासन कौ जमराज तैं मृत्यु मनौ भव लीनौ।’’

                विष्णु के अवतार – कृष्ण जो लोकरक्षक के साथ-साथ लोकरंजन के भी प्रतीक माने जाते हैं, के वीर कृत्यों का वर्णन कर कवि ये सिद्ध करना चाहते थे कि जिस प्रकार उन्होंने धर्म की स्थापना तथा अधर्म के नाश के लिए शस्त्र धारण किये थे, उसी प्रकार मानव के लिए आज भी शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्र धारण करना आवश्यक हो गया है। जैसे अन्याय एवं अत्याचार करना पाप है, वैसे ही चुपचाप अन्यायों को सहना भी अहित कर है। दशम गुरु ने एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की स्थापना करने के लिए ही पौराणिक वीर-गाथाओं का गान किया था –

                ‘‘दसम कथा भागौत की, भाषा करी बनाइ।

                अवर वासना नाहि प्रभु, धरम जुध के चाइ।’’

                भारतीय संस्कृति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है – गुरु की महत्ता। हिन्दू समाज में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान प्राप्त हुआ। गुरु की कृपा प्राप्त किये बिना भगवत्कृपा प्राप्त होना असम्भव प्रायः माना जाता है। गुरु ही मनुष्य को अज्ञान की खाईं से निकाल कर भगवत्प्रेम की ओर उन्मुख करता है। गुरु गोविन्द सिंह भी गुरु के इस महत्व से भली भाँति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने अपने समय में गुरु-गद्दी प्राप्त करने के लिए बढ़ते हुए संघर्षों को देखकर ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ को ही गुरु-पद प्रदान कर दिया था-

                ‘‘आगिया भई अकाल की तबै चलायो पंथ।

                सब सिक्खन को हुक्म है गुरु मानियो ग्रन्थ।।’’

                वास्तविक गुरु वही होता है जो मानव को समय एवं परिस्थिति के अनुकूल कर्म करने के लिए प्रेरित करे, बाह्याडम्बरों एवं मिथ्याचारों से विमुक्त कर, प्रभु के नाम स्मरण, कीर्तन तथा श्रवण के महत्व को प्रतिष्ठित करे। इस दृष्टि से गुरु गोविन्द सिंह एक सच्चे गुरु सिद्ध होते हैं। उन्होंने ईश्वर को अपना गुरु घोषित कर, मनुष्य को सद्कर्मों की ओर प्रेरित किया। एक ओर उन्हांेने अत्याचारी शासकों के विरुद्ध शस्त्र उठाने का उपदेश दिया तो दूसरी ओर सदैव ब्रह्म नाम स्मरण करते रहने का संदेश दिया। ‘जाप’ करने की पद्धति के अनुरूप उन्होंने अपनी कृति ‘जापु’ की रचना की। ‘जापु’ में सर्वत्र ब्रह्म नाम की सार्थकता ही सिद्ध की गई है –

नमसत्वं अकाले। नमसत्वं क्रिपाले। नमसत्वं अरूपे। नमसत्वं अनूपे।

नमसतं अभेखे। नमसतं अलेखे। नमसतं अकाए। नमसतं अलाए।।

                बाह्याचारों एवं मिथ्याचारों का खण्डन भी उन्होेंने यत्र-तत्र किया है। वे ईश्वर और अल्लाह, पुराण और कुरान में एक ही सार्वभौमिक सत्य को स्वीकार करते हैं। अतः दक्षिण ओर पश्चिम दिशाओं में शीश नवाने के स्थान पर परमात्मा के वास्तविक रहस्य को जानने एवं भक्ति द्वारा उसे प्राप्त करने का संदेश देते हैं –

‘‘काहू लै पाहन पूज धरो सिर काहू लै लिंगु गरे लटकायो।

काहू लख्यो हरि अबाची दिसा महि काहू पछाह को सीस निबायो।

कोऊ बुतान को पूजत है पसु कोऊ भितान कौ पूजन धायो।

क्रूरक्रिआ उरझयो सभ ही जग स्त्री भगवान् को भेदु न पायो।’’

                वे परब्रह्म के अतिरिक्त अनन्त तीर्थ स्थानों, योग, जन्म-मन्त्र, संयम, व्रत, नियम, संन्यास, वैराग्य आदि सभी को भ्रम मानते हैं। भावनाहीन तथा विषम कामनाओं में आसक्त जीव जिन व्रत, यज्ञ आदि साधनों को ग्रहण करता है, वे उसे ईश्वर के समीप न ले जाकर भौतिक जगत् की ओर ही ले जाते हैं। काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि को वे साधक के सबसे बड़े शत्रु मानते हैं, अतः सदैव उनसे दूर रहने का ही उपदेश देते हैं –

                ‘‘काम-क्रोध-हंकार-हठ-मोह न मन सों ल्यावै।

                तबही आतम तत को दरसे परम पुरख कह पावै।।’’

                इस प्रकार गुरु गोविन्द सिंह एक सच्चे गुरु की भांति ईश्वर भजन एवं स्मरण का उपदेश देकर जीवन को परमात्मा का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने वाले अमर गुरु हैं। उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं था। वे जो उपदेश शिष्यों को देते थे, उन्हें अपने वास्तविक जीवन में कार्यान्वित भी करते थे। ‘‘धरम हेतु गुरुदेव पठाए’’ कहकर वे गुरु की महत्ता ही प्रतिपादित करते हैं।

                भारतीय संस्कृति आशावादी दृष्टिकोण को अपनाकर ही फलीभूत हुई है। यही कारण है कि यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति विषम-से-विषम परिस्थितियों में भी आशा की डोर को सदैव बाँधे रखता है। गुरु गोविन्द सिंह को भी अपने जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी भी निराशावादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया। अपने सैनिकों में भी आशा एवं आस्था को दृढ़ करने के लिए उन्होंने अनेक पौराणिक गाथाओं को सरल-सरस वाणी में दोहराया। इष्टदेवी-देवताओं की कथाओं को सुनकर भारतीय जन जागृत हो गया और विजय-प्राप्ति की आशा से उसका हृदय आप्लावित हो उठा। भारतीय संस्कृति के अनुरूप वे केवल कर्म करते रहने में विश्वास रखते थे, इसीलिए अपने जीवन के अन्तिम समय तक वे अपने शत्रुओं से लड़ते रहे। अपने चारों पुत्रों के बलिदान से वे क्षुब्ध जरूर हुए किन्तु सफलता की आशा ने उन्हें अपने कत्र्तव्य-कर्म से कभी विमुख नहीं होने दिया।

                भारतीय संस्कृति की अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं-करुणा, मैत्री, परोपकार, परदुःखकातरता, क्षमा, त्याग तथा मानवमात्र की एकता में विश्वास। गुरु गोविन्द सिंह के व्यक्तित्व में ये सभी विशेषताएँ अभिन्न रूप से विद्यमान थीं। इन्हीं से प्रेरित हो उन्होंने अपने शिष्यों तथा सेवकों को यह आदेश दिया हुआ था कि घायल व्यक्ति किसी भी पक्ष, वर्ग एवं जाति का हो, उसकी सुचारू ढंग से सेवा की जाए। शत्रु एवं मित्र का भेद मिटाकर सभी व्यक्तियों का उपचार किया जाए तथा उन्हें जल पिलाया जाए। वे मानव-मात्र की एकता में विश्वास रखते थे, किसी को छोटा या बड़ा नहीं स्वीकार करते थे-

                ‘‘कोऊ भयो मुंडिया सनिआसी कोउ जोगी भइउ,

                कोई ब्रह्मचारी कोउ जति अनुमानबो।।

                हिन्दू तुरक कोऊ राफजी इमाम शफी,

                मानस की जात सबै एकै पहचानबो।।’’

                गुरु साहब जाति-पाँति, ऊँच-नीच का भेदभाव भी स्वीकार नहीं करते। मध्यकालीन समाज में विभिन्न जातियों एवं वर्गों ने अपने-आपको कुछ विशिष्ट नियमों में आबद्ध किया हुआ था। जो व्यक्ति उन नियमों का उल्लंघन करता था, उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। दशम गुरु ने इस रूढ़िगत बन्धन को समाप्त करने के लिए ‘लंगर-प्रथा’ आरम्भ की, जिसमें सभी जातियों, समुदायों एवं वर्गों के लोग सम्मिलित भोजन करते थे। गुरु गोविन्द सिंह समाज के सुचारु संचालन के लिए वर्णाश्रम-व्यवस्था को आवश्यक तो मानते थे, किंतु उन्हें इन वर्णों का जन्मगत आधार स्वीकार न होकर कर्मगत आधार ही स्वीकृत था। उन्होंने यह घोषणा की थी कि जो वीरता के कार्य करेगा वही क्षत्रिय कहलाएगा। खालसा-पंथ में उन्होंने जिन पंच प्यारों का निर्माण किया था, उसमें केवल एक खत्री था, शेष चार निम्न जाति के थे। हिम्मत राय एक रसोइया था, मोहकम चन्द्र एक धोबी था, साहब चंद्र नाई था तथा धर्मदास जाट था। जाति भेद को दूर करने का यह प्रयास उन्हें एक महामानवता का रूप प्रदान कर देता है।

                भारतीय संस्कृति अपने शत्रुओं के गुणों की भी प्रशंसा करने की शिक्षा देती है। वह पापी, अत्याचारी व्यक्तियों से घृणा करना नहीं सिखाती, अपितु उसके अवगुणों से घृणा करने एवं उनसे दूर रहने का संकेत देती है। वह शत्रुओं को उनके दुर्गुणों से परिचित कराने एवं उन्हें सुधारने का मार्ग प्रस्तुत करती है। इसी विशेषता को दृष्टि में रखते हुए गुरु गोविन्द सिंह ने जफरनामा का आरम्भ इष्टदेव के स्मरण से कर औरंगजेब द्वारा किये गये विश्वासघात की कड़ी आलोचना की है। उसे परमात्मा की शक्ति से परिचित कर सद्गुणों को अपनाने एवं धर्मान्धतापूर्ण नीति को त्यागने का उपदेश दिया है –

                ‘‘मजन तेग बर खूंन कस बेदरेग।

                तुरा नीज खूँ असत बा चरख तेग।

                तु गाफल म सौ मरद यजदाँ हिरास।

                कि ओ बेनिआज असतु ओ बे सुपास।’’

अर्थात् औरंगजेब तू किसी का खून करने के लिए निःसंकोच होकर तलवार मत चला। आकाशीय तलवार से तेरा रक्त भी बहना है। हे मनुष्य! तू लापरवाह मत हो और खुदा से डर। वह बेपरवाह है, खुशामदों से परे है। भारतीय संस्कृति के अनुरूप अत्याचार का डट कर सामना करने का साहस ही उन्हें अधर्मियों के अहंकार मर्दन के लिए प्रेरित करता रहा था। यही कारण है कि वे औरंगजेब जैसे शक्तिशाली एवं आतंककारी शासक को फटकारने से भी पीछे नहीं रहे।

                उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति के विभिन्न तत्व उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे। इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति उनके साहित्य में दृष्टिगोचर होती है। उनका साहित्य जहाँ एक ओर वीर पौराणिक गाथाओं से गुंथा हुआ है, वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के अमूल्य तत्वों से अनुस्यूत है। पटना से आनन्दपुर आते समय विभिन्न धार्मिक स्थलों की यात्रा करके उन्होंने हिन्दू संस्कृति के तत्वों को अपने मन-मस्तिष्क में प्रतिष्ठित करना आरम्भ कर दिया था। गुरु गद्दी प्राप्त करने के उपरान्त इन्हीं तत्वों को अपने शिष्यों तथा सहयोगियों में विकसित करने के लिए उन्होंने वेद, पुराण, गीता, महाभारत, रामायण आदि धार्मिक ग्रंथों के अनुवाद करवाए। यही कारण है कि उनका सम्पूर्ण साहित्य भारतीय संस्कृति की कहानी कहता हुआ दृष्टिगोचर होता है। यदि आज हम उनके दर्शाये मार्ग पर चलकर प्रगति की ओर अग्रसर हों, अज्ञान की खाई में गिरने की अपेक्षा ज्ञान के मार्ग को ग्रहण करें, तो सम्भव है कि हम सब एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की स्थापना में अपना-अपना कुछ सहयोग दे सकें। यही उस अमर संत गुरु के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

डाॅ. ममता सिंगला
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
भगिनी निवेदिता काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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