प्रसिद्ध रंगकर्मी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्रराज अंकुर से ऋतु रानी की आत्मीय बातचीत

हबीब तनवीर के नाटकों का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए– देवेन्द्रराज अंकुर प्रश्न. समकालीन रंगमंच के परिदृश्य पर हबीब तनवीर की लोक चेतना को एक रंगकर्मी के रूप में आप किस […]

भक्ति आंदोलन में अलवर की दयाबाई का महत्व  – डॉ. रूपा सिंह

सभ्यता के आरंभ से ही आम जनजीवन में स्वर्ण सबसे मूल्यांकन धातू माना गया है। अतएव किसी भी उपलब्धि अथवा उपयोगिता का मूल्यांकन जब सोने को मापदंड मानकर किया जाता […]

संस्कार में सांस्कृतिक संघर्ष – अमृत कुमार

डॉ. उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति (यू.आर.अनंतमूर्ति) द्वारा रचित उपन्यास ‘संस्कार’ मूल रूप से कन्नड़ भाषा में रचित है। ‘चन्द्रकांता कुसनूर’ ने इसका हिंदी अनुवाद किया है। जब यह उपन्यास सन् 1965 ई. में कन्नड़ […]

संत साहित्य और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी- कुमारी किरण त्रिपाठी

आधुनिककाल के प्रमुख आलोचक हैं. इन्होंने मध्यकालीन हिंदी साहित्य को अपनी आलोचना का विषय बनाया, जिसमें सर्वाधिक महत्व संत साहित्य को दिया. ‘नव निबंध ‘, ‘हिंदी काव्यधारा में प्रेम प्रवाह’, ‘मध्यकालीन प्रेम साधना’, ‘कबीर साहित्य की परख’, ‘संत साहित्य की परख’, ‘संत साहित्य की भूमिका’, ‘संत काव्य’, ‘संत साहित्य की रूपरेखा’, ‘संत साहित्य के प्रेरणास्रोत’, ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’, इत्यादि के द्वारा हिंदी आलोचना को समृद्ध करने में योगदान दिया. इनसे पूर्व भी संत साहित्य पर आलोचनात्मक कार्य हो चुके हैं परंतु किसी का भी अध्ययन इतना गहन वव्यापक नजर नहीं आता. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि संतो के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित दिखाई पड़ती हैं. सगुण भक्ति को अत्यधिक महत्व देने के कारण शुक्ल जी निर्गुण संतो का मूल्याङ्कन निष्पक्ष होकरनहीं कर पाये हैं. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कबीरदास को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करते हैं और इसी माध्यम से संत साहित्य को भी हिंदी साहित्य में स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त करते हैं.वे उनकी साधना पद्धति पर लगे विदेशी प्रभाव के आरोप का खंडन अपनी परम्परावादी दृष्टि से करते हैं तथा उसे प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय परंपरा का अंग सिद्ध करते हैं. संत साहित्य के परिप्रेक्ष्य में सबसेसंतुलित  दृष्टिकोण आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का ही दिखाई देता है. ये सर्वाधिक भिन्न दृष्टिकोण से मध्यकालीन संत साहित्य का मूल्याङ्कन करते हैं. इनकी आलोचना दृस्टि किसी भी परंपरा या पूर्वाग्रह से मुक्त है.नर्मदेश्वर चतुर्वेदी के शब्दो में ” विद्वान् लेखक ने संत साहित्य का अध्ययन परंपरागत पद्धति की लीक से हटकर पूर्वाग्रह रहित स्वतंत्र दृष्टि से की है.”1 इन्होंने तटस्थ होकर शोधपरक व वैज्ञानिक दृष्टि का सहारालेकर संत साहित्य का अध्ययन किया है. इस क्षेत्र में इनके अप्रतिम योगदान के सन्दर्भ में नर्मदेश्वर चतुर्वेदी ने कहा है- ” अग्रज श्री आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने बड़ी धुन एवं लगन के साथ-साथ संत साहित्य केविविध अंगो तथा अवयवों को उजागर किया है.”2 इन्होंने संत साहित्य के उस अंग को अपनी आलोचना का विषय बनाया जिसको कतिपय आलोचकों ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया इनकी आलोचना अन्य आलोचकों कीभांति मध्यकालीन संत कवियों की केवल सामाजिकता की भावना तथा विद्रोह तक ही सिमित नहीं है वरन उनके कवित्व पर भी व्यापक प्रकाश डाला है. इन्होंने संतों के संगठन और पंथ निर्माण की प्रवृत्ति तथा संतसाहित्य को विकसित करने वाले तत्वों का भी सम्यक अध्ययन किया है.             आचार्य परशुराम चतुर्वेदी हिंदी संत साहित्य का अध्ययन तत्कालीन समय में प्रचलित अन्य काव्य प्रवृत्तियों से समता या भिन्नता दर्शाने के लिए नहीं कर रहे थे, बल्कि संत परंपरा में समय-समय परआने वाले बदलाव की विवेचना करना इनका ध्येय था. इसलिए उन्होंने हिंदी साहित्य के प्रचलित कल विभाजन के अनुसार मध्यकालीन साहित्य का अध्ययन करने की अपेक्षा अपनी वैज्ञानिके दृष्टि का परिचय देते हुएसंत परंपरा का नया काल विभाजन प्रस्तुत करते हैं जो इस प्रकार है- (१) प्रारंभिक युग- सं. १२०० – १५५० वि. (२) मध्ययुग ( पूर्वार्ध )- सं. १५५० – १७००वि. (३) मध्ययुग ( उत्तरार्ध ) – सं. १७०० – १८५०वि. (४) आधुनिक युग – सं. १८५०वि. –                     यह कल विभाजन हिंदी साहित्य के काल विभाजन से थोड़ा भिन्न है. जैसा कि स्पष्ट है आचार्य चतुर्वेदी संत परंपरा की शुरुआत सं. १२००वि. से मानते हैं लेकिन इन्होंने संत परंपरा की वास्तविक शुरुआत कबीरदास से माना है जिनका समय पंद्रहवी शताब्दी में पड़ता है. इनके पहले के संतों को ये पथ प्रदर्शक मात्र के रूप में देखते हैं – ” दो सौ वर्षो तक के संत अधिकतर पथ – प्रदर्शक के रूप में हीआते हुए दीख पड़ते हैं. विक्रम की पंद्रहवीं शताब्दी में कबीर साहब का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने सर्वप्रथम संत – मत के निश्चित सिद्धांतों के प्रचार – प्रसार, विस्तार के साथ एवं  स्पष्ट शब्दों में आरम्भ किया.”3इनके द्वारा किया गया यह काल विभाजन मनमाना नहीं है. संत परंपरा में आने वाले बदलावों को ध्यान में रखकर यह काल विभाजन किया गया है. यह बदलाव संप्रदाय व संगठन बनाने की पवृत्ति, संत मत केप्रचार प्रसार में आने वाले परिवर्तन, विषय व कथन शैली में आने वाले परिवर्तनों के आधार पर किया गया है. प्रारंभिक युग में जयदेव से लेकर धन्ना तक के सभी संत आ जाते हैं. इस काल के संतों ने संप्रदाय वसंगठन बनाने की प्रवृत्तियों का विरोध किया व अपनी सच्ची अनुभूतियों का वर्णन अपनी मातृभाषा में बिना किसी लाग – लपेट के की.           मध्ययुग ( पूर्वार्द्ध ) में जम्भनाथ, गुरु नानक, शेख फरीद, गुरु अंगद, गुरु अमरदास, संत सिंगा जी, भीषण जी, रामदास, धर्मदास, दादूदयाल, गुरु अर्जुनदेव, संत गरीबदास, हरिदास निरंजनी, इत्यादिप्रसिद्ध संत हुए . यह काल प्रारंभिक युग से कई बातों में भिन्न है. प्रारंभिक युग में संत मत का प्रधान केंद्र कशी हुआ करता था जिसका स्थान इस काल में पंजाब ने ले लिया. इस युग की सबसे बड़ी विशेषता यह हैकी इस समय संतों की बनियों को लिखित रूप में सुरक्षित रखा जाने लगा और पंथ निर्माण की प्रारंभिक झलक मिलने लगती है. गुरु नानक ने अपने वचनों के प्रसार के लिए पंथ बनाया, दादूदयाल का ‘दादूपंथ’  (राजस्थान), मध्य प्रदेश में ‘कबीरपंथ’, ‘उत्तर प्रदेश में ‘मलूकपंथ’, तथा राजस्थान में संत जम्भनाथ द्वारा ‘विश्नोई संप्रदाय’ की स्थापना.            मध्ययुग ( पूर्वार्द्ध ) में प्रचार कार्य में वृद्धि हुई. चतुर्वेदी जी संतों की विभिन्न पंथों व सम्प्रदायों के विषय में शोधपरक दृष्टि से अध्ययन करते हैं तथा यह सिद्ध करते हैं कि इस काल में सम्प्रदियकताजैसे तत्व हावी हो गए थे. चतुर्वेदी जी के अनुसार संतों ने इस काल में स्वयं को सगुण के अवतारवाद से जोड़ा जससे सभी धर्मों की एकसामान बातों की ओर सबका ध्यान गया. सांप्रदायिकता व भिन्नता जैसे तत्वों केप्रवेश के बाद भी संतों ने अपने मौलिक उद्देश्य को कभी नहीं छोड़ा. इस समय हिंदी साहित्य में रीतिकालीन शृंगारपरक रचनाएं बहुतायत में हो रही थी और शब्दों के सजावटी उपकरणों का प्रयोग बहुत बढ़ गया थाजिससे इस युग का संत साहित्य भी प्रभावित हुआ और साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट काव्य इस युग में लिखे गए. इस युग में सुन्दरदास जैसे संत कवि विषय व कथन शैली दोनों को पर्याप्त महत्व देते हैं. आचार्यपरशुराम चतुर्वेदी ने इस काल की व्याख्या निम्न शब्दों में करते हैं- ” यह काल संतों में समन्वय की प्रवृत्ति, साम्प्रदायिकता की भावना तथा साहित्यिक अभिरुचि में वृद्धि आ जाने के कारण विविध साहित्य निर्माण कीदृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया और यह संत- साहित्य का स्वर्णयुग कहलाने योग्य हैं”4 लेकिन, इसी के साथ वे आगे यह भी कहते हैं की कथन शैली की दृष्टि से यह काल कितना ही उत्कृष्ट क्यों न हो सहृदयता और सरलता के मामले में वह भक्तिकालीन संत साहित्य की बराबरी नही कर सकता. वे कहते हैं-“यदि संतों की ऊँची पहुँच, कदापि उनके हृदय की सरलता और भाव गाम्भीर्य के ही विचार से देखा जाये तोयह काल पूर्वार्द्ध से बढ़ाकर कदापि नहीं कहा जाएगा.”5           आचार्य चतुर्वेदी के काल विभाजन के अनुसार संत साहित्य का आधुनिक काल सं. १८५०वि. से होता है जो अंग्रेजों के आगमन का काल है. इस काल का संत साहित्य तत्कालीन समाज – सुधार आंदोलनोंसे प्रभावित रहा हो इससे इंकार नहीं किया जा सकता. इन प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण हमें इनकी आलोचना में नहीं मिलता परंतु इन्होंने इन सामाजिक- धार्मिक सुधार आंदोलनों का प्रभाव संत साहित्य पर स्वीकारकिया है. इस काल के संत साहित्य की विशेषता आचार्य जी ने इन शब्दों में व्यक्त की है-” इस काल के संतों की कृतियों में संतुलित विचारों के साथ- साथ एक अपूर्व गाम्भीर्य एवं भावोन्माद भी लक्षित होता है जोअत्यंत गहन व पक्की अनिभूति के कारण संभव हो सकता है और जिससे आकृष्ट व प्रभावित हो जन कुछ भी कठिन नहीं है.”6 इनके द्वारा इस काल के संत कवियों की भाव, विषय व कथन की तुलना कबीर आदिसंतों से किया गया है.           आचार्य चतुर्वेदी जी ने हिंदी संत साहित्य को संत कवियों की व्यक्तिगत अनुभूति का साहित्य मानते हैं जिसमें मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का चित्रण मिलता है. इसमें आदर्श को व्यवहार में लाने की बात कीजाती है और किसी भी प्रकार की कृत्रिमता लक्षित नहीं होती. “संत साहित्य का मुख्य उद्देश्य मनुष्य मात्र की मूल प्रवृत्ति को भावधारा से निमग्न कर देना रहा है जिससे मानव जीवन में चरितार्थ किया जाय.”7 इसकाल का संत साहित्य अपने काल में प्रचलित साहित्यिक प्रवृत्तियों से तो प्रभावित रहा ही हैं साथ ही नाथ, सिद्ध, वैष्णव, सूफी, आदि से भी प्रभावित रहा है. ” संतों ने सांसारिक विडंबनाओं के विषय में कथन करतेसमय उसे पूर्ण रूप से अपनाया. इन्होंने सिद्धों, मुनियों तथा नाथपंथियों की भांति सर्वजन सुलभ प्रतीकों का सहारा लेने तथा जन – भाषा में ही सब कुछ कह डालने की प्रणाली को अंगीकार किया.”8 इसी प्रकार भक्तिपद्धति में वैष्णव व सूफियों का प्रभाव पड़ा है. दाम्पत्य भाव की उपासना या साधना पद्धति में चतुर्वेदी जी संत कवियों पर सूफियों का प्रभाव देखते हैं, परंतु उसमें ऐसे तत्त्व भी है जो संतों को सूफियों से भिन्न वभारतीय ठहराते हैं. जैसे सूफियों को अपने आराध्य को स्त्री रूप में मनना तथा सूफियों का अपनी भक्ति- भावना की अभिव्यक्ति के लिए प्रेम कथा जैसे प्रतीकों का प्रयोग तथा संत कवियों में परकीया प्रेम के स्थान परपतिव्रत की भावना देखने को मिलती है, […]

मोहन राकेश के नाटकों में समय और समाज – राकेश डबरिया

कोई भी कृतिकार सामान्यजन से इस अर्थ में विशिष्ट होता है कि वह अपने समय एवं समाज को सूक्ष्मता से पहचानते हुए उसकी विसंगतियों को अपनी रचनाओं में दर्ज करता […]

समकालीनता के दौर में हिंदी उपन्यासों में आई चेतना और प्रतिरोध – मनीष कनौजिया

भारत में उपन्यास विधा की शुरूआत पाश्चात्य शिक्षण, साहित्य और संस्कृति का देश के प्राचीन साहित्य और संस्कृति के साथ संयोग होने पर हुई। इस तरह जो नए साहित्य के स्वरूप […]

विद्यापति का सौंदर्य वर्णन: विशेष संदर्भ (पदावली) – ललन कुमार

संस्कृत के आलोचकों ने सौंदर्य को इस प्रकार परिभाषित किया है- ‘सुन्दरस्य भावः सौंदर्यम्’। अर्थात् सुन्दर के भाव को सौंदर्य कहते हैं। सौंदर्य अपने मूल चरित्र में नयनधर्मी होता है। आँखिन देखी सौंदर्य कानों से सुनी सुन्दरता के बखान से कई गुणा प्रभावी होता है। प्लेटो ने सौंदर्य की परिभाषा करते हुए कहा है- ‘अगर कोई वस्तु सुन्दर है तो इसका केवल एक कारण हो सकता है कि वह अत्यंत सुन्दर है। सौंदर्य की व्याख्या नहीं हो सकती, उसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता, वह अनुभव की वस्तु है, उसमें रमा जा सकता है। सौंदर्य वस्तु का नहीं अपितु व्यक्ति का धर्म है, जो इसे सोचता है, समझता है।’ अतः यह कहा जा सकता है कि सौंदर्य मूलतः व्यक्तिनिष्ठ होता है। यह द्रष्टा या प्रेक्षक की चेतना पर निर्भर करता है। सौंदर्य वर्णन की परम्परा बहुत पहले से संस्कृत साहित्य से चली आ रही है। कालिदास संस्कृत साहित्य में सौंदर्य के शिखर कवि हैं। इनके बाद जयदेव आते हैं। मधुर कोमलकांत पदावली के गायक जयदेव ने ‘गीतगोविंद’ के प्रथम पृष्ठ पर ही पाठकों के लिए दो शर्तेंरखी है- पहला, ‘पाठक का मन हरिस्मरण में प्रसन्न होता है’ और दूसरा यह कि ‘कामकला में कुतूहल हो।’ यही वह प्रस्थान बिन्दु है जहाँ से हरिस्मरण और कामकला-कुतूहल की दो धाराओं का संगम होता है।यही मिश्रित धारा आनेवाले युग के साहित्य को दूर तक प्रभावित करती है। इस रूप में जयदेव यदि काव्य परम्परा में भक्ति और शृंगार के बीच की खाई को पाटने का काम करते हैं तो विद्यापति उनके उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़कर इस समतल काव्यभूमि पर लोकसाहित्य का विशाल महल खड़ा करते हैं। विद्यापति का काव्य प्रेम का काव्य है। प्रेम का मूल प्रेरक तत्व है- सौंदर्य। सौंदर्य का आश्रय है- यौवन।यौवन और सौंदर्य का समन्वित रूप ही प्रेम या रति है। सौंदर्य इन्द्रियों के माध्यम से उतरकर देखनेवाले के मन पर प्रभाव छोड़ता है। सौंदर्य दो तरह के हैं- बाह्य और अंतः। विद्यापति इन दोनों के वर्णन में कुशल हैं।विद्यापति की पदावली में भक्ति और शृंगार दोनों है, लेकिन परिमाण के स्तर पर शृंगारिक पद ही ज्यादा है।निराला ने पदावली की मादकता को ‘नागिन की लहर’ कहा है।इसमें राधा और कृष्ण के प्रेम तथा उनके अपूर्व सौंदर्य चित्रों की भरमार है।पदावली का केन्द्रीय विषय प्रेम और सौंदर्य है। इन पदों में माधव, राधा, कृष्ण, कन्हाई, गिरिधर आदि नाम आए हैं, लेकिन ये प्रतीक मात्र है। अंतर्वस्तु के धरातल पर विद्यापति की नायक-नायिका किसी पारलौकिक ईश्वरीय सत्ता का प्रतिनिधि न होकर ठेठ मिथिला समाज के साधारण युवक औरयुवतीहै।धर्मसत्ता और राजसत्ता के गलियारे से कवि संवेदना को सुरक्षित निकालकर वे लोक से जुड़ते हैं।लोक से जुड़ने के क्रम में वे सामान्य युवती के सौंदर्य का, उसके लज्जाशील क्रिया-व्यापारों का, उसके सहज चपलता का बारीकी से चित्रण करते हैं। विद्यापति के काव्य में एक ओर मांसल सौंदर्य का वर्णन है, तो दूसरी ओर सामाजिक आचार-विचार और  व्यावहारिक  ज्ञान […]

गुजराती कहानी ‘सगी माँ’ का हिंदी अनुवाद- अनुवादक : डॉ.रजनीकांत एस.शाह

नन्हा सा कुसुमायुध आज चिंतामिश्रित आनंद का अनुभव कर रहा अच्छे वस्त्रों में सज्जित था। अच्छी लगे ऐसी मुस्कराहट बिखेर रही कोई युवती घर में घूम रही थी। कुसुमायुध अपने […]

गुलाम मंडी: किन्नर संवेदना, अस्मिता और अधिकार – पार्वती कुमारी

हिजड़ा शब्द फारसी के ‘हीज‘ तथा हिंदी के स्वर्थिक प्रत्यय ‘ड़ा‘ से मिलकर बना है, जो पुल्लिंग संज्ञा है। इसे न तो स्त्री और न पुरुष के अर्थ में प्रयोग […]

कोरजा (मेहरून्निसा परवेज) : स्त्री जीवन की त्रासदी का आख्यान – आरती

मेहरून्निसा परवेज हिंदी की चर्चित कथाकार है। सातवें दशक से ही वह निरंतर साहित्य-सृजन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। हाशिये का समाज उनकी रचनाओं के केंद्र में रहा है। […]