हाल के दशकों में राज्यव्यवस्थाओं का वैधीकरण इतिहासकारों के मध्य विशेष रूचि का विषय बनकर उभरा है। इस रुचि की नींव इस एहसास में जमी है कि राज्यव्यवस्थाओं का अस्तित्व मात्र दक्ष शासकों एवं उनकी अवपीड़क शक्तियों के चलते ही संभव नहीं हो पाता बल्कि उसके लिए उनके शासन की सामान्य जनों में स्वीकार्यता भी आवश्यक होती है। इसके लिए आवश्यक है कि शासक अपने शासन को सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं में स्थापित दिखाएँ एवं शासक स्वयं एक आदर्श व्यवस्था के रक्षक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करे। भारत जैसे विविधता-युक्त देश में ऐतिहासिक विकास के चरणों में क्षेत्रगत विभिन्नता के दर्शन होते हैं। फलस्वरूप विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में अलग-अलग वैचारिक आधारों वाले राज्यों का अस्तित्व दिखता है जिन्होने वैधीकरण की अलग-अलग युक्तियाँ अपनाईं। इतना ही नहीं वैधीकरण की युक्तियों का एक अन्य निर्धारक तत्व राज्य विशेष का विकास-चरण भी होता था। उदाहरण के लिए आरंभिक मध्यकाल में विशाल साम्राज्यों में वैधीकरण की युक्तियाँ न केवल आरंभिक ऐतिहासिक राज्यों द्वारा अपनाई गई वैधीकरण की युक्तियों से अलग थीं बल्कि उनके स्वयं के समकालिक ‘स्थानीय’ एवं ‘परा-स्थानीय’ राज्यों में अपनाई जाने वाली युक्तियों की तुलना में भी जटिल प्रकृति की थी।

प्रस्तुत शोध-पत्र आरंभिक भारतीय राज्यव्यवस्था पर इतिहास-लेखन की उपरोक्त प्रवृत्ति के प्रकाश में आरंभिक कदंब राज्य में वैधीकरण की युक्तियों एवं उनके सामाजिक-वैचारिक आधारों का अध्ययन है।[1] यह राज्य चौथी शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी कर्नाटक में उदित हुआ तथा सातवीं शताब्दी के आरंभ तक अस्तित्व में रहा। इसकी राजधानी वैजयंती (उत्तरी कनारा जिला, कर्नाटक) थी। इस राज्य का वास्तविक संस्थापक वीरशर्मन (शासनकाल 305-310 ई.) था किन्तु यह राज्य उसके पौत्र मयूरवर्मन के शासन काल (325-360 ई.) में ही एक विशिष्ट पहचान प्राप्त कर पाया। यह पहला ऐसा परा-स्थानीय राज्य था जिसका सत्ता केंद्र इस क्षेत्र में ही स्थित था। यद्यपि इससे पहले भी यह क्षेत्र पहले मौर्य साम्राज्य एवं बाद में सातवाहन साम्राज्य का अंग रहा था किन्तु यहाँ प्रथम देशज राज्य की स्थापना आरंभिक कदंब शासकों के अधीन ही हो पाई।

उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन दर्शाता है कि कदंब राज्य का निर्माण राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक प्रक्रियाओं की समकालिक अंतर्क्रिया का परिणाम था।[2] इस राज्य में न केवल सेन्द्रकों सरीखे

आरंभिक कदंब वंशावली

                                                   वीरशर्मन

                                                (305-310 ई.)

                                                   बंधुषेण

                                               (310-325 ई.)

                                                  मयूरवर्मन

                                                 (325-360 ई.)

                                                      कंगवर्मन

                                                  (360-375 ई.)

                                                       भागीरथ

                                                   (375-390 ई.)

                 रघु                                                                                      काकुस्थवर्मन

           (390-405 ई.)                                                                      (405-430 ई.)

                                                                                                                                                                                                                                     शांतिवर्मन                                            कृष्णवर्मन

                                                                        (430-450 ई.)                                    (430-445 ई.)

कुमारवर्मन                                                        मृगेशवर्मन                           विष्णुवर्मन          देववर्मन

                                                                     (450-460 ई.)                     (445-475 ई.)

मंधात्रवर्मन

(460-465 ई.)

                                          रविवर्मन        भानुवर्मन            शिवरथ                      सिंहवर्मन

                               (465-500 ई.)                                                                   (475-510 ई.)

हरिवर्मन                                                                                                             कृष्णवर्मन II

(500-515 ई.)                                                                                                 (510-540 ई.)

                                                                                                     अजवर्मन                  रविवर्मन II

                                                                                              (540-550 ई.)

मधुवर्मन                                                                                      भोगीवर्मन

(575-595 ई.)                                                                           (550-575 ई.)

दामोदर (595-610 ई.)                                                                विष्णुवर्मन II

स्रोत: जी. एस. गई, इन्स्क्रिप्शंस ऑफ दी अर्लि कादंबाज़, दिल्ली, 1996, पृ. 15

जनजातीय समुदाय सम्मिलित थे बल्कि कुछ स्थानीय राज्य भी शामिल थे जिनमें से एक का शासक था विष्णुदासवर्मन। इसके अतिरिक्त इसका पल्लव एवं पश्चिमी गंगा शासकों से संघर्ष भी जारी था।[3]

ऐसी स्थिति ने कदंब राज्यसत्ता की क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर वैधीकरण की आवश्यकता को जन्म दिया। सर्वविदित है कि राज्यव्यवस्थों का टिकाऊ अस्तित्व केवल अवपीड़क शक्ति या संसाधनों को उपजाने की क्षमता मात्र से ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। अपने अधीनस्थ समुदायों एवं राज्यव्यवस्थाओं पर सत्ता का उपभोग करने के लिए आवश्यक है कि उनकी निष्ठा एवं समर्थन प्राप्त किया जाए। इसके लिए राजतंत्र बल के अतिरिक्त धार्मिक विचारों, संकेतों एवं संस्थानों की सहायता भी लेते हैं। इसके माध्यम से शासक या राजवंश अपने शासन को सामाजिक मूल्यों से उपजा हुआ एवं उनमें स्थित दर्शाते हैं। शासक ऐसे क्रियाकलापों को संरक्षण प्रदान करते हैं एवं उनमें भागीदारी करते हैं जो उनकी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के संरक्षक की छवि को मज़बूत करते हैं। किन्तु शक्ति एवं प्रतिष्ठा की संकल्पना संस्कृति द्वारा निर्धारित होती है और इसलिए वैधीकरण के ढांचे के संघटक तत्व समाज विशिष्ट होते हैं।[4] वैधीकरण की विभिन्न युक्तियों के माध्यम से शासक वर्ग यह प्रदर्शित करने का प्रयास करता है कि वे मात्र ‘स्वार्थ-प्रेरित कारक न होकर नैतिक प्रतिनिधि’[5] हैं।

ऐसे ही उद्देश्यों से प्रेरित होकर कदंब शासकों ने वैधीकरण के लिए विभिन्न युक्तियाँ अपनाईं। प्रस्तुत शोधपत्र इन युक्तियों एवं उनके सामाजिक-संस्कृतिक आधारों को समझने का प्रयास है। इस प्रक्रम में प्रमुख स्रोत कदंब शासकों द्वारा जारी किए गए 46 अभिलेख हैं जिनमें से 1 अभिलेख प्राकृत भाषा में, 1 अभिलेख संस्कृत एवं प्राकृत मिश्रित भाषा में, एक अभिलेख प्राचीन कन्नड़ भाषा में तथा शेष 43 अभिलेख संस्कृत भाषा में रचित हैं।[6]

कदंब शासकों ने अपने अभिलेखों के माध्यम से एक काल्पनिक वंशावली प्रस्तुत की। उन्होंने चंद्रवंश या राजवंश से सम्बन्धों का दावा नहीं किया, बल्कि स्वयं को हारीति-पुत्र एवं मानव्य-गोत्र से सम्बद्ध बताया। किन्तु उल्लेखनीय है कि इनका एक अभिलेख[7] इन्हें अंगीरस गोत्र से सम्बद्ध बताता है। इस विरोधाभास से ऐसा प्रतीत होता है कि कदंब शासक वास्तव में अंगीरस गोत्र से सम्बद्ध थे एवं उनका मानव्य गोत्र का दावा मिथ्या था। अब प्रश्न उठता है कि इस मिथ्या दावे की प्रेरणा क्या थी? यहाँ उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में कदंब शासकों के पूर्ववर्ती आनंद राजवंश के शासकों ने भी स्वयं को हारीति वंश एवं मानव्य गोत्र से संबन्धित होने का दावा किया था।[8] इतना ही नहीं वाकाटक शासकों एवं चालुक्य शासकों ने भी स्वयं को हारीति का वंशज बताया था।[9] इन सूचनाओं के प्रकाश में ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में हारीति वंश को विशेष महत्व प्राप्त था। स्वयं को इस वंश से सम्बद्ध बताकर कदंब शासकों ने जनता के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। इसी प्रकार मानव्य गोत्र के संदर्भ में भी प्रतीत होता है कि इसका क्षेत्र विशेष से खास संबन्ध था। उल्लेखनीय है कि किसी क्षेत्र विशेष में किसी एक गोत्र या गोत्रों के विशेष महत्व का संकेत इस तथ्य से भी प्राप्त होता है कि अनेक मामलों में ग्राम विशेष में किए जाने वाले अनुदान गोत्र विशेष के ब्राह्मणों को ही किए जाते थे। उदाहरण के लिए महामलवल्ली ग्राम के अनुदान से संबन्धित तीन अभिलेख प्राप्त होते हैं जिनमें से एक आनंद शासकों के काल का है[10] एवं दो कदंब शासकों के काल के हैं।[11] तीनों ही अभिलेखों में जिन ब्राह्मणों को अनुदान दिये गए वे कौण्डिन्य गोत्र के थे।

कदंब शासकों द्वारा अपनाई गई वैधीकरण की युक्तियों का एक अन्य संघटक क्षत्रिय जाति दर्ज़े का दावा था। उल्लेखनीय है कि उनके किसी भी अभिलेख में उनको क्षत्रिय जाति में जन्म नहीं बताया गया है। इसकी बजाए इन्हें मूलतः ब्राह्मण बताया गया है जिन्होंने क्षत्रिय जाति दर्ज़े का दावा किया। इस परिवर्तन को न्यायोचित ठहराने के लिए एक कथा गढ़ी गई। कथा के अनुसार इस राजवंश का संस्थापक मयूरशर्मन नामक एक ब्राह्मण था। पल्लव शासकों की राजधानी कांची में अपने अध्ययन के दौरान अपमानित किए जाने पर उसने क्षत्रिय-वृत्ति अपनाने का निर्णय लिया।[12] किन्तु इस कथा की वैधता संधिग्ध है। कारण यह है कि इस कथा में जहां कदंब वंश का संस्थापक मयूरवर्मन को बताया गया है वहीं रविवर्मन का गुढनापुर अभिलेख[13] राजवंश का संस्थापक मयूरशर्मन के पिता बंधुषेण को बताया गया है। यह अभिलेख बंधुषेण को ब्रह्म-क्षत्रिय बताता है जिसका अर्थ है – जन्म से ब्राह्मण एवं कर्म से क्षत्रिय। आरंभिक भारतीय राज्यव्यवस्था के संदर्भ में ब्रह्म-क्षत्र दर्ज़ा वास्तव में किसी नए राजवंश द्वारा एक शुद्ध क्षत्रिय दर्ज़े का दावा करने का पूर्ववर्ती चरण होता था।[14] संभवतः बंधुषेण एक लघु राज्य की तो स्थापना कर पाया किन्तु समकालीन महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति, पल्लव राजवंश से मान्यता प्राप्त करने में विफल रहा। संभवतः मयूरशर्मन ही पहला कदंब शासक था जो अपने राज्य को मान्यता दिलवा सका। यही कारण है कि आरंभिकतम कदंब वंशावली, जो कि शांतिवर्मन के उपरोक्त वर्णित गुढ़नापुर अभिलेख में प्राप्त होती है, में राजवंश की स्थापना का श्रेय मयूरवर्मन को दिया गया है न कि बंधुषेण को।

जाति दर्ज़े में इस परिवर्तन के साथ ही अपने क्षत्रियत्व पर ज़ोर देने के लिए मयूरशर्मन ने अपने नाम प्रत्यय को भी ‘शर्मन’ से बदलकर ‘वर्मन’ कर लिया था। इतना ही नहीं उसके उत्तराधिकारियों ने भी जब भी अपने नाम में प्रत्यय का प्रयोग किया तो ‘वर्मन’ प्रत्यय का ही प्रयोग किया। उल्लेखनीय है कि ब्रह्म-क्षत्रिय दर्जे का यह दावा पहली बार काकुस्थवर्मन के राज्यकाल के दौरान किया गया था[15], जब आरंभिक कदंब राज्य के निर्माण की महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रक्रियाएँ भी जारी थीं यथा पल्लवों के विरुद्ध महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्तियों के साथ वैवाहिक एवं कूटनीतिक संबंध स्थापना[16] आदि। संभवतः इस प्रकार के दावों ने उन्हें समकालीन राजनैतिक परिदृश्य में स्वीकार्यता दिलवाई, और बाण एवं सेन्द्रक सरीखी स्थानीय राज्यव्यवस्थाओं के कदंब राज्य में समेकन में भी मदद की।

कदंब शासकों द्वारा अपनाई गई वैधीकरण की एक अन्य युक्ति थी- शासक का एक रक्षक के रूप में महिमामंडन। किन्तु यहाँ रक्षण से तात्पर्य मात्र भौतिक रक्षा से ही नहीं है बल्कि एक आदर्श सामाजिक एवं नैतिक व्यवस्था के समर्थन एवं रक्षण से भी था। इस आदर्श सामाजिक व्यवस्था को समकालीन स्रोतों में ‘धर्म’ कहा गया है। कदंब शासकों ने स्वयं को ‘कलियुग’ (आदर्श व्यवस्था की प्रतिलोम स्थिति) का विनाशक बताया।[17] उनके इस प्रकार के दावों में ब्राह्मणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। क्योंकि ब्राह्मणों की छवि धर्म के व्याख्याता एवं संरक्षक की थी, इसलिए धर्म के रक्षक के इस दावे के वैधीकरण हेतु उनके समर्थन की आवश्यकता भी थी। इतना ही नहीं, धर्म की ब्राह्मणवादी संकल्पना का एक पहलू ‘दायित्व निर्वहन’ भी था। यही कारण है कि कर्तव्यपरायणता को महत्व देकर धर्म की संकल्पना प्रजा को शासन के प्रति आज्ञाकारी रहने पर भी ज़ोर देती थी। विद्वानों ने इसे ब्रह्म-क्षत्र सम्बन्धों में परस्पर निर्भरता के संबन्धों की संज्ञा दी है।[18] कदंब शासकों एवं ब्राह्मणों के बीच परस्पर निर्भरता के ये संबन्ध ब्राह्मणों को कदंब शासकों द्वारा बड़े पैमाने पर भूमि अनुदानों को स्पष्ट करते हैं।

कदंब शासकों ने न केवल सर्व-भारतीय धर्मों यथा जैन धर्म, ब्राह्मण धर्म एवं बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया बल्कि कम से कम एक स्थानीय धार्मिक मत को भी संरक्षण प्रदान किया। इस शोध पत्र के लिए उपयोग किए गए 46 अभिलेखों में से 28 अभिलेख ब्राह्मणों को, 12 अभिलेख जैन संतों को एवं 2 अभिलेख बौद्ध धर्म को अनुदानों का ब्यौरा दर्ज़ करते हैं। जबकि एक अभिलेख मलपल्लीदेव नामक एक स्थानीय देवता को संरक्षण दर्ज़ करता है।

       धार्मिक मतों को प्रदत्त यह संरक्षण धार्मिक संस्थानों एवं ब्राह्मणों को भूमि अनुदानों एवं कभी-कभी इन संस्थानों के निर्माण को संरक्षण के रूप में दर्ज़ किया गया है। उपलब्ध अभिलेखीय साक्ष्य एवं भवनों से ज्ञात होता है कि कदंब शासकों एवं उनके अधिकारियों ने अनेक ब्राह्मण धार्मिक संस्थानों का निर्माण करवाया। यथा बनवासी में स्थित मधुकेश्वर मंदिर (भगवान शिव को समर्पित) का निर्माण मूलतः आरंभिक कदंब शासकों ने ही करवाया।[19] रविवर्मन के प्रिय वैद्य नीलकंठ देशामात्य ने महादेवायतन  (महादेव अर्थात शिव का मंदिर) का निर्माण करवाया।[20] रविवर्मन के द्वारा गुढ़नापुर में एक काम-देवालय (अर्थात प्रेम के देवता काम का मंदिर) का निर्माण करवाया गया।[21] उल्लेखनीय है कि कदंब शासकों के भूमि अनुदानों के सबसे अधिक लाभान्वित ब्राह्मण ही थे।

       जैन धर्म को संरक्षण न केवल मंदिरों के निर्माण के रूप में प्रदान किया गया बल्कि जैन सन्यासियों के भोजन एवं मंदिरों के रख-रखाव के लिए भूमि अनुदानों के रूप में भी प्रदान किया गया। कदंब शासकों के अधीन जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र पलाशिक था जिसकी पहचान वर्तमान हलसी (खानपुर तालुक, जिला बेलगौम) से की गई है। यहाँ जैन मंदिर के निर्माण, रख-रखाव, तथा एक आठ-दिवसीय वार्षिकोत्सव को मनाने के लिए अनुदानों से संबन्धित उद्धरण उपलब्ध साक्ष्यों में मिलते हैं।[22] कदंब राजसंरक्षण बौद्ध धर्म को भी प्राप्त हुआ किन्तु इस संदर्भ में दो तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-  पहला, बौद्ध धर्म को दिये गए अनुदानों की संख्या मात्र 2 है जो कि तुलनात्मक दृष्टि से काफी कम है। दूसरा, इनमें से कोई भी अनुदान स्वयं राजा द्वारा आत्मप्रेरित होकर नहीं किया गया। एक मामले में अनुदान हरिदत्त नामक एक अधिकारी की अनुशंसा पर राजा रविवर्मन के द्वारा किया गया तो दूसरे मामले में यह रविवर्मन की रानी चित्रसेन महाकेल्ला द्वारा किया गया। ये तथ्य इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की तुलनात्मक दृष्टि से कम लोकप्रियता को इंगित करते हैं।

इतना ही नहीं, राजकीय संरक्षण एक स्थानीय मत को भी प्रदान किया गया- मलपल्ली के देवता (मलपल्ली-देव)। यह स्थल वर्तमान में कर्नाटक के शिवमोगा ज़िले के शिकारीपुर तालुक में स्थित है। कदंब राज्यकालीन एवं उससे पूर्ववर्ती काल के अभिलेखों से यह पुष्टि होती है कि यहाँ के स्थानीय देवता (मलपल्ली देव) को एवं उसके नाम पर शासकों द्वारा समय-समय पर अनुदान दिये गए।[23]

उपरोक्त अनुदानों के माध्यम से शासक वर्ग इन धार्मिक मतों को संरक्षण प्रदान करके इन मतों के अनुयायियों के मध्य एक नायक की छवि स्थापित करना चाहता था ताकि उनके शासन को धर्मसम्मत माना जाए, एवं धार्मिक अनुयायी उनके शासन को धार्मिक मूल्यों में स्थापित मानें। शासक एवं राजपरिवार की ऐसी छवि जनता में राजनैतिक वफादारी स्थापित करने में विशेष मददगार होगी, ऐसी अपेक्षा की गयी।

इस प्रकार स्पष्ट है कि कदंब शासकों ने अपनी सत्ता के क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर वैधीकरण के लिए अनेक युक्तियाँ अपनाईं। इस उद्देश्य के लिए न केवल विभिन्न धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया गया बल्कि विभिन्न धर्मों के मानव प्रतिनिधियों को भी संरक्षण प्रदान किया गया। शाही संरक्षण का ऐसा वृहत आधार यह दर्शाता है कि राज्य अपने अधिकार-क्षेत्र में स्थित सांस्कृतिक एवं धार्मिक बहुलता के प्रति संवेदनशील था। लेकिन आरंभिक मध्यकाल के क्षेत्रीय राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत आरंभिक प्रकृति का राज्य होने के कारण उनका वैधीकरण का स्वरूप अधिक जटिल नहीं था।

* लेखक प्रो. भैरबी प्रसाद साहु, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रति आभार प्रकट करता है जिसने इस विषय एवं इसके विभिन्न पहलुओं पर अपना निरंतर मार्गदर्शन प्रदान किया.

[1] अध्ययन अधीन कदंब राज्य को आरंभिक कदंब राज्य कहने का कारण यह है कि भारतीय इतिहास में कदंब नमक एक से अधिक राजवंश रहे हैं। किन्तु अध्ययन अधीन कदंब राजवंश इनमें से प्राचीनतम है। विभिन्न कदंब राजवंशों के बारे में जानकारी के लिए देखें, जॉर्ज एम. मोरिस, द कादंब कुला: अ हिस्ट्री ऑफ एन्सिएंट एंड मेडीवल कर्नाटका, बॉम्बे, 1931.

[2] आरंभिक कदंब राज्य पर विवरण के लिए देखिये योगेन्द्र दायमा, स्टेट फॉर्मेशन इन अर्लि नॉर्थ कर्नाटका: ए स्टडी ऑफ दि अर्लि कादंबा इन्स्क्रिप्शंस, अप्रकाशित एम॰ फिल॰ लघु शोध प्रबंध, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, 2005.

[3] उपरोक्त.

[4] आरंभिक भारतीय इतिहास के दौरान विभिन्न राज्यव्यवस्थाओं द्वारा अपनाई गई वैधीकरण की विभिन्न युक्तियों के लिए देखें, भैरबी प्रसाद साहू, ‘लेजिटीमेशन, आइडियौल्जी एंड स्टेट इन अर्लि इंडिया’, अध्यक्षीय भाषण, प्राचीन भारत खंड, 64वां अधिवेशन, मैसूर, 2003, पृ. 44-76.

[5] उपरोक्त, पृ॰ 181.

[6] आरंभिक कदंब राजवंश के अभिलेखों के दो संकलन प्रकाशित हुए हैं। बी. आर. गोपाल, कॉर्पस ऑफ कादंबा इन्स्क्रिप्शंस, सिरसी (यू. के.), 1985; जी. एस. गई, इन्स्क्रिप्शंस ऑफ दि अर्लि कादंबास, नई दिल्ली, 1996.

[7] जे॰ एफ॰ फ्लीट, इंडियन एन्टीक्वरी, खंड vii, पृ. 35-37.

[8] के. अभिशंकर, ‘ए नोट ऑन हारितीपुत्रास (हारीतिपुत्तों)’, बी. आर. गोपाल एवं एन. एस. थारन्थ (सं.), कादंबाज़: देयर हिस्ट्री एंड कल्चर, मैसूर, 1996, पृ. 55.

[9] उपरोक्त, पृ. 55.

[10] बी. आर. गोपाल, कॉर्पस ऑफ कादंब इन्स्क्रिप्शंस, सिरसी (यू. के.), 1985, पृ. 3-5 एवं 119-121.

[11] उपरोक्त, पृ. 5-7.

[12] एफ. कीलहॉर्न, एपिग्राफिया इंडिका, जिल्द VI, पृ. 12-16.

[13] बी. आर. गोपाल, ‘गुढ़नापुर इंसक्रिप्शन ऑफ कादंब रविवर्मन’, श्रीकंठिका: डॉ. एस. श्रीकण्ठ शास्त्री फेलिसीटेशन वॉल्यूम, मैसूर, 1973, पृ. 61-72.

[14] बी. डी. चट्टोपाध्याय, द मेकिंग ऑफ अर्ली मिडीवल इंडिया, दिल्ली, 1994, पृ. 71.

[15] एफ. कीलहॉर्न, एपिग्राफिया इंडिका, जिल्द VIII, पृ. 24-36.

[16] उपरोक्त.

[17] भारतीय इतिहास में कलियुग की संकल्पना किस प्रकार स्थानीय राज्य निर्माण के साथ संबन्धित है, इस पर विस्तृत व्याख्या हेतु देखें, भैरबी प्रसाद साहु, ‘कन्सेप्शन ऑफ कलि एज: ए रीजनल पर्सपेक्टिव’, ट्रेंड्स इन सोशल  साइन्स रिसर्च, 4 (1), 1997, पृ. 27-36.

[18] भैरबी प्रसाद साहु, ‘द स्टेट इन इंडिया: एन ओवरव्यू’, प्रोसीडिंग्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री कॉंग्रेस, अलीगढ़ सत्र, 1994, पृ. 90.

[19] ए. वी. नरसिंह मूर्ति आदि, एक्स्केवेशन एट बनवासी, मैसूर, 1997, पृ. 43.

[20] वी. एस. सुक्थंकर, एपिग्राफिया इंडिका, जिल्द XVI, पृ. 26 एवं आगे.

[21] बी. आर. गोपाल, उपरोक्त, 1973.

[22] जी. एस. गई, इन्स्क्रिप्शंस ऑफ दि अर्लि कादंबाज़, नई दिल्ली, 1996, पृ. 46-50.

[23] जी. एस. गई, 1996, उपरोक्त, पृ. 4; बी. आर. गोपाल, 1985, पृ. 5-7.

योगेन्द्र दायमा
सहायक प्राध्यापक
इतिहास विभाग
हंस राज महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय

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