भारतवर्ष की उन्नति और प्रगति वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आत्मसम्मान का आधार है । इसकी पृष्ठभूमि में भारत के दीर्घकालीन अनुभव प्रसूत ज्ञान भण्डार का विशेष योगदान है । राष्ट्रीयता का स्वरूप विश्व के सभी राष्ट्रों में मूलतः एक समान नहीं होता है । इसी प्रकार राष्ट्रीय भावना का स्वरूप भी किसी देश में सदा एक समान नहीं रहता है । अनुभूति की यह धारा देश और काल के अनुसार विविध प्रकार से बहती है । देश की परतंत्रता के युग में अंग्रेजी शासन के विरोध में भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय भावना अत्यंत प्रबलता से तरंगायित हुई और आधुनिक भारतीय साहित्य में भी इसकी अनुगूंज पूरी भास्वरता के साथ सुनाई दी । भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और जीवन – दर्शन का समन्वित रूप भारत की राष्ट्रीय चेतना की आधारशिला है । राष्ट्रभक्त साहित्यकारों ने स्वर्णिम अतीत का गौरव गान किया , मातृभूमि की वंदना की आदर्श महापुरूषों की जीवन – गाथाओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया और स्वाधीनता के स्वप्न को साकार करने के लिये राष्ट्र स्वाभिमान को जगाया । ऐसे राष्ट्रवादी कवियों में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ का नाम निःसंदेह अग्रपंक्ति में गणनीय है । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर 1908 ई . 1974 ई . को हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक और सामाजिक चेतन के गायक कवि के रूप में स्मरण किया जाता है । दिनकर का जन्म बिहार के मुंगेर गाँव के सिमरिया धार में हुआ था । दिनकर को वीर रस के कवि के रूप में जाना जाता है । स्वतंत्रता के पूर्व उन्हें विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता था लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् उन्हें राष्ट्रकवि के नाम से संबोधित किया जाने लगा । वे दायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे । एक ओर उनकी कविताओं में ओज , विद्रोह , आक्रोश ओर क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है । इन्हीं दो प्रवृतियों का चरम उत्कर्ष उनकी कुरूक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है । उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की सूचना की । एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानावाना दिया । उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है । उर्वशी के अतिरिक्त दिनकर जी की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है । भूषण का बाद दिनकर जी को वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना गया है । दिनकर जी की ज्ञानपीठ से सम्मानितः रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम वासना और संबंधों के आस पास घुमती है । उर्वशी स्वर्ग से परित्यक्ता की भार्मिक कहानी है । वहीं कुरूक्षेत्र महाभारत के शान्तिपर्व का कविता रूप है । यह दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् लिखी गई महत्वपूर्ण रचना है । जबकि साम घेनी की रचना कवि के सामाजिक चिंतन के अनुरूप हुई है । संस्कृति के चार अध्याय में उन्होंने कहा है कि “ सांस्कृतिक , भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक विराट एवं भव्य देश है क्योंकि सारी व्यापकताओं , विविधताओं एवं अलगावों के बावजूद हमारी सोच एक जैसी है । दिनकर जी के काव्य में जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित किया गया है । उनके काव्य में अद्भुत आत्मविश्वास , आशावाद , कर्मयोगी जीवन , समाजव्यापी संघर्ष आदि भावों की ओजस्वी स्वरों में प्रस्तुत किया गया है । प्रारंभ में उन्होंने प्रगतिवादी कविताओं की रचना करने के पश्चात् राष्ट्रीय – सांस्कृतिक चेतना की कविताएँ रचीं । उन्होंने अनुभव की सच्चाई तथा मानवतावादी दृष्टिकोण को महत्व दिया है । उसकी मुख्य विशेषता यथार्थ कथन , दृढ़तापूर्वक आस्था की स्थापना तथा अस्वीकार्य को चौती देना है । युव और साहस को जीवन के लिए उपयोगी सारवान तथा निर्णायक बताते हुए दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में लिखा है कि युद्वों का सामना शौर्य , साहस , पराक्रम व वीरतापूर्वक करना चाहिए । परशुराम की प्रतीक्षा में भी यही हुंकार सुनाई देती है । स्वातंत्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है । बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है , नत हुए बिना जो अशनि घात रहती है । स्वाधीन जगत् में वहीं जाति रहती है । उनमें भाषा तथा साहित्य के स्तर पर कोई कृत्रिम अलंकरण नहीं मिलता । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था- ” दिनकर जी अहिंदी भाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतिक थे । ” हरिवंशराम बच्चन ने कहा था ” दिनकर जी को एक नहीं बल्कि गद्य , पद्य , भाषा और हिन्दी – सेवा के लिये अलग – अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिए । ” रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था- ” दिनकर जी ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को स्वर दिया । ” नामवर सिंह ने कहा – ” दिनकर जी अपने युग के सचमुच सूर्य थे । ”

राजेन्द्र यादव ने कहा था कि दिनकर जी की रचनाओं ने उन्हें बहुत प्रेरित किया । प्रसिद्ध रचनाकार काशीनाथ सिंह के अनुसार – ” दिनकर जी राष्ट्रवादी और साम्राज्य – विरोधी कवि थे । ” कवि प्रेम जनमेजय का मानना है कि – ” आजादी के समय और चीन के हमले के समय दिनकर ने कविता के माध्यम से लोगों के बीच राष्ट्रीय कविता के माध्यम से लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया । दिल्ली के रामलीला मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिनकर की काव्य पंक्ति ‘ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । ‘ का उद्घोष करके तत्कालीन सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाया था । दिनकर के तीन काव्य -संग्रह प्रसिद्ध हैं : रेणुका 1935 ई . हुंकार 1938 ई . तथा इसवन्ती 1939 ई .। इनमें दिनकर का कवि अपने व्यक्तिपरक , सौंदर्यान्देशी , मन और सामाजिक चेतना से उत्तम द्रष्टा ही नहीं दोनों के मध्य कोई नई राह तलाशने की चेष्टा में संलग्न साधक के रूप में मिलता है । रेणुका ‘ में अतीत के गौरव के प्रति कवि का सहज आदर और आकर्षण परिलाक्ष्नित होता है । साथ ही वर्तमान वेदना का परिचय भी मिलता है । ‘ हुकार में कवि अतीत के गौरव गान की अपेक्षा वर्तमान दैत्य के प्रति आक्रोश प्रदर्शन की ओर अधिक उन्मुख जान पड़ता है । ‘ रसवन्ती ‘ में कवि की सौंदर्यन्वेषी वृत्ति काव्यमयी हो जाती है । ‘ सामघेनी 1947 ई में दिनकर की सामाजिक चेतना स्वदेश और परिचित परिवेश की परिधि से बढ़कर विश्व वेदना बन जाता है कवि के स्वर का ओज नये वेग से नये शिखर तक पहुँच जाता है । मुक्तक काव्यों ‘ कुरूक्षेत्र ‘ तथा ‘ उर्वशी ‘ में दिनकर ने जीवन के गंभीर विषयों पर अपने विशद विचार मौलिक शैली में संगुफित किये हैं । कुरूक्षेत्र में युद्व का नवीन एवं सर्जनात्मक दर्शन उभारा है तो उर्वशी में गांधीवादी दर्शन की आलोचना करने वाला नवीन दर्शन सामने आया है । अपनी काव्य प्रतिभा के चमत्कार व निथक के माध्यम से अद्भुत विश्लेषण किया ” रे रोक मुलिष्ठिर को न यहाँ जाने दे उनको स्वर्ग धीर पर फिरा हमे लौटा दे अर्जुन भीम वीर हिमालय से ” दिनकर ने अपनी ज्यादातर रचनाएँ वीर रस में लिखी इसके बारे में जनमेजय कहते हैं । ” भूषण के बाद एकमात्र दिनकर ने वीर रस का खून इस्तेमाल किया । वह एक ऐसा दौर था , जब लोगों के भीतर राष्ट्र भक्ति के भावना को जोरों से अपने काव्य के माध्यम आगे बढ़ाया । वह जनकवि थे इसलिए उन्हें राष्ट्रकवि भी कहा गया । दिनकर स्वतंत्रतापूर्वक एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये । उनकी रचनाओं में एक और ओज विद्रोह , आकोश और क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है । दोनों ‘ कुरूक्षेत्र ‘ तथा ‘ उर्वशी ‘ काव्य है । ‘ उर्वशी ‘ को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार जबकि ‘ कुरूक्षेत्र ‘ को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74 वां स्थान दिया गया । काव्य जगत में दिनकर की लोकप्रियता इस बात से स्पष्ट होता है कि आपकी प्रमुख कलियों का उड़िया , कन्नड़ , तेलगु , अंग्रेज़ी स्पेनिश तथा रूसी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है । दिनकर के काव्य में जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित किया गया । उनके काव्य में अद्भुत आत्मविश्वास , कर्मयोगी जीवन , आशावाद , समाजव्यापी संघर्ष आदि को ओजपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया गया है । आरंभ में प्रगतिवादी कविताओं को रचना के पश्चात् राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की कविताएँ रची उन्होंने अपने अनुभव की सच्चाई तथा मानवतावादी दृष्टिकोण को महत्व दिया है । उनकी मुख्य विशेषता यथार्थ कथन , दृढतापूर्वक अपनी आस्था की स्थापना तथा अस्वीकार्य को चुनौती देना ही है । युद्व और साहस को जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध करते हुए उन्होंने कहा कि युद्व का सामना शौर्य साहस तथा पराक्रम और वीरता से करना चाहिए । परशुराम की प्रतीक्षा में उन्होंने ऐसे ही भाव व्यक्त किये । ” स्वतंत्रय जाति की लगन , व्यक्ति की धुन है , बाहरी वस्तु यह नहीं , भीतरी गुण है , नत हुए बिना जो अशाने घात सुल्ती है , स्वाधीन जगत में वही जाति रहती है । ” भाषा का प्रयोग अर्थात् खड़ी बोली का स्वाभाविक प्रवाह दिनकर के राष्ट्रवादी – सांस्कृतिक काव्य की विशेषता है । भाषा तथा साहित्य के स्तर पर कहीं भी कृत्रिम अलंकरण नही मिलता । इसीलिए दिनकर आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों में विशेष स्थान और पहचान रखते हैं । दिनकर के काव्य की मूल चेतना राष्ट्रवादी है । उनकी साहित्य साधना से छायावादी युग व बाद में लिखे गये राष्ट्रीय साहित्य का पर्याप्त बल मिला है । साथ ही उनके काव्य में प्रभूत विविधता भी दृष्टिगत होती है । उनके काव्य में कहीं जनजागरण की पुकार है , कहीं राष्ट्रीयता का स्वर प्रखर है तो कहीं छायावादी प्रवृतियों के प्रति लगाव है । भारतीय संस्कृति में उनका अटूट प्रेम उनके काव्य में झलकता है । दिनकर का लेखन देश की पराधीनता से लेकर स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद तक फैला हुआ है । दिनकर के राष्ट्रीय चेतना मूलक काव्य के प्रति आकर्षण और वर्तमान के प्रति असंतोष रेणुका ‘ में जनजागृति की भावना के प्रति उनकी प्रबल आस्था दिखाई देती है । काव्यकृति ‘ हुंकार ‘ में कवि की वाणी ओजनपूण हो गयी है । राष्ट्रीय कविताएँ राष्ट्रीय परंपराओं के गौरव से अनुप्राणित हैं । उनमें कवि ने देश को क्रांति बलिदान और विद्रोह की भी प्रेरणा दी है । ‘ द्वद्वगीत ‘ रचना कवि के अंतर्मन में उठ रहे द्वद्व की घोतक है । ” परशुराम की प्रतीक्षा ‘ वीर भावना प्रधान कविता संग्रह है जिसकी रचना ‘ भारत चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में की गई है । इसमें कवि की राष्ट्रीय चेतना और देश गौरव को जगाने वाली औजपूर्ण वाणी सुनाई पड़ती है । ” खोजो टीपू और उसमान कहाँ सोयें हैं ? दिनकर की जीवन दृष्टि समन्वयवादी है । वे गाँधीवादी हैं परंतु शक्ति विहीन विनम्रता की शांति उन्हें स्वीकार्य नहीं । पूँजीवादी शोषण के प्रति उनका विद्रोही दृष्टिकोण रहा है । कवि दिनकर ने जन – जागरण की तीव्र होती हुई काव्यधारा को और अधिक प्रखर किया । उन्होंने ओजपूर्ण कविताएँ लिखी जिनमें सूर्य जैसा तेज थां ‘ कुरुक्षेत्र ‘ में अटल , वीरमती भीष्म पितामह कहते हैं । ” शूरधर्म है अभय दहकतें अंगारों पर चलना । ” कुरूक्षेत्र में ही भीष्म पितामह नीवरण छोड़कर भागने वाले युधिष्ठिर को भारत भूमि की सेवा की प्रेरणा देते हुए कहते हैं : “ छनत विश्नत है भारत भूमि का अंग – अंग वाणों से त्राहि – त्राहि का नाद निकलता है असंख्य प्राणों से कोलाहल है , महात्रास है , विपद आज है भारी , मृत्यु विवर से निकल चतुर्दिक तड़प रहे नर नारी । इन्हें छोड़ वन में जाकर तुम कौन शांति पाओगे ? चेतन की सेवा तज जड़ को कैसे अपनाओगे ? राष्ट्र कवि दिनकर ने खुलकर राष्ट्रविरोधियों को लकारी है तो राष्ट्र प्रेमियों के प्रति श्रद्वा दर्शाई है । देश के लिए शहीद होने वालों के प्रति उनके मन में पूर्णतः कृतज्ञता का भाव है । दिनकर ने विदेशी शासकों और शोषण करने वाले अधिकारियों को ललकारते हुए बेखौफ चुनौती दी है । स्वतंत्र देश के भ्रष्ट राजनितिज्ञों और नेताओं को भी उन्होंने कटु निंदा की है । वह भारत के गौरवमय अतीत के प्रति पूर्णतः आस्थावान हैं ।

इसीलिए उन्होंने ऐतिहासिक कथानक पर प्रबंध काव्यों की सर्जना की है । महत्वपूर्ण शाखत मूल्यों के प्रतिष्ठानपन द्वारा उन्होंने समृद्व भारतवर्ष का स्वरूप उभारा है । ‘ मेरे प्यारे देश ‘ शीर्षक काव्य में उन्होंने देश को महिमामंडित करते हुए लिखा है । “ मानवता के इस ललाट – चन्दन को नमन करूँ मैं । किसको नमन करूँ मैं भारत । किसकी नमन करूँ मैं ? ‘ जततंत्र का जन्म ” कविता के अंतर्गत भारतीय लोकतन्त्र के स्वाभिामान को जगाते हुए लिखा “ सदियों की ठंडी – बुझी राख सुगबगा उठी , मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है , दो राह , समय के रथ का धर्धस्नाद सुनो , सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । ‘ हिमालय ‘ कविता में देशप्रेम और राष्ट्रीयता से ओतप्रोत भावधारा का प्रसार है । राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र प्रशस्ति की पराकाष्ठा को दिनकर ने यूँ ओजस्वी स्वरों में रूपाचित किया है : ” कलम आज उनकी जय बोल , जला अस्थियाँ बारी – बारी , छिटकायी जिसने चिनगारी जो चढ गये पुण्य वेदी पर , लिये बिना गरदन का मोल कलम आज उनकी जय बोल । ( प्रणति ) हिमालय की भव्यता , विराटता व विशालता को बरवानते हुए लिखा ” मेरे नगपति ! मेरे विशाल ! साकार , दिव्य गौरव विराट पौरूष के पुंजी भूत ज्वाल । ” ( हिमालय ) तथा ” भारत नहीं स्थान का वाचक , गुण विशेष नर का है , एक देश का नहीं , शील पंद भूमंडल भर का है ।

जहाँ कहीं एकता अखंडित , जहाँ प्रेम का स्वर है , देश देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है । ” ( मेरे प्यारे देश ) स्मग्रतः यही कहना समीचीन होगा कि दिनकर आधुनिक समाज और साहित्य अपने राष्ट्रवादी व सांस्कृतिक ओजस्वी काव्य द्वारा क्रांति की एक रचनात्मक ज्वाला उत्पन्न कर भारत वर्ष के भीतर पौरूष तथा विद्रोही तेवर भर देने वाले परिवर्तन की ओजदीप्त हुंकार भर शरवेनाद करने वाले राष्ट्रकवि राम धारी सिंह दिनकर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व निःसंदेह वर्तमान अराजक , संकटपन्नं तथा विषम परिस्थितियों में प्रासंगिक एवं उपादेय है । सिमरिया के इस क्रांतिकारी और बिहार के इस भारतप्रेमी अनन्य साधक को कोटि – कोटि नमन ।

 

संदर्भ सूची

  1. राष्ट्र चेतना के चरण शशिप्रभा अग्निहोत्री- नॉर्दर्न बुक सेंटर , नई दिल्ली ।
  2. राष्ट्रकवि का स्त्री विमर्श -प्रभाकर श्रोत्रिय किताबघर , नई दिल्ली ।
  3. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और साकेत- सूर्य प्रसाद दीक्षित ।
  4. निराला के साहित्य में रचनात्मक प्रभाव ईशा ज्ञानदीप , नई दिल्ली ।
  5. हिन्दी साहित्य का इतिहास – नगेन्द्र ।
  6. हिन्दी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ।
  7. हिन्दी साहित्य का इतिहास जय नारायण वर्मा ।
  8. राष्ट्रीयता एवं भारतीय साहित्य शशि तिवारी ।
  9. पूर्व स्वतंत्रता कविता में राष्ट्रीय एकता कृष्ण भावुक ।
  10. प्रसाद साहित्य में युगचेतना – लीलावती गुप्ता ।
  11. बीसवीं सदी : हिन्दी के मानक निबंध ।
  12. मारवनलाल चतुर्वेदी के काव्य का अनुशीलन – जगदीशचन्द्र चौरे ।
  13. माखनलाल – चतुर्वेदी – प्रभाकर माचवे ।
  14. माता भूमि – वासुदेव शरण अग्रवाल ।
  15. मैथिलीशरण गुप्त : व्यक्ति और अभिव्यक्ति सी.एल. प्रभात ।
  16. राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता रामधारी सिंह दिनकर ।
  17. राष्ट्रीय एकता और भारतीय साहित्य काशी अधिवेशन स्मृति ग्रंथ , योगेन्द्र गोस्वामी ।
  18. राष्ट्रीय चेतना के प्रेरक स्वर – प्रेमलता मोदी ।
  19. राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबंध –नंददुलारे वाजपेयी ।
  20. हिन्दी साहित्य के सूर्य राम धारी सिंह दिनकर का काव्य बिंदु दूबे ।
  21. हिन्दी के आधुनिक प्रतिनिध कवि- द्वारिका प्रसाद सक्सेना
डॉ. माला मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर
अदिति महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय

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